#labour

120 posts
  • aparnart 3w

    Labour

    God lay equal eyes on us .
    But we divide some people according to status .
    One who does the work limitless, Always have a sense of hopelessness. She donates her life to us for care, Always manage the life of dare.
    Labours can be vice or wise,
    Depend upon us, how we make them ride.
    Ride to the world of agitation or compensation.
    Even they don't need our valuable gems.
    They do the work conspicuously,
    To make our life run continuously.
    They perform menial jobs,
    through which we could sustain our life.
    They are ideal for appreciation.....
    Not for hard regulation
    ©aparnart

  • qawi_khan 5w

    Slaves Branded by Sun

    Oh it was daunting fierce day, the blazing sun
    Was not happy apparantly baked many buns
    A land ahead my face demanded destruction
    Of those old bricks standing weak in arson
    Two men with wet souls took the job in greet
    For me it was sweat but cool for them in heat
    Season dry was dreadful no man getting paid
    Perform any risk for living was no man afraid
    Burning their skin the men wore nothing back
    Murmuring tones were alien to me like Slovak
    The sound it hit the bricks captured my drums
    More flamboyant my eyes got still for thrums
    Not any lame excuses for break they asked
    Not any pathetic sympathy they got in facade
    The sole solemn was the pure rill they drank
    As like as ambrosia which pour a thirsty tank
    It was leather on the skin nurtured due to the
    Branding on the whole body done by the sun
    It was not one day the slaves put body to burn
    This was the proof of slavery they had done
    No mercy was bestowed upon those blokes
    For no sake the Red God raised the convoke
    Of the feared ear melting winds which haunts
    The weak pups inside dwellings who abscond
    But for those tough iron fists all it was worth
    To finally get their living getting out of dearth
    Now I felt the warmth of the day and decided
    To leave the scene there closing my eyes
    But the labour still continued working besides
    ©qawi_khan

  • d_anie_99 12w

    Ps + #adobesparkpost
    #भगवान के #उम्मीद मे मत रहो, हो सकता है भगवान खुद तुम्हारे उम्मीद लिए बैठा हो की ये खड़ा होकर कुछ करेगा, तो में उसका #साथ दूंगा। एसे सोए रहने से क्या होगा? उठो कुछ करो।
    #motivationalquotes #labour #strong

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    ©d_anie_99

  • sanchit_halder 14w

    दो मुठी बैल

    बैल श्रमी जो खेत जोताऐ,
    श्रम के काय फल पाएं,
    दो मुठ्ठ चारा ले सो सुख पाऐं,
    कृषि जो मुठ्ठभर चारा खिलाएं,
    फसल उठा वोही ले जाए,
    कृषि तो श्रमी ही कहलाएं,
    दो मुठी बैल तो केवल उपाय।
    ©sanchit_halder

  • deepaksamds67 15w

    हिसाब होगा

    आएगा वो दिन भी जब किरदार बदलेंगे,
    हक में जो हैं सभी वो हथियार बदलेंगे।

    हिसाब होगा तब उस कयामत के रोज,
    जग के खेवनहार जब पतवार बदलेंगे।

    रखो जरा तुम भी पाप पुण्य का हिसाब,
    ये जो खरीदे हैं सभी दण्डधार बदलेंगे।
    ©deepaksamds67

  • originals_thoughts 16w

    गए थे अपनी दुनिया छोड़ दूसरे शहर में पैसा कमाने।।
    मजबूरी ऐसी आई के गांव लौटना पड़ा लगा कर घरों के ताले।।
    #miraquill #mirakee #shayar #Shayari #thoughts #poetry #sadshayari #village #city #labour

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    Village vs City

  • abhi_saxena 17w

    नफ़रत

    ख़ुदा से नफ़रत सी होने लगी है अब मुझे ,
    वो भी मुफ़लिसों पे ही अपना कहर बरसा रहा ।
    ©abhi_saxena

  • aaftab1995 18w

    #labour's will
    #Ask the सरकार
    # जिंदगी

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    Labour's कलम

    कफ़न से अच्छा कोई वाजिब सलीका नहीं दिखा
    मुझे अपनी भूख को ढकने का,
    तुम बस मुझे क़ब्रगाह पहुंचा दो
    वहां अपना हक मांग लूंगा उससे
    यहां तो सभी भगवान बने बैठे है।
    ©aaftab1995

