archanatiwari_tanuja

Insta Id Same...

Grid View
List View
Reposts
  • archanatiwari_tanuja 21h

    #hindiwriters@hindiwriters#hks#mirakee#hindipost
    27/02/2021

    शेष पंक्तियाँ फिर कभी पोष्ट करती हूँ.....

    Read More

    दहेज..

    मनहरण घनाक्षरी
    ***************

    भीतर-भीतर बहे, सुर्ख अश्रु की धार है,
    उमड़ रही वेदना, कहे ज़जबात है।

    बेटी का पिता बना हूँ, ये मेरा अपराध है,
    दहेज के लोभियों की ,नहीं कोई जात है।

    लाड़ो पली बेटी मेरी, ये मेरा अभिमान है,
    दहेज की बेड़ियाँ ले, खड़े लगा घात है।

    किससे कहूँ मै भला,बस अश्कों का साथ है,
    मांग करु पूरी कैसे ?? बिगड़े हालात है।।

    ©archanatiwari_tanuja

  • archanatiwari_tanuja 22h

    कड़वा

    1222 1222 1222 1222

    करैले सी ज़ुबाँ कड़वी, न रखना तुम कभी यारों।
    शहद सी रख ज़ुबाँ गैरों, को भी अपना बनाओगे।।

    ©archanatiwari_tanuja

  • archanatiwari_tanuja 1d

    विश्वास रख

    विश्वास रख दूर होने को है निशा का अंधकार,
    खुद मे भर सात्विकता मनुज जीवन करो साकार।
    धूंध मे नहाई हुई सूर्य किरण पड़ रही धरती पर,
    कैसी अनुपम छटा बिखेरे है श्रृष्टि का चित्रकार।।

    तितलियों मे रंग भर ! दिया सुंदर आकार,
    बर्तनों का निर्माण करता है जैसे कुम्भकार।
    सुंदर पुष्पों से मनमोहक हुआ बसंत जैसे,
    खुद की कृति देख प्रसंन हो उठा कलाकार।।

    भरोसे की है नाजुक ड़ोर इसे संभालना होगा,
    दूर कर मन के सारे दोष इसे निखारना होगा।
    दरख्तों सा बना ले खुद के आचरण को जरा,
    स्नेह का आँचल सब के लिए पसारना होगा।।

    जुगनुओं के मानिंद चमक रहीं आशा की किरण,
    न दबोचो हथेलियों मे ऐसे इन्हें के हो जाए मरण।
    ऐतबार मिलता नहीं बाजार मे इसे कमाया जाता है,
    एतियात से सहेजे रखना !! कहीं हो न जाए हरण।।

    ©archanatiwari_tanuja

  • archanatiwari_tanuja 4d

    जब भावनाओं की जमीं रिसती है तब
    हर्फ़ स्याही बन पन्नों पे बिखरते है...✍️

    ©archanatiwari_tanuja

  • archanatiwari_tanuja 1w

    "हर घर कुछ कहता है"

    बुत बना सब कुछ खामोशी से देखता रहता है,
    मौन जुबां को सुनो जो "हर घर कुछ कहता है"।
    किसी घर से खुशियों का नित शोर सुनाई देता है,
    तो कही किसी घर मे सन्नाटा सा पसरा रहता है।।

    इक अबला असहाय बेचारी घुट-घुट कर जीती है,
    हर दिन अपने घावों को वो थोड़ा-थोड़ा सीती है।
    साक्षी बनी उस घर की दर-ओ-दीवारें जुल्मों की,
    किसे सुनाये वो दास्तान उसपे क्या-क्या बीती है।।

    आलीशान और ऊँची-ऊँची है जिस घर की दीवारें,
    उस घर के बुजुर्ग भटक रहे है सडकों पर मारे-मारे।
    नीव रखी थी अपने हाथो से जिस सुंदर मकान की,
    वो दंपति आशियाना छोड़ चले हाथों मे हाथ डारे।।

    चीखतीं है उस घर की दीवारें भी उसका हाल देख,
    जहाँ इक बेटी बहूँ बन बदलने आई जीवन की रेख।
    दहेज की तपती आग मे जला दी गई सपनों समेत,
    अखबारों,किस्से,कहानियों मे सिमट गई बनके लेख।।

    ©archanatiwari_tanuja

  • archanatiwari_tanuja 1w

    वीर जवान..

    सीमा पर प्रहरी बना,करे रक्षा निज देश।
    वीर जवान डटा रहा,धरे काल का भेष।।

    ©archanatiwari_tanuja

  • archanatiwari_tanuja 1w

    कलम मेरी✍️

    जाने किस गम मे है प्यारी कलम मेरी,
    मुझसे थोड़ी नासाज सी ये लगती है।
    और थोड़ी थोड़ी उदास सी लगती है,
    जाने क्यों वो नाराज़ सी लगती है ??

