#hindi_panktiyaan

1317 posts
  • anita_sudhir 22h

    स्वास्थ्य

    दोहावली

    तन साधन है कर्म का,मिला हमें उपहार।
    स्वास्थ्य पूंजी जान कर,शुद्ध रखें आचार।।

    स्वास्थ्य सुख की चाह में,मची योग की धूम।।
    गर्व विरासत पर हमें,भारत माटी चूम ।

    सूर्य किरण सँग जागिये,करिये आसन योग।
    प्रकृति चिकित्सा खुद करे,उत्तम जीवन भोग।।

    योग साधना चक्र की,मन हो मूलाधार।
    स्वास्थ्य मन का श्रेष्ठतम, यही धर्म आधार।।

    अग्नि तत्व मणिपुर सधे,योग साधना तंत्र।
    साधक मन को साधते,जपें सूर्य के मंत्र ।।

    करते प्रतिदिन योग जो ,रहें रोग से दूर।
    श्वासों के इस चक्र से,मुख पर आए नूर ।।

    आसन बारह जो करे,होता बुद्धि निखार ।
    सूर्य नमन से हो रहा ,ऊर्जा का संचार ।।

    पद्मासन में बैठ कर ,रहिये ख़ाली पेट।
    चित्त शुद्ध अरु शाँत कर,करें स्वयं से भेंट।।

    ओम मंत्र के जाप से ,होते दूर विकार।
    तन अरु मन को साधता,बढ़े रक्त संचार।।


    अनिता सुधीर आख्या
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 2w

    चित्रण

    प्रेम और बेरोजगारी

    बाली उमरिया देखिए, लगा प्रेम का रोग ।
    साथ चाहिए छोकरी,नहीं नौकरी योग ।।

    रखते खाली जेब हैं,कैसे दें उपहार।
    प्रेम दिवस भी आ गया,चढ़ता तेज बुखार।।

    दिया नहीं उपहार जो,कहीं न जाये रूठ।
    रोजगार तो है नहीं,उससे बोला झूठ ।।

    स्वप्न दिखाए थे उसे,ले आऊँगा चाँद ।
    अब भीगी बिल्ली बने,छुप जाऊँ क्या माँद।।

    साथ छोड़ते दोस्त भी,देते नहीं उधार ।
    जुगत भिड़ानी कौन सी,आता नहीं विचार।।

    भोली भाली माँ रही,पूछे नहीं सवाल ।
    बात बात पर रार है, करते पिता बवाल।।

    नहीं दिया उपहार जो,साथ गया यदि छूट।
    लिए अस्त्र तब चल पड़े,करनी है कुछ लूट।

    मातु पिता का मान अब ,सरेआम नीलाम।
    आये ऐसे दिन नहीं,थामो प्रेम लगाम ।।

    रोजगार अरु प्रेम में,सदा रहे ये तथ्य ।
    दोनों का ही साथ हो ,जीवन सुंदर कथ्य ।।

    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 4w

    षड़यंत्र

    आज विदेशी ताकतें, खूब रचें षड़यंत्र।
    सत्य झूठ के फेर में,घूम रहा जनतंत्र।।

    तर्क बुद्धि रख ताक पर,रचते रहे कुचक्र।
    राजनीति हित साधती,चाल सदा से वक्र।।

    दूध धुला अब कौन है,लगा मुखौटे आज।
    खेल खेल षड्यंत्र का,चाह रहे सब ताज।।

    पासे शकुनी फेंकता,फँसते पक्ष विपक्ष।
    कब तक का षड्यंत्र है,प्रश्न पूछते यक्ष।।

    राजनीति के क्षेत्र में,घुट घुट मरता साँच ।
    खबर बिके बाजार में,करें तीन अरु पाँच।।

    अनिता सुधीर
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 4w

    बजट

    भानुमती का खोल पिटारा
    बाहर आया जिन्न

    नचा रहे हैं बड़े मदारी
    नाचें छम छम लोग
    तर्क पहनता नूतन चोला
    कहता उत्तम योग
    वायुयान में बैठ विपक्षी
    आज हुए हैं खिन्न।।
    बाहर आया जिन्न

    दाल गलाए जनता कैसे
    नायलॉन का मेल
    टुकुर टुकुर वो बगले झाँके
    रहे आँकड़े खेल
    सोच रहे हैं अमुक फलाने
    स्वप्न हुए अब छिन्न।।
    बाहर आया जिन्न