  • 1992sakshi 18w

    भूखे हैं साहब ;
    कई दिनों से;
    बहुत भूखे हैं;
    बहुत चल लिए ;
    थक चुके है अब!
    शरीर में जान नहीं बची अब और;
    ग़रीब का चेहरा देखा हैं आपने कभी?
    देखकर करेंगे भी क्या!
    कुरुपी दिखने लगे हैं अब हम;
    हमारे चेहरों पर सिर्फ गरीबी और लाचारी की ख़ूबसूरती दिखेगी;
    क्या कभी वाक़िफ हुए हैं आप;
    ऐसी ख़ूबसूरती से?
    नहीं ना?
    तो अाइए हम आपको रूबरू करवाते हैं;
    भूख से पेट ... पीठ से जा लगा हैं;
    कई रात दिन पैदल चल चल कर;
    शरीर ढांचे में तब्दील हो गया हैं;
    थकान से;
    आंखें सुर्ख स्याह लाल पड़ गई हैं;
    चिलचिलाती धूप से;
    रंग काला पड़ गया हैं;
    आंखे और गहरी गढ़ों में धस्स गई है;
    होठ प्यास से सूखकर पपड़ी जैसे हो गए हैं;
    देह अब हार मान चुकी हैं;
    ऐसी हैं हम बदनसीबों की ख़ूबसूरती;
    .............................................................................
    मेहनत करने अपना गांव, घर बार सब पीछे छोड़ कर निकले थे;
    सुना था...कि शहरों में रोज़गार आसानी से मिल ही जाता है;
    बस यही उम्मीद लेकर आए थे;
    साहब हम गरीब जरूर है;
    मगर उसके साथ साथ इंसान भी है;
    हमारी भी जान है;
    हमें भी दर्द होता है;
    तकलीफ़ होती है;
    हम भी मिलो दूर यूं पैदल चलकर;
    भूखे पेट थक जाते है;
    मज़दूर है ना ;
    इसलिए मजबूर है;
    अमीर घरानों में जन्मे होते;
    तो हमे भी सहायता दी जाती;
    जैसे आप अपने लोगो को बाहर देश से लाने;
    के लिए सहायता दे रहें हैं;
    पर हम उसमे भी ख़ुश हैं
    की जो कुछ भी थोड़ी बहुत मदद नसीब हो पाईं;
    आपकी तरफ़ से;
    लेकिन मौत तो जैसे साए की तरह;
    हमारे सिर के ऊपर मंडरा रही हो;
    मौका मिलते ही ;
    भूखे शेर की तरह;
    ऐसे झपट्टा मार रही हैं;
    मानो जैसे हम गरीबों की ही जान कि प्यासी हो;
    .............................................................................
    बचाने तो जान निकले थे इन शहरों से;
    लेकिन क्या पता था?
    बीच सफ़र में ही किस्मत साथ छोड़ देगी;
    और ना शहरों के रहें पाएंगे ना गांव के;
    अब तो हालात ऐसे;
    के दुख़ ,
    लाचारी,
    बेबसी,
    भूख,
    तड़प,
    ग़रीबी,
    देखकर ख़ुद पर रोना आता हैं;
    ग़रीब की जान हैं ना साहब;
    ना ऐसे बच पाएगी ना वैसे;
    हर हालत में मरना गरीब को ही पड़ेगा...!!
    ..............................................................
    ©1992sakshi

    @mirakee #hindilekhan#feeling#sad#unhappy#labour hindiwriting#poetry#pod#mirakeeworld#writersnetwork#
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    मज़दूर का दर्द (part-2)

