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  • avika_amby 23w

    Anxiety

    What do do when you do all that you can do, yet you feel there is more to do.
    How does your heart get calmer when your mind brews up imaginary storms and you feel you are going under the waves although you are standing on a firm ground?
    How do you believe that the sky above you is blue and fresh, while your mind keeps painting grey around you?
    What can you do, when things come easy, but the struggle to believe in their existence makes life difficult?
    What do you say when the watchers from across the glass feel there is nothing amiss in your dancing exhibit, but you know you are standing statuesquely still , with your knees bound and fixed in concrete,dried and static.
    How do you tell your heart,to believe the goodness around you, to accept the happiness about you?
    How do you breathe a long breath when after every millisecond your mind and heart battle it out to confuse your state of emotions?
    How? How do you unfix yourself from this transfixed state of fixation?
    ©avika_amby

  • avika_amby 26w

    #qflit #questforliterature #johndonne #theflea #lovepoem #metaphysicalpoetry #metaphysicalpoet #conceit #hyperbole #metaphor #romanticpoem

    The conceit and masked comparisons that I have come across while reading Metaphysical Poetrh are mind blowing. There are no limits to the exaggerated, far flung comparisons and hyperbolic ideas it portrays.

    This poem is called The Flea. Published two years after the death of the poet, it is in fact an erotic poem. It is the denial of a woman towards sexual profanity, and how the wit of the poet compares consummation with an irritating insect such as a flea.

    These lines form the first few lines of the second stanza. Based on the iambic tetra and pentameter intermittently, it has vivid imagery and clever wit.
    The main three protagonists are the man, the woman and the flea.
    With the guise of the bute of the flea, the man tries to coax his beloved as he urges and explains how due to the bite of the flea,they are already mingled in blood.

    There are schemes of shock and playful flirtations as he makes comparisons and false grief upon the death of the flea and how the flea did not need to woo her as much as him,to well, touch her.

    It is a smart play of words, in the typical metaphysical style. The devices of personifying something as repulsive as a flea to become a symbol innate raw passion and love is definitely a mastery of words and thoughts.

    Read the poem and you will see what poetry can achieve playfully.

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    The Flea by John donne

    "Oh stay, three lives in one flea spare,

    Where we almost, nay more than married are.   

    This flea is you and I, and this

    Our marriage bed, and marriage temple is;"

  • avika_amby 27w

    बक्से की यादें

    क्यों वो टूटा हुआ बक्सा दे दिया नानू का,
    क्यों उस नानी की कुर्सी का कुशन बदल कर बेच दिया
    क्यो नहीं रखी वो किताबें जो नाना के सरहाने होतीं थीं
    क्यो नानी की कढ़ाई दान कर दी ,जिसमे छोले बनते थे

    कैसे इन यादों को,माँ, आपने जाने दिया?
    कैसे कीमत लगाई उन लमहों की?
    पुरानी तस्वीरों मे मुसकुराते चहरे अब जिन्दा नहीं
    तो क्या रद्दी हुई यादें सभी?


    क्यों नही घर को और बड़ा किया मेरे जाने के बाद,माँ?
    क्यो नहीं दिया मेरा कमरा मेरे नानको और दादको की यादों को?

    मैने आपसे
    आपने उनसे,
    सीखी जो बातें,
    क्या अब नसीहतों का रास्ता आगे से बंद है?
    क्या अब सीखने को कुछ नहीं,
    जब वो सारे ताबूत में बंद हैं?


    कैसे जीते हुए,
    रिश्तों को संभाल कर रखते हैं, माँ?
    कैसे उन्हे झटके से,संस्कार के बाद छोड़ते हैं माँ?
    कैसे भूलते हैं माँ,
    दादा के ग़ुमे हुए चश्मे को,
    जो अचानक आज दराज़ मे मिला,
    जब दादा नहीं है उसे पहने को?
    कैसे खोलूं उस मर्तबान को,
    जिसका आचार दादी ने था मसला?

    कैसे हटाऊ उन हजारों कहानियों को
    जो रात को सुलाती थी,
    कैसे भूलूँ उस शाॅल को
    जो हमेशा आपसे बचाती थी।


    बताओ ना माँ,
    कैसे भूलूँ अपने दोस्तो को?
    कैसे उस खाली कमरे में बैठूं,

    वो तो तैयार थे सामान लिए जाने को,
    पर तारीख तय न थी,
    मुझे बोला करते थे,
    तुम आई हो तो जीने का मन करता है,
    तेरे आने से मेरा खून बढ़ता है।


    तो फिर क्यो नानको के दरवाजे अब बंद हैं?
    क्यो माँ, दादको के यहाँ अब सिर्फ पिछली कई सालों की
    संक्रांत की पुरानी एक पतंग है?

