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  • arfanbhopali 15w

    मिडिल क्लास

    मिडिल क्लास पति बीवी से प्यार ज़ाहिर करने के लिए उसे ऐनिवर्सरी पर ताजमहल या नैनीताल नहीं ले जा पाता. वो रात में घर में जब सब सो जाते हैं तब ऑफ़िस वाले बैग में से चाँदी की एक जोड़ी पायल और लाल काँच की चूड़ियाँ धीरे से निकाल कर बीवी को पहनाता है और

    उसके माथे पर पसीने से फैल चुके सिंदूर को उँगलियों से पोछते हुए ख़ुद से वादा करता है कि अगली गर्मी से पहले वो कूलर ख़रीद लाएगा. और शर्ट की जेब टटोल कर 500 रूपये हाथ में देते हुए कहता है, घर जाना तो अम्मा और भाभी के लिए कुछ ख़रीद लेना. क्या पता तब हाथ में पैसे रहे न रहे

    हर कोई चाहता है प्यार में ताजमहल बनाना परंतु जीवन का सच है दो टाइम की रोटी का जुगाड़ लगाना
    जिंदगी तब बहुत आसान हो जाती है

    जब साथी परखने वाला नहीं
    बल्कि समझने वाला साथ हो

    ©arfanbhopali

  • arfanbhopali 17w

    मैं पुरुष हूँ

    मैं पुरुष हूँ
    और मैं भी प्रताड़ित होता हूँ
    मैं भी घुटता हूँ पिसता हूँ
    टूटता हूँ,बिखरता हूँ
    भीतर ही भीतर
    रो नहीं पाता,कह नहीं पाता
    पत्थर हो चुका,
    तरस जाता हूँ पिघलने को,
    क्योंकि मैं पुरुष हूँ....

    मैं भी सताया जाता हूँ
    जला दिया जाता हूँ
    उस "दहेज" की आग में
    जो कभी मांगा ही नहीं था,
    स्वाह कर दिया जाता है
    मेरे उस मान सम्मान
    को तिनका तिनका
    कमाया था जिसे मैंने
    मगर आह भी नहीं भर सकता
    क्योंकि पुरुष हूँ...

    मैं भी देता हूँ आहुति
    "विवाह" की अग्नि में
    अपने रिश्तों की
    हमेशा धकेल दिया जाता हूँ
    रिश्तों का वज़न बांध कर
    ज़िम्मेदारियों के उस कुँए में
    जिसे भरा नहीं जा सकता
    मेरे अंत तक भी
    कभी दर्द अपना बता नहीं सकता
    किसी भी तरह जता नहीं सकता
    बहुत मजबूत होने का
    ठप्पा लगाए जीता हूँ
    क्योंकि मैं पुरुष हूँ....

    हाँ मेरा भी होता है "बलात्कार"
    कर दी जाती है
    इज़्ज़त तार तार
    रिश्तों में,रोज़गार में
    महज़ एक बेबुनियाद आरोप से
    कर दिया जाता है तबाह
    मेरे आत्मसम्मान को
    बस उठते ही
    एक औरत की उंगली
    उठा दिये जाते हैं
    मुझ पर कई हाथ
    बिना वजह जाने,
    बिना बात की तह नापे
    बहा दिया जाता है
    सलाखों के पीछे कई धाराओं में
    क्योंकि मैं पुरुष हूँ...