    अर्थ पड़ा बीमार कभी से
    कबसे रहा कराह
    बाजार उछलता जोरों से
    लाया नया उछाह
    सत्य झूठ आपस में लड़ते
    बुद्धि रखें हैं भिन्न।।
    बाहर आया जिन्न

    अनिता सुधीर आख्या
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 21w

    चिरैया

    रंग महल में कैद चिरैया

    व्यथा देख फिर दर्पण सहमा
    रंग महल में कैद चिरैया

    तूल बखेड़ा जिह्वा करती
    कटती जब भी अँधियारे में
    अधर सिले तुम मौन सदा से
    इन महलों के गलियारे में
    रिक्त रही अधरों की लाली
    कब ये गाती गीत सवैया।।
    व्यथा देख...

    अनगिन वार नुकीले सह कर
    बनी महल की पाषाणी सी
    दृग कोर भिगोती धीरे से
    फिर सुमधुर हँसती वाणी सी
    शृंगार तभी उपहास करे
    दृग्जल भरते ताल तलैया ।।
    व्यथा देख..

    आभूषण का बोझ उठाकर
    हँसी कुँवारी बैठी कबसे
    उर खिड़की पर भारी परदा
    धूप उदासी रहती तबसे
    सत्य छिपा कर मौन रही जब
    घर की काटे नित्य बरैया।।

    अनिता सुधीर आख्या
    ©anita_sudhir

  • lovelypriya 27w

    ❤बनारस ❤

    बसते शिव हर एक के मन में,
    त्रिशूल पर उनके बसा है बनारस।
    वरूणा और असि का मिलन,
    गंगा की विपरीत धार है बनारस।
    संकरी गलीयों की भीड़-भाड़
    घाट किनारे का सुकून है बनारस।
    अस्सी का सुबह-ए-बनारस,
    दशाश्वमेध की गंगा आरती है बनारस।
    ज़ोया-कुन्दन के इश्क़ का अागाज़,
    दिपक-शालु का अधूरा प्यार है बनारस।
    दूर मस्जिद से आती अज़ान,
    मंदिर के घंटियों की आवाज़ है बनारस।
    मृत्यु भी उत्सव सा दिखता जहाँ,
    सदियों से सुलगता वो महाशमशान है बनारस।
    महात्मा बुद्ध का प्रथम उपदेश,
    जीवन का सारा ज्ञान है बनारस।
    किशन महाराज के तबले की थाप,
    रवि शंकर के सितार की धुन है बनारस।
    सितारा देवी के नृत्य की ताल,
    गिरिजा देवी की ठुमरी का सुर है बनारस।
    प्रेमचंद के सामाजिक साहित्य की गहराई,
    हरिश्चंद्र के आधुनिक हिंदी का प्रमाण है बनारस।
    घाट की कुल्हड़ वाली चाय,
    VT का कोल्ड कॉफी है बनारस।
    चटपटा टमाटर चाट, कचौड़ी गली की कचौड़ी
    सर्दियों की मीठी मलाईयो है बनारस।
    'पहलवान लस्सी' की स्वादिष्ट लस्सी,
    पंचमेवा, केसर, नवरत्न, जर्दे वाला पान है बनारस।
    सबके लबों पर महादेव का नाम,
    मोक्ष प्राप्ति का अद्भुत धाम है बनारस।

    ©lovelypriya

  • lovelypriya 28w

    समझते हो क्या?

    प्रेम विरह में,
    प्रेमीयों द्वारा रचित कविताएँ,
    केवल कविताएँ नहीं,
    बल्कि,
    अपने प्रेमी से अनकही बातें ,
    और शिकायतें होतीं हैं,
    मगर,
    जब ये शिकायतें कम हो जाएं,
    तो इसका अर्थ समझते हो क्या?