    सीखा दो मुझे भी माँ,
    कैसे बड़े होते हैं,
    कैसे भुला कर बड़ों को,
    छोटे बड़े होते हैं ।


    ©avika_amby

  • avika_amby 28w

    खुशहाली

    हवाओं ने आँसुओं का रास्ता बदलते हुए पूछा,
    क्या अब सब खुशाल है तहाँ,
    "रूह कांपी थी", कहा आँसुओं ने,
    रूह कांपी थी यहाँ,
    जब एक रूह जिस्म से आजाद हुई वहाँ ।

    ©avika_amby

  • avika_amby 28w

    #बचपन #बादल #monsoon #happiness #swings #play #beachild

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    उड़ान

    झूलों पर कई बार पंख मिलते हैं
    भूले हुए खवाबों को,
    उड़ते हुए बाल सुलझाने लगते हैं
    उलझे हुए मन के बंधनों को ।

    वो हवा जब छूती है
    इन बंद आँखों की नमी,
    तब लगता है
    बचपन मेरे अंदर बाकी है अभी

    कितने दिनों बाद इस मौसम ने,
    बरसात में,
    शायद मुझसे गुजारिश की है,
    अब जीया जाय पिछला वो घम भुला कर,
    पता नहीं कैसे ,
    ऐसे प्यारे मासूम ख्यालों की बारिश की है

    आसमां यूँ तो खुश नीला सा,
    कभी काला गुस्सैल सा,
    धड़धड़ाता घना सा,
    दिखता है रोज इन दिनों,
    पर आज बदली कुछ मुस्कुराती सी लगी है ।
    बड़े दिनों बाद
    उड़ने की ख्वाहिश सी जगी है ।


    ©avika_amby

  • avika_amby 28w

    By unknown writer

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    Quest For Literature

    #qflit

  • avika_amby 28w

    "And thereupon
    That beautiful mild woman for whose sake There's many a one shall find out all heartache
    On finding that her voice is sweet and low Replied, "To be born woman is to know— Although they do not talk of it at school— That we must labour to be beautiful."

    William Butler Yeats

  • avika_amby 28w

    A mother can fall sick only, as long as, the child is asleep.

    Falling sick for a mother is nothing short of a luxury.

    ©avika_amby

  • avika_amby 28w

    स्वर्ग

    आज तो बहेंगे शब्द
    इन बर्फीली हवाओं की तरह
    ये वादियां भी सोच रहीं हैं
    फिर से स्वर्ग होगा यहाँ

    बादलों के ये नरम कम्बल
    गर्मा रहें हैं मेरी रूह को,
    चेनाब बहती चंचल सी
    अब नहीं ढूंढ रही किनारे को

    आज तो बहेंगे शब्द
    इन बर्फीली हवाओं की तरह
    ये वादियां भी सोच रहीं हैं
    फिर से स्वर्ग होगा यहाँ

    दरिंदगी थी तुम्हारी
    या दरिंदा हुए हम,
    खून बहा दोनों का,
    क्यू ऐसे जुदा हुए हम ।

    न खुश तु मेरे साथ,
    और मेरे बिना अधूरा है तू।
    क्यू सियासत के इस खेल में
    रुस्वा हुए मैं और तुम ।

    आज तो बहेंगे शब्द
    इन बर्फीली हवाओं की तरह
    ये वादियां भी सोच रहीं हैं
    फिर से स्वर्ग होगा यहाँ ।

    जाने कब चिनार के पत्ते
    डगमगाकर गिर गए,
    जाने कब देवदार भी
    ऊंचे लम्बे हो गए।

    जाने कब तेरे फिरन से
    कांगड़ी हटी,
    जाने कब हाथ से काहवे की
    प्याली छठी,
    बस वो अखरोट पड़े रह गए,
    वो नमदे बिछे रह गए।

    मेहमान और मेजबान मे खोते रहे,
    हम दोनों अपनी हस्ती,
    भरनी हमारी
    करनी उनकी,
    राजनैतिक षडयंत्रों में थी
    जिनकी जान बस्ती ।

    बहने दो
    अब आब भी,
    आवाज भी,
    इन बादलों की तरह
    ये वादियां भी सोच रहीं हैं
    स्वर्ग फिर होगा यहाँ ।

    ©️अविका अंबाडेकर
    ©avika_amby

  • avika_amby 28w

    Gulab par aaj ye boonde,
    Kya Kisi beetey huey gham,
    Ya kisi bhooli hui khushi ki dastaan keh rahi hai?
    Rango ki ranjish to dekho,
    Feeke rango par hi,
    Gulab ki laali jhalak rahi hai

    ©avika_amby