    सुना है जब मन भरता है
    तब वो आंखों से बहता है
    "मर्द होकर रोता है"
    "मर्द को दर्द कब होता है"
    टूट जाता है मन से
    आंखों का वो रिश्ता
    ये जुमले
    जब हर कोई कहता है☹️
    तो सुनो सही गलत को
    एक ही पलड़े में रखने वालों
    हर स्त्री श्वेत वर्ण नहीं
    और न ही
    हर पुरुष स्याह "कालिख"
    क्यों सिक्के के अंक छपे
    पहलू से ही
    उसकी कीमत हो आंकते
    मुझे सही गलत कहने से पहले
    मेरे हालात नहीं जांचते ???
    जिस तरह हर बात का दोष
    हमें हो दे देते
    "मैं क्यूँ पुरुष हूँ???"
    हम खुद से कह कर
    अब खुद को हैं कोसते☹️
    ©arfanbhopali

  • arfanbhopali 20w

    शिक्षक दिवस

    छीन ले हाथ से उस्ताद के डंडा कोई
    बदले डंडे के खिला दे हमें अण्डा कोई

    अण्डा खाने से लहू जिस्म में बढ़ जाता है
    चुस्त होता है बदन ज़ेहन निखर जाता है

    डंडा लेकिन हमें क्या फ़ाएदा पहुँचाता है
    जिस्म को देता है दुख ज़ेहन को उलझाता है

    छीन ले हाथ से उस्ताद के डंडा कोई
    बदले डंडे के खिला दे हमें अण्डा कोई

    किस क़दर देते हैं दुख हम को ये हाए डंडे
    सारी दुनिया से ख़ुदा अब तो मिटा दे डंडे

    है वो उस्ताद बुरा जो कि जमाए डंडे
    है वो शागिर्द भी बुद्धू कि जो खाए डंडे

    छीन ले हाथ से उस्ताद के डंडा कोई
    बदले डंडे के खिला दे हमें अण्डा कोई

    अब न स्कूल में डंडे की ख़ुदाई होगी
    सारे डंडों की ज़माने से सफ़ाई होगी

    ज़ोर से डंडे के हरगिज़ न पढ़ाई होगी
    अब तो स्कूल में अंडों की खिलाई होगी

    छीन ले हाथ से उस्ताद के डंडा कोई
    बदले डंडे के खिला दे हमें अण्डा कोई

    लद गया अब तो वो अंडों का ज़माना साहब
    हो चुका अब तो तरीक़ा ये पुराना साहब

    जो मोहब्बत का न गुर आप ने जाना साहब
    फिर तो दुश्वार हुआ पढ़ना पढ़ाना साहब

    छीन ले हाथ से उस्ताद के डंडा कोई
    बदले डंडे के खिला दे हमें अण्डा कोई

    सर पे डंडे पड़ें हरगिज़ न ये उफ़्ताद आए
    तालिब-ए-इल्म न करता हुआ फ़रियाद आए

    काश भूला हुआ शफ़क़त का सबक़ याद आए
    बाप के रूप में स्कूल में उस्ताद आए
    ©arfanbhopali

  • arfanbhopali 22w

    #ख़्वाब #आलम #mirakee #mirakeeworld

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    मेरा ख़्वाब

    हुस्न - ए - काफ़िर - शबाब का आलम
    सर से पा तक शराब. का आलम
    अरक़ - आलूद चेहरा - ए - ताबाँ
    शबनम - ओ - आफ़्ताब का आलम

    वो मिरी अर्ज़-ए-शौक़-ए-बेहद पर
    कुछ हया कुछ इ'ताब का आलम
    अल्लाह अल्लाह वो इम्तिज़ाज-ए-लतीफ़
    शोख़ियों में हिजाब का आलम

    हमा नूर - ओ. - सुरूर की दुनिया
    हमा हुस्न - ओ - शबाब का आलम
    वो लब- ए - जूएबार ओ मौसम - ए - गुल
    वो शब - ए - माहताब का आलम

    ज़ानू-ए-शौक़ पर वो पिछले पहर
    नर्गिस - ए - नीम - ख़्वाब का आलम
    देर तक इख़्तिलात -ए-राज़-ओ-नियाज़
    यक - ब - यक इज्तिनाब का आलम

    लाख रंगीं - बयानियों पे मिरी
    एक सादा जवाब का. आलम
    ग़म की हर मौज मौज-ए-तूफ़ाँ-ख़ेज़
    दिल का आलम हबाब का आलम