    ©lovelypriya

  • lovelypriya 28w

    गलत

    कुछ लोग मुझे कहते हैं
    मैं गलत हूँ
    तो उन्हें बता दूँ
    कि शायद मैं गलत हूँ
    क्योंकि.....
    अपने सपनों को पूरा करना
    अगर गलत है
    तो हाँ मैं गलत हूँ
    अपनी मर्जी के काम करना
    अगर गलत है
    तो हाँ मैं गलत हूँ
    अपने पसंद के कपड़े पहनना
    अगर गलत है
    तो हाँ मैं गलत हूँ
    खुद के लिए सजना सवरना
    अगर गलत है
    तो हाँ मैं गलत हूँ
    अपनी इच्छाओं का दमन न करना
    अगर गलत है
    तो हाँ मैं गलत हूँ
    अपने आत्मसम्मान के लिए बोलना
    अगर गलत है
    तो हाँ मैं गलत हूँ
    दोस्तों संग खिलखिलाकर हंसना
    अगर गलत है
    तो हाँ मैं गलत हूँ
    कुछ पल खुद के लिए जीना
    अगर गलत है
    तो हाँ मैं गलत हूँ


    ©lovelypriya

  • anita_sudhir 33w

    'शब्द युग्म ' का प्रयास

    चलते चलते
    चाहों के अंतहीन सफर
    मे दूर बहुत दूर चले आये
    खुद ही नही खबर
    क्या चाहते हैं
    राह से राह बदलते
    चाहों के भंवर जाल में
    उलझते गिरते पड़ते
    कहाँ चले जा रहे है ।

    कभी कभी
    मेरे पाँवों के छाले
    तड़प तड़प पूछ लिया करते हैं
    चाहतों का सफर
    अभी कितना है बाकी
    मेरे पाँव अब थकने लगे है
    मेरे घाव अब रिसने लगे है
    आहिस्ता आहिस्ता ,रुक रुक चलो
    थोड़ा थोड़ा मजा लेते चलो।


    हँसते हँसते
    बोले हम अपनी चाहों से
    कम कम ,ज्यादा ज्यादा
    जो जो भी पाया है
    सहेज समेट लेते है
    चाहों की चाहत को
    अब हम विराम देते है
    सिर्फ ये चाह बची है कि
    अब कोई चाह न हो ।

    #hindilekhan#tod_wt#panchdoot_news
    #mirakee#hindi_panktiyaan
    #writerstolli#pod#hindii
    #Hindiwriters#hind#panchdoot
    #panchdoot_social#image

    Read More

    चलते चलते
    चाहों के अंतहीन सफर
    में दूर बहुत दूर चले आये
    खुद ही नही खबर
    क्या चाहते हैं

    ©anita_sudhir

  • lovelypriya 33w

    अरसा हो गया

    घर पर बैठे-बैठे अरसा हो गया,
    काम पर गए अरसा हो गया,

    दोस्तों को गले लगाए अरसा हो गया,
    संग उनके सेल्फी लिए अरसा हो गया,

    अस्सी घाट गए हुए अरसा हो गया,
    सीढ़ियों पे बैठ चाय पिये अरसा हो गया,

    क्लास के लिए भाग-दौड़ किए अरसा हो गया,
    हास्टल में आधीरात मैगी खाए अरसा हो गया,

    देर रात तक बातें किए अरसा हो गया,
    सुबह जगने के लिए अलार्म लगाए अरसा हो गया,

    बिना डरे घर के बाहर गए अरसा हो गया,
    सच कहूं तो खुल कर जिए अरसा हो गया।।

    ©lovelypriya

  • shantanu_kodape 40w

    २६ जून २०१७ को लिखित और फेसबुक पर पूर्व प्रकाशित मेरी एक पुरानी कृती है, जो आज भी उतनी ही वैध लगती है।
    "ईद मुबारक"
    #festival #eidmubarak #communalharmony #urdu #hindi #hindinama #hindi_panktiyaan #kalamkaar #kaarvaan #ruuhaniyat #rekhta #poetrycommunity #poetsociety #rekhtafoundation #urduhindi_poetry #humwatan_in #hindipoetry #poetsofinstagram #writersofinstagram #writersofindia #writersnetwork #hindiwriters #readwriteunite #_unpostedletters

    Read More

    आओ ईद के दिन कुछ ऐसा कर दिखाएं।।
    मुसलमान मंदिर में आरती गाएं,
    हिन्दु मस्ज़िद में सिर झुकाएं।
    खत्म कर द्वेष, द्वन्द का विलाप,
    सारी दुनिया को मधुर बाँसुरी सुनाएं।
    आओ ईद के दिन कुछ ऐसा कर दिखाएं।।

    वक्त है साथ चलने का,
    राष्ट्र निर्माण के लिए खुद को बदलने का।
    पहला कदम खुद अपना ही बढ़ाएं,
    आओ ईद के दिन कुछ ऐसा कर दिखाएं।।

