#my_burnt_diary

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  • prakhar_sony 1w

    मैं चीजें कुछ इस तरह बनाना चाहता था।
    सभी के दिलों में जगह बनाना चाहता था।।
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    इक अर्सा हुआ मिरा रात से राब्ता हुए।
    वो मेरी ज़िंदगी में सुबह बनाना चाहता था।।
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    अक्सर मेरे जवाबों ने लोगों को ज़ख्म दिए।
    सो मैं सवालों से सुलह बनाना चाहता था।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 1w

    (15.02.2020)
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    अस्बाब - हालात/कारण
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    ##my_burnt_diary @writer_in_disguise5

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    दिल रखने के लिए अस्बाब बनाने पड़ते हैं।
    हाँ कुछ सवालों के जवाब बनाने पड़ते हैं।।
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    चाहते हैं सब मुकम्मल हो ख़्वाब सारे।
    पर ख़्वाबों के लिए ख़्वाब बनाने पड़ते हैं।।
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    सच कहीं बे-पर्दा न हो जाए डरते हैं।
    ऐसे हालात हैं हमें नक़ाब बनाने पड़ते हैं।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 1w

    ज़ुबां वाले भी अक्सर बेज़ुबां रहे।
    सच तपाक से बोलने वाले कहाँ रहे।।
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    रस्मो-रिवाज़ उसूल अदबो-सलीका।
    सब दिखता है जिस घर में माँ रहे।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 2w

    (9.02.2020)
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    इश्के शबाब - इश्क की सुन्दरता
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    यकीनन इश्के शबाब ज़िन्दा है।
    किताबों में दबे गुलाब ज़िन्दा हैं।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 2w

    भोलेनाथ

    त्याग स्वर्ण महल बने कैलाश के वासी।
    विश्वनाथ बसे अमरनाथ उज्जैन काशी।।
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    कभी नीलकण्ठ तो कभी विषधर हुए।
    भक्त शनि ऋषि कश्यप और रावण हुए।।
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    मस्तक पर चाँद और सर्प गले का हार।
    हाथों में त्रिशूल जिनके जग कहे गंगाधार।।
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    नित्य करे पूजन सब राक्षस हो या देव।
    जय जय भोलेनाथ जय जय महादेव।।
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    -#प्रखर_सोनी#-
    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 5w

    मसला हर तरकीब लाइलाज लग रही है।
    ख़ुदा के बसाए जंगलों में आग लग रही है।।
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    हमें सब चीजें इत्तेफ़ाक़ लग रही हैं।
    हक़ीक़त ख्वाबों के खिलाफ लग रही है।।
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    उमड़ेगा सैलाब सड़कों पे मोमबत्ती लेकर।
    सिनेमाघरों में फिल्म छपाक लग रही है।।
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    नहीं लेती फैसले किसी दबाव में आकर।
    नए ज़माने की पीढ़ी बेबाक लग रही है।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 8w

    (25.12.2019)
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    ज़ीस्त - जिन्दगी
    तिफ्ल - बच्चे
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    हर ओर जंग छिड़ी मज़हब के ख़ातिर।
    ज़मींनों की लड़ाई है रब के ख़ातिर।।
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    ज़ीस्त गुज़ारने को चल रहें हैं रस्सी पे।
    जाँ दाव पे तिफ्ल की करतब के ख़ातिर।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 10w

    (17.12.2019)
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    सिफ़र -शून्य
    बशर -मनुष्य
    सम्त -ओर
    फ़क़त -सिर्फ
    कमर -चाँद
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    कोई लेकर सिफ़र उतरा है।
    कोई लेकर हुनर उतरा है।।
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    देखो आलम-ए-शहर यहाँ।
    दरिन्दगी पे बशर उतरा है।।
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    इस सम्त फ़क़त अंधेरा है।
    क्या कहीं क़