    दिल-ए-मुतरिब समझ सके शायद
    इक शिकस्ता. रुबाब का आलम
    वो समाँ आज भी है याद "अरफान"
    हाँ मगर. जैसे ख़्वाब का आलम

    ©arfanbhopali

  • arfanbhopali 22w

    #बेटी #बेटियां #बेटे #aulaad #daughter #girl #children #child #life #बाप #पिता #father #mirakeeworld #mirakeehindi #mirakeewriters

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    बेटी का बाप

    मालूम हुआ की वो एक बेटी का बाप बन गया , तो वो शर्मिंदा हुआ बहूत
    ग़लत निग़ाह डाली थी किसी की बेटी पर कभी , सोच कर डर गया बहूत

    ©arfanbhopali

  • arfanbhopali 22w

    हद

    कुछ हद तक़ तो मेरी मुहब्बत में कमी थी
    और कुछ हद तक़ मेरी सूरत भी फनी थी
    ©arfanbhopali

  • arfanbhopali 22w

    तलाक़

    तलाक़ दे तो रहे हो गुरुर और कहर के साथ ''ख़ान''
    उसके हुस्न का शबाब भी लौटा दो उसके महर के साथ

    ©arfanbhopali

  • arfanbhopali 26w

    इल्ज़ाम

    इतने बुरे भी नही थे हम जितने इल्ज़ाम लगाए लोगो ने
    कुछ किस्मत भी ख़राब थी और कुछ आग लगाई मेरे अपनो ने

    ©arfanbhopali

  • arfanbhopali 29w

    आज की रात भी

    लब-ए-ख़ामोश से इफ़्शा होगा
    राज़ हर रंग में रुस्वा होगा
    दिल के सहरा में चली सर्द हवा
    अब्र गुलज़ार पे बरसा होगा

    तुम नहीं थे तो सर-ए-बाम-ए-ख़याल
    याद का कोई सितारा होगा
    किस तवक़्क़ो पे किसी को देखें
    कोई तुम से भी हसीं क्या होगा

    ज़ीनत-ए-हल्क़ा-ए-आग़ोश बनो
    दूर बैठोगे तो चर्चा होगा
    जिस भी फ़नकार का शहकार हो तुम
    उस ने सदियों तुम्हें सोचा होगा

    आज की रात भी तन्हा ही कटी
    आज के दिन भी अंधेरा होगा
    किस क़दर कर्ब से चटकी है कली
    शाख़ से गुल कोई टूटा होगा

    उम्र भर रोए फ़क़त इस धुन में
    रात भीगी तो उजाला होगा
    सारी दुनिया हमें पहचानती है
    कोई हम सा भी न तन्हा होगा

    ©arfanbhopali

  • arfanbhopali 50w

    गांव की शाम

    विरासत को बचाने गाँव के खण्डहर बुलाते हैं
    शहर वालों तुम्हें तुम्हारे बूढ़े पूर्वज घर बुलाते हैं

    समझकर तुम जिन्हें बेजान पत्थर छोड़ आए हो
    वो आँगन राह तकता है , ये बामो-दर बुलाते हैं

    कब्र को मिट्टी देना ही नहीं बस फ़र्ज़ बेटे का
    दवा बिन खाँसती अम्मा के कातर स्वर बुलाते हैं

    मिलेगी दाल-रोटी पर बहुत ही स्वाद आएगा
    ख़ुशी को बाँटकर खाते हुए लंगर बुलाते हैं

    गली, चौपाल, वे पनघट, सुहानी छाँव पीपल की
    यहाँ बदला नहीं कुछ भी वही मंज़र बुलाते हैं

    कभी अनजान शहरों से निकलकर गाँव तो आओ
    गले अपने लगाने को तुम्हें यहाँ के छप्पर बुलाते हैं

    ©arfanbhopali