    ©1992sakshi

  • 1992sakshi 18w

    हमारी भी कुछ ख्वाहिशें हैं साहब;
    कुछ उम्मीदें हैं ;
    मजबूरियां खींच लाई थी इन शहरों में ;
    क्या पता था एक दिन जान बचाने के लिए भी ;
    जान जोख़िम में डालनी पड़ेगी इस तरह.!
    कुसूर क्या है हमारा?
    बस इतना ही ना...!
    के जन्मे हैं गरीब घरों में;
    लेकिन भीख़ मांगने सड़कों पर तो नहीं निकले ना?
    अपना खून पसीना बहा कर आपके बड़े बड़े महल तैयार करते हैं;
    ख़ुश थे दो वक़्त की सूखी रोटी से भी;
    क्या पता था ख़ुदा हम गरीबों के साथ;
    ऐसी आंखमिचौली खेलेगा;
    के तरस जाएंगे उस दो वक़्त की सूखी रोटी को भी;
    रोटी तो दूर की बात हुई;
    अब तो हालात यहां आ पहुंचे;
    की पानी भी नसीब नहीं ;
    प्यास से गला सूख गया है;
    .............................................................................
    असली वायरस का दर्द और खोऊफ़ तो हम बदकिस्मत झेल रहे हैं ;
    आप बड़े लोग हो;
    आप फ़ुरसत से अपने घरों में अपने परिवार के साथ रह रहे हों;
    बावजूद उसके आपका घरों में दम घूट रहा है;
    इस गरीब से आकर तो पूछो एकबार;
    की क्या महसूस कर रहा है ये लाचार;
    मिलो पैदल चलने का दर्द;
    इस धूप की तपस में;
    बस चलते जाना;
    चलते जाना;
    मन में सिर्फ और सिर्फ हिम्मत और हौसलों के दम पर;
    इसी आस में की कभी तो पहुंच ही जाएंगे;
    अपनी मंजिलों तक;
    उन सड़कों से तो जाकर पूछो एक बार;
    वो भी रो पड़ी;
    हमारी लाचारी देखकर;
    इतनी बेबसी तो गरीब होने पर भी नहीं महसूस हुई साहब कभी;
    .............................................................................
    मैं पूछता हूं आपने कभी भूख महसूस की है?
    उन सब बड़े लोगो से पूछ रहा हूं;
    यहां मैं ये भी बता दूं ;
    मैं उस भूख की बात नहीं कर रहा ;
    जो स्वादिष्ट भोजन मिलने पर या दिखने पर लगती है;
    बल्कि उस भूख की;
    जब कई दिनों तक भोजन ना मिलने पर अंतड़ियां पेट से; बिल्कुल चिपक जाती हैं;
    और आत्मा अंदर से रोती है और कहती है;
    की तू गरीब.........
    पैदा ही भूख से मरने के लिए हुआ हैं;
    यहां अमीरों और पैसों वालों की दुनिया में;
    कोई नहीं जिसकी तुझपर नज़र जाए!!
    .............................................................................
    ©1992sakshi

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    मज़दूर का दर्द (part -1)

  • incommunicado 19w

    Majdoor tha pehle ab majboor bhi hai,
    Bhatak raha Rahageer bana, ghar se door bhi hai

    Please share this so that word can reach as many people possible
    #labour #giveindia #iforindia @mirakee @writersnetwork #mirakee #pod

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    .

  • yogesh_gupta 19w

    बिखरती जिन्दगी

    फूल सी जिन्दगी बिखर रही,
    सँवार लो कोई  दूत बनकर
    भूखे बिलखते बचपन को , गोद ले लो कोई
    चल पड़े कारवाँ शहरों से रुसवा हो कर
    फूल सी जिन्दगी बिखर रही,  सँवार लो कोई  दूत बनकर

    कोई पैदल, कोई साईकल, कोई रिक्शे पर
    खिंचता ,परिवार को, कोई बैल बनकर
    पानी को तरसते, कभी पेड़ की छाँव मे,
    बैठे कभी सड़क किनारे आशा लगाकर
    भेजेगा रब, किसी को तो दूत बनाकर
    फूल सी जिन्दगी बिखर रही,  सँवार लो कोई  दूत बनकर

    तड़फती माँ, छुपाती कभी आँचल मे लाडले को
    परेशान पिता, पीठ , तो कभी कन्धों पर बैठाकर
    चल पड़े कारवाँ अपने संसार मे सिमटकर,
    भूख से बिलखते बच्चों को गोदी मे उठाकर
    आशा मे कोई तो आएगा देव दूत बनकर
    इक रोटी ना सही,  जल का पात्र भरकर
    फूल सी जिन्दगी बिखर रही, सँवार लो कोई  दूत बनकर
                                 
