bhagwant_09

बस यूं ही !!!

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    राहत इंदौरी

    मशहूर कुछ यूं हुए थे आप, कावियों की भी कविता आपसे थी।
    रुखसत हुए हैं वो जिनकी कविताएं इश्क़ और जज्बात सी थी।।
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    दिल बेचारा

    उसका होना शुमार था कुछ को नागवार,
    वो दे गया दिल बेचारा जिसे चाहें लोग बेशुमार।
    जब तक थी जां किसी को हुआ ना उससे प्यार,
    अब हर तरफ उसी के चर्चे, सबपे है उसी का खुमार।।
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    दुआयें

    फिक्र ही जिंदगी ने सिखाई है हर थाह।
    लबों पे सिर्फ दुआयें, खुशी हो या आह ।।
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    सफर

    सफर है जिंदगी तो हमारी राह कहां?दिल है जरिया ले जाए चाहे जहां।
    पर मुस्किलें राह की आये जहां,क्यों ये दिल भी नाता तोड़ लेता वहां।।
    कुछ यूं सिमट गई है जिंदगी की डोर, चाहूं जी लूं पर जीने नहीं देता ये जहां।।
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    व्यथा

    कुछ कहूं या ना कहूं, चुप करूं या चुप रहूं।।
    सब सहूं या ना सहूं, कुछ पल जीलूं या मरूं।।
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    Majboori

    Vo itne kareeb hain ki bahon me lelun..
    Par majboori, ki kuch kahu ya bin kahe reh lun..
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    शिकस्त

    इस दौर में डर है, दर्द है , और थोड़ी खता का एहसास भी है।
    लड़खड़ाया जरूर हूँ , मगर शिकस्त से बनती मेरी कुछ खास नहीं है।।
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    चर्चे

    वो हुए ना हमारे तो क्या ,
    कुछ तो बात रही होगी हमारे इश्क़ में ,
    सुना है चर्चे उनकी गली में आज भी हमारे ही हैं।।
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    राजेवफ़ा

    इक उलझन सी दबी है सीने में , इस इश्क़ में राजेवफ़ा है के नहीं।
    बस चिलमन रेह गयी इक कोने में , हम बेवफा या वो ही थे सही।।
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    वो हर पल याद आता है, दिल को बड़ा दुखाता है।।
    वक़्त साथ देता जो हमारा, अपनी कस्ती को भी मिलता किनारा।।
    I miss you very much "Di".
    Am gonna tell you all about it when I see you again.��

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    "दी"

    चलना सिखाया जिसने भीड़ में, तुम ही तो थी।
    लड़ना सिखाया जिसने नीड में, तुम ही तो थी।।

    तुमने ही पकड़ी थी मेरी उंगली हर राह में;
    तुमने ही सिखाया पहला अ और आ हमें।
    सीखा तुमसे ही कैसे बढ़ना है जिंदगी में;
    तुमने ही सिखाया साफ रहना गंदगी में।
    बचपन में जिसने बढप्पन दिखाया, तुम ही तो थी।
    कैसे होना है परिपक्व बताया, तुम ही तो थी।।

    हाँ याद है मुझे वो तुम्हारा गुस्सा दिखाना;
    खुद कुछ करना और मुझको फ़साना।
    और माँ के मुझे डांटने पर उससे भिड़ जाना;
    फिर प्यार से मुझे मना कर बिस्किट खिलाना।
    था में दूर पर हमेशा भेजती थी राखी, तुम ही तो थी।
    राखी के गिफ्ट के बदले मुझे ही कुछ देती, तुम ही तो थी।।

    तू कर भाई में हूँ, तेरा वो विश्वास याद आता है;
    हर रोज तेरा वो आखरी अलविदा दिल दुखाता है;
    कुछ कर गुजरने की चाह जगाई मुझमें;
    बाधायें आयी कई रुकने न दिया तुमने।
    वो जिसका हाथ सर पे हमेशा था मेरे, तुम ही तो थी।
    वो छुपके से पैसे रखना बैग में मेरे, तुम ही तो थी।।

    कुछ दे ना सका तुझको, ये जख्म दुखता है;
    अब हूँ मैं उस उस काबिल, पर वक़्त कहाँ रुकता है;
    तेरा अक्स भी देखलु तो आँखे भर आती हैं;
    तेरी वो लोरियाँ और कहानियाँ बहुत याद आती हैं।
    हर काम बड़े संग करेंगे किया था ये वादा, तुम ही तो थी।
    पर यूँ राह में छोड़ गई जो आधा, तुम ही तो थी।।

    था मैं छोटा सबका दुलारा, जब तक तुम थी;
    इक पल में ही सब कुछ वीराना जो तुम नहीं;
    आज हूँ सबसे बड़ा, पर वो तुम्हारी सूझ नही;
    अब कौन देगा सहारा, जिंदगी मुझसे पूछ रही।
    वो आखिरी पल जिसे देख हुआ था शिथिल मैं, तुम ही तो थी।
    आखरी बार "भय्या" सुना ना जिस छितिज से, तुम ही थीं "दी"।।
    ©bhagwant_09