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  • emortal 3w

    Pic Credit-Brooke Cagle(Unsplash.com)

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    मरूस्थल,
    भीतर और बाहर मन के
    तुम, एक मरीचिका
    स्पर्श की परिधि से परे
    पर अस्पृश्य रही तुम्हारे द्वारा
    ये भी कैसे कहूं
    ©K Prashanth

  • emortal 6w

    देह के परे एक देह है,
    जिसे तुमने छुआ था ,
    जग के परे एक जग है,
    जहा ये कभी हुआ था,

    शब्दों के परे एक भाषा है,
    जिसमे हम बतियाते थे,
    निशा परे एक निशा थी
    जहा स्वप्न हम सजाते थे,

  • emortal 8w

    वो रात और बारिश
    मुजरिम करार दी गई,
    जिसमे और जिससे टूटी इक दीवार,
    एक सालो पुराना रिसाव,
    अनदेखा,
    बरी हो गया।

  • emortal 8w

    रोज घिसती है,
    दिन के कागज पे,
    परचून का हिसाब लिखते,
    यह देह

    कविता रात को,
    तकती है मेरा उनींदा तन,
    और क्लांत मन,
    किसी ब्याहता बेवा की तरह
    ©emortal

  • emortal 8w

    भरी बारिश में, गीले शरीर खड़े हुए,
    सहसा शुष्कता का अनुभव किया है कभी?
    मनमोहक रंगों के फूलों से महकते बगीचे में,
    प्राणहीन कलेवरों पे सजे फूलों की शांत गंध ने
    कभी प्रवेश किया है मन में?
    जन्म के साथ ही, जो जमीन में गाड़ी गई थी
    उस नाल के तम को
    रिसता हुआ अस्तित्व में, कभी महसूस किया है?
    अनादि प्रकाशहीनता से जुड़ने की मन की ललक
    नहीं होती हर बार अवसाद की निशानी
    यह होती है पिंड की ब्रह्माण्ड में
    खो जाने की लालसा
    और मृत्यु के पीछे छुपे जीवन की पुकार
    अंत को किया गया अनंत का आवाहन।

  • emortal 9w

    ज़िन्दगी

    तुम हो बहुत कुछ मेरी कविताओं जैसी,
    कभी तुकांत,
    आसानी से पड जाती हो पल्ले,
    या समझ जाने का एक भ्रम ,
    कम से कम,
    रख जाती हो मन में
    कभी कभी मुक्तछंद जैसी,
    सादी सी पंक्तियों में,
    कई राज़ छुपाएं हुए,
    छू के गुज़र जाती हो,
    समंदर की खारी सिली हवा जैसे,
    किनारों के रेत सी,
    हाथ में हो भी,
    और नहीं भी।
    ©emortal

  • emortal 11w

    Like Love

    Storms and thunders may,
    Upset calmness of river,
    but it'll flow forever.
    ©emortal

  • emortal 13w

    कुछ आलसी सी हो गई है सड़क,
    जो मै देखता हूं अपनी खिड़की से,
    सन्नाटे का लिहाफ ओढ़े देर तक
    सुस्ताती रहती है।

    उस लिहाफ को रोज़ फाड़ देती
    कुछ कर्कश आवाजें
    नदारद है आजकल
    पौ फटते ही जो जगा देती थी उसे।

    अब पंछी भी आके बतिया लेते है उससे
    पर इस खामोशी की वजह नहीं पता
    उन्हें भी।
    शायद उसके रचियता को
    अपने स्रष्टा की शक्ति का अहसास हो गया है
    ©K Prashanth

  • emortal 13w

    गुलमोहर

    वैशाख तप्त इस वसुधा पर
    अरुण लालिमा धारण कर
    याद दिलाए तव कपोल
    वह मौन मुदित एक गुलमोहर

    स्मित वदन पर दुःखी नयन
    जैसे बिछोह में जलता मन
    शब्दहीन सी व्यथा लिए
    वह मौन मुदित एक गुलमोहर

    प्रेमीजन को गुलाब प्यारे,
    कोई चाहे चंदा तारे
    मेरे मन का प्रियतम ठहरा
    वह मौन मुदित एक गुलमोहर

    उष्ण थपेड़ों को सहता
    वैशाख अग्नि में वो जलता
    वर्षा से मिलन की लिये आस
    वह मौन मुदित एक गुलमोहर
    ©K Prashanth & Vibhavari Bhushan

  • emortal 14w

    Some smiles, when gone, leave your eyes moist and heart shattered......