    कब तब इसे रोकू-टोकू सच बोलने से
    समझाने पर बात न माने कलम मेरी।
    कब तक दबाऊँगी ज़ज्बात बेचारी के,
    लावा उगलने को है बेताब कलम मेरी।।

    भीतर ही भीतर कब तक रहूँ मै जलती,
    लिखना वो सुनहरा आग़ाज़ है चाहती।
    फरवाह नही किसने क्या कहाँ क्या सुना?
    अपने एहसास सबपे बयां करना चाहती।।

    कोरे कागजों को सिर्फ जाया नही करना,
    हर्फों की माला बना सुसज्जित नही करना।
    जागृति की मशाल बन जलना चाहती कलम,
    हकीकत से रुबरु हर किसी को आज करना।।

    ©archanatiwari_tanuja

  • archanatiwari_tanuja 1w

    जुगनू...

    नहीं बनना मुझे ज्वाला या चिंगारी,
    मै तो बनना चाहती जुगनू सी प्यारी।
    जो हर इक दिल को अति भाती है,
    टिमटिमाते हुए लगती सबसे न्यारी।।

    देख जुगनू याद आते दिन बचपन के,
    मुट्ठी मे कैद कर हथेली पे रखने के।
    मचल के हथेली से उठ भागना उसका,
    फिज़ूल थे ख़याल बंद डिब्बे मे रखने के।।

    नन्हीं सी रौशनी लिए अंधेरों मे भटकती,
    खुद प्रकाशमान हो के राहे रौशन करती।
    तन-मन इसका है कितना धवल सोचो,
    कितनी दूर-दूर तक है ये उड़ान भरती।।

    कहने को अदना सा जीव!लगे ये सुंदर,
    टिमटिम कर खुशियाँ बिखेरै मन भीतर।
    सरहदो की भी परवाह नही इसे जरा सा,
    स्वाछंद हो कर भ्रमण करता इधर-उधर।।

    नेक राह पर चला सबको सिखलाता,
    परोपकार का सदमार्ग हमें दिखलाता।
    सीख सखो तो सीखो इस नन्हें जीव से,
    कठोर हृदयों पर भी दस्तक दे जाता।।

    ©archanatiwari_tanuja

  • archanatiwari_tanuja 1w

    आशियाना जरूरी है

    ज़िन्दगी बसर करने को इक़ आशियाना जरुरी है,
    भला कब तक भटकोगे यूं इक़ ठिकाना जरुरी है।

    कैसे कटेगा सफर तन्हा चलते-चलते जरा बता,
    साध निभाने की खातिर साथी सुहाना जरुरी है।

    कब तक परेशानियों का बोझ उठाओगे तन्हा ही!!
    खुशी हो या गम दिल की हर बात बताना जरूरी है।

    कोई तो मकसद बना तू अपने जीने का ऐ इंसान,
    सोई हुई इंसानियत हर हाल मे जगाना जरूरी है।

    विभावरी का अँधियारा भी छट जायेगा तू देखना,
    पर रौशनी की खातिर इक चिराग जलाना जरुरी है।

    पंक्षी भी बनाते है तिनका-तिनका जोड़ के घरौंदा,
    फर्ज़ कोई भी हो मगर यारो उसे निभाना जरुरी है।

    कोशिश किए बगैर ही तुम हार मान बैठे हो क्यों?
    मुकद्दर है बड़ा अडियल!इसे आजमाना जरुरी है।

    जो यादें दुश्वारियों के सिवा कुछ न दे ज़िन्दगी को
    ऐसी बेमुरव्वत यादों को ज़हेन से भुलाना जरुरी है।

    सफलता-असफलता दो ही तो पहलू है मापने के,
    तेरे कर्मों को जाचने की खातिर!पैमाना जरूरी है।

    जब हस्रते हद से ज्यादा पाव पसारने लग जाय तो!
    ऐसी बेलगाम चाहतो को दिल मे दबाना जरूरी है।

    ©archanatiwari_tanuja

  • archanatiwari_tanuja 1w

    महक उठा गुलशन

    नमन करते माँ शारदे लेके पुष्प हार,
    महक उठा गुलशन बहे बसंती बयार।
    मन आँगन आनंदित और पुष्पित हुआ,
    कोयल भी मधुर स्वर में करे पुकार।।

    चहुँ दिश फैली है देखो सुंदर छटा,
    बसंत आ कर प्रकृति के द्वार डटा।
    सरसों की फसल झूमती- लहराती,
    मनोरम नजर आ रही है अब घटा।।

    आम की मंजरियाँ मादक सुगंध बिखेरे,
    रसपान को भँवरे लगा रहे पुष्पो पर फेरे।
    गेहूँ की फूटती बालियां देख कृषक हर्षाय,
    मन ही मन कहते कष्ट दूर हो जायेंगे मेरे।।

    अर्चना तिवारी तनुजा
    ©archanatiwari_tanuja