    ©yogesh_gupta

  • chahat1samrat 19w

    #मजदूर# सियासत

    पसीना भी उन्होंने ही बहाया था
    आंसू भी वहीं बहा रहे थे
    खून भी उन्हें ही बहाना पड़ रहा है
    सब तो वो खुद का बहा रहे है
    इतने कर्ज वो खुद हम पर चढ़ा कर
    सबको,गलियों, घरों को बनाकर

    इस बहाने की दौड़ में
    तुम सियासी दलों ने तो केवल इस
    भूमि का अनमोल जल
    अपनी गाड़ियों को धोने
    में बहाया है
    ©chahat1samrat

  • alpupushkar 19w

    करोड़ो का पैकेज का महल भी वीरान नजर आता हैं,
    जब सड़कों पर थका हारा हिन्दुस्तान नजर आता हैं।

    ©alpupushkar

  • dt1401 19w

    The Lockdown Reality

    Ever since childhood, we have considered India to be one nation. The Constitution guarantees rights to every citizen of our country without any discrimination on any basis. But does our society really allow everyone to practice these rights?

    On 25 March 2020 at 8pm, PM Modi announced the first phase of lockdown. From midnight, the country went into a lull. The citizens were given 4 hours to understand, accept, and react to the lockdown. During these four hours, while the rich people of the country were busy stocking up food supplies and other essentials, there was another section of the society who was still unaware of the lockdown. Even if they were aware, they did not have the resources to fill their homes with essentials. For some, there were no homes also. They did not have much savings, there was no source of money, and they had the responsibility of their loved ones. Future looked grim and uncertain. Labourers of our country form this section if the society.

    Lockdown was announced to prevent country from CORONA but the guidelines were followed by the financially strong section of the society. Be it the norms of social distancing or isolation, only rich practiced it because they could afford to do so. They did not have to worry about the next meal, money, or being cramped in a 10*10 room.

    From 26 March 2020 till date, everyday thousands of labourers are seen walking and cycling hundreds of kilometres, sitting on roofs of trucks, risking their lives every single day because it is the only hope left for them. Pregnant women, young children, aged men and women, differently abled, all are walking in the glimmer of hope that they will somehow reach their home and feel safe. They have no food or water, have boils on their legs, they get beaten by police forces at times, their soul is broken but they are still walking. Hundreds of labourers died in road accidents and crores of them are scarred for life. They are aware that death follows them every day they are on the road but they are ready to take a chance because the only other option left is to die waiting for help, which may never come.

    As a society, we have failed them. Our administration has failed them. Our response towards the plights of labourers has proved that India is not one nation. It is divided between rich and poor, where lives of poor do not matter. Society has turned a blind eye towards them, their tears mean nothing, and their cries are falling on deaf ears. And all this happened just because they want to go HOME - the safest place on earth where one feels loved, secure, and away from worries. The labourers just want to go home, be with their loved one, and feel safe. As a society, we should ponder on- Are they asking for too much?
    ©dt1401

  • sunil_swami 19w

    ● मजदूर ●
    चलकर पैदल कई मीलों का सफर
    चले जा रहे थे अपने घरों की और
    दो रोटी की तलाश में गाँवो से वो
    शहरों में भटके जा रहे थे हर और

    ना पूछा उन शहरों ने हाल उनका
    ना जानी उनकी व्यथा की कहानी
    ना सुनी किसी ने चीखों की वो गूँज
    जबकि था गहरा उन आँखों का पानी

    नाप दिए पैदल ही उस लंबाई को
    जिसपर था उन सड़कों को गुरुर
    मीलों के उस सफ़र को बिना रुके
    उन रूखे पैरों ने पूरा किया रातभर

    सियासत की तुच्छ लड़ाई में इनको
    बना दिया जाता हैं जख़्मी हर बार
    भ्रष्टाचारी दीमकों ने तिजोरी भरकर
    धकेल दिया सड़कों पर इन्हें हरबार

    गर हो ज़िंदगी के संघर्षों की बात
    इनके आँसू ही काफी हैं बताने को
    ना करो गुरुर इस दौलत शौहरत का
    बढ़ाकर हाथ समझें इनकी मजबूरी को

