#badhaii

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  • jigna___ 7w

    #janmashtmi #badhaii ��������❤️❤️

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    गवाक्ष द्वारिका नगरी के एक कक्ष का, कक्ष महारानी रुकमिणी का, नेपथ्य में मोर गहक रहा है, मंच पे कृष्ण एवं रुकमिणी शोभायमान है, कृष्ण रुकमिणी के बालों को सहला रहे है.....,

    रुकमिणी:-
    एक बात बताओ हरि,
    तुम व्यक्ति बड़े विशेष,
    जो हस्त परास्त करे अरि,
    सहजता से सजाते केश?



    कृष्ण मंद मुस्कुराकर बोले:-
    सुनो मेरी हृदयप्रिया,
    प्रेम के सारे रूप,
    प्रेम स्वरूप बदल दे,
    सुंदर बने है कुरूप।

    रुकमिणी थोड़ा मुँह फुलाकर बोली:-
    एक बात बताओ मनमोहना,
    तुम बात बदल क्यों देते,
    मैं प्रश्न पूछूँ कोई अलग,
    तुम उत्तर और ही देते।

    कृष्ण मनुहार करते:-
    सुनो मेरी प्राणप्रिया,
    जो तुम ना समझो तो कौन?
    प्रश्न सहस्र हो या अधिक,
    मेरा उत्तर सदैव एक है न?

    रुकमिणी असहजता से:-
    मैं लक्ष्मी हूँ चंचला,
    स्थिरता की याचक,
    सरल उत्तर दो प्रभु,
    परम ज्ञान की याचक।

    कृष्ण सहसा खड़े हो अलौकिक आभा लिए:-
    मैं ज्ञान का सार, मैं सीधा सा ग्वाला,
    मैं विराट विश्व रूप, मैं प्यारा सा बाला,
    रुकमिणी का हृदय मैं, सत्यभामा का श्वास,
    अर्जुन का परम सखा ना करता हूँ परिहास,
    कुरुक्षेत्र में खोजोगे, मिलूँगा बन के काल,
    मथुरा या द्वारिका में क्षत्रिय और प्रतिपाल,
    मीरा सा समर्पण दोगे मैं प्रदान करूँ मुक्ति,
    राधा सा आत्मस्थ करो, बस सहेजो भक्ति,
    परम योद्धा को प्राप्य नहीं, गोपी की गाली खा लूँ,
    ईश्वर हूँ अपितु प्रिये भक्ति में परम सुख मैं पा लूँ,
    प्रेम हूँ, प्रेम दूँ, प्रेम लूँ,
    मिलता हूँ बस प्रेम में,
    व्रज की रज, द्रौपदी के वस्त्र, मोरपंख, मुरली ना कोई अस्त्र,
    जीवन सफल,
    बस एक तुलसी दल,
    जान लो यह रीत,
    कृष्ण बस परम प्रीत!!!!!

    कृष्णार्पणमस्तु, जन्माष्टमी की बधाइयाँ।

    Jignaa
    ©jignaa__