    अकसर चंद लोगों का, प्रतिबिम्ब बन जाता है समाज।
    कुछ लोगों के कुकर्मों की, चोट खाता है पूरा समाज।
    इस झूठे अक्स को हटाकर, राष्ट्र को विश्व का चेहरा बनाएं।
    आओ ईद के दिन कुछ ऐसा कर दिखाएं।।

    ©shantanu_kodape

  • meri_panktiyan 46w

    हो रही है बात अगर अधिकारों की,
    तो कुछ सवाल मैं भी पूछ लूं,
    है तो मेरा भी ये अधिकार,
    दायित्व क्यों नहीं पहले आते,
    घेरा बनेगा, तभी तो उसमें अधिकारों के लिये द्वंद होगा।
    ©meri_panktiyan

  • meri_panktiyan 48w

    मेरे दिल से आज वो डर निकल जायेगा,

    था जिसके जाने का डर, आज वो दूर चला जायेगा।


    ©meri_panktiyan

  • katara_rakesh 53w

    उदास दिल की
    इक खासियत होती है,
    इसका पूरा ध्यान
    बस उदासी पे होता है ।

    ©katara_rakesh

  • ashish_augustus 53w

    ये कदम जो चलते है किनारे - किनारे उन घाट की सीढ़ियों पे, अगर जो समझ जाए बहती नदियों का राज तो मन की हर गांठ सुलझ जाए। सरल शब्दों में कहें तो कल जो बीते थे पल जाने - अज़ाने अपराध मुख वक़्त में, जिसका खामियाजा हम आए दिन भुगतते है उससे राहत मिल जाए। पर लोग तो यही कहते है, हम तो अब भी भुगत रहे है, क्या हुआ वो स्नान ध्यान का? तो जनाब आप अब भी अपराध मुख वक़्त में ही जी रहे है, जहां हर अंक एक कर्म से बंधा है और इसमें कोई दो राय नहीं कि ये समय मनुष्य के दुष्कर्मों से ग्रस्त है। तो कभी अगर समय मिले तो एक शुक्रियादा जरूर करे उन नदियों का जो दिशा दिखाती है, ना सिर्फ जीवन के साथ ही पर जीवन के बाद भी।
    ©आशीष
    #mirakee
    #hindi_panktiyaan
    #soulwriter
    #hindipoetry
    #hindipoem
    #hindikavyasangam
    #hindiwriters
    #hindilekhan
    #hindiwriterslink

    Read More

    घाट किनारे

  • meri_panktiyan 58w

    इस रात भी मुझे सोना है,
    सपनों में फिर से खोना है,

    कह दूं सपनों में तुमसे कुछ,
    हकीकत में जो नहीं होना है।


    ©meri_panktiyan

  • anita_sudhir 64w

    पंच तत्व निर्मित जगत,चेतन जीवन सार
    दूर करें पाखंड जो , मन हो एकाकार।

    ©anita_sudhir

  • meri_panktiyan 64w

    मेरी ज़रूरतों में तुम्हारा नाम शामिल है,

    और तुम्हे पाने के तरीकों में कई इम्तिहान शामिल है।


    ©meri_panktiyan

  • meri_panktiyan 64w

    ज़िन्दगी के इस मोड़ से एक सबक लेता हूं,

    सबको छोड़ कर, अब अपने को समय देता हूँ।


    ©meri_panktiyan

  • anita_sudhir 64w

    दोहागजल

    जीवन ऐसा ही रहा ,जैसे खुली किताब,
    कुछ प्रश्नों के क्यों नहीं,अब तक मिले जवाब।

    पृष्ठ बंद जो है रखे,स्मृतियाँ उनमें शेष,
    मिलन अधूरा रह गया,हुये न पूरे ख्वाब।

    रीति निभा के प्रीत की,क्यों थी मैं मजबूर,
    समझे नहिं दिल की व्यथा,रूठे रहे जनाब।

    प्रेम चिन्ह संचित करे,विस्मृत नहीँ निमेष ,
    फिर कैसे वो खो गये ,सूखे हुये गुलाब ।

    चाहा था हमने सदा,सात जन्म का साथ,
    सुलझ न पायी जिंदगी,ओढ़े रही नकाब।

    नहीं मिला इस जन्म भी,मुझको तेरा प्यार,
    बेताबी के पल रहे,कैसे करें हिसाब।

    ©anita_sudhir