    - सुनिल कुमार स्वामी
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    #Lockdown #migrantworkers #workers #labour #covid19
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    #mirakeeapp #mirakeeposts
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    Pic Credit: Rajasthan Patrika News Paper
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  • pathak01 19w



    वक्त पर कोई घर पहुंच ना सके, काश कोई इतना दूर ना हो..
    जहां कद्र नहीं गरीबों की,
    काश कोई इस मुल्क में मजदूर ना हो...
    ©pathak01

  • manishsen 19w

    #हिन्द #hindipoem #corona #labour

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    मजदूर भाई

    देखो कैसा दृश्य है
    त्रस्त हर मनुष्य है
    काल का ये ग्रास है
    मां की गोद में जान है
    पिता के कंधो पर अभिमान है
    निकल पड़े रास्तो पर
    जो आग से भरे पड़े
    थकान है थकान है
    विश्राम का न नाम है
    ना भूख ना प्यास है
    बस अपने घर पहुंचने की आस है
    देश के लिए एक युद्ध है
    जो देश के विरूद्ध है
    बता दू में दिखा दू में
    मजदूर देश की सदा
    आन बान शान है
    ©manishsen

  • chahat1samrat 19w

    Labour r one who r responsible for economical growth of a country but here����
    #labour
    #humanity
    #dalali

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    मजदूर ???

    सरकार तो अंधी बहरी है ही
    पर केवल उसे ही ना लपेटा जाए
    उससे ऊपर तो खुदा भी है
    उसे क्यों बख्शा जाए
    क्या उनके घर भी अंधेर हो गया है
    इन नन्ही बेटियों की चोटियां झीन गई
    कितने मासूमों की लंगोटिया झीन गई
    कितने घरों की सूखी रोटियां झीन गई
    कितनी नवनवेलियों की चूड़ियां झीन गई
    तुम कहते हो उसकी अदालत में मुकदमा सब पर जारी है
    इन ईमान दिलों के जिस्म को रौंद कर किसके साथ न्याय कर रहे है ये खुदा
    इन मासूमों की दुनिया उजाड़ ,कैसे अदालत चला रहे हैं खुदा
    अब तो खुदा का भी सरकार के रईसों, दलालों से कुछ कमीसन सा लगता है...
    ©chahat1samrat

  • dt1401 19w

    मजदूर

    वाकई तुम मजदूर हो,
    नहीं तो विद्रोह अवश्य करते।

    खेतों की शान तुम्हीं से है,
    कारखानों की जान तुम्हीं से है,
    घरों में तुम हो,बगीचों में तुम हो,बंदरगाहों पर तुम हो,
    ईंट के भट्टे तुम्हीं से है,
    कपड़ा मिलें भी तुम्हीं से हैं।
    हिंदू भी तुम हो, मुसलमान भी तुम हो,
    सिख भी तुम्हीं हो, ईसाई भी तुम्हीं हो,
    देश की हर धड़कन में तुम ही तुम हो ।
    बदले में तुम्हें कुछ मिला क्या??
    पेट की खातिर परदेश जाना मजबूरी थी।
    पेट की खातिर ही घर वापसी भी मजबूरी थी।
    पर घर इतना दूर तो कभी न था।
    हर कदम पर इतनी बाधायें भी कभी न थीं ।
    चुपचाप कट जाते हो रेल की पटरी पर,
    छितरा देते हो अपना लहू सड़कों पर ।
    तुम आवाज भी नहीं देते,
    कौन सुनेगा व्यथा तुम्हारी?
    तुम किसी की प्राथमिकता नहीं हो,
    सड़ी व्यवस्था है हमारी।
    अरे, तुम देश की आधी आबादी हो।
    एकजुट हो जाओ तो सबसे बड़ी ताकत हो।
    तुम्हारी हुंकार अमीरों का हृदय कंपा सकती है ।
    हृदयहीन नेताओं की कुर्सी हिला सकती है ।
    तुम विवश कर सकते हो देश को नीतियां बदलने को!
    क्यों इतना खामोश हो??
    क्यों इतना मजबूर हो??

    वाकई तुम मजदूर हो
    नहीं तो विद्रोह अवश्य करते ।।


    - आर.के. त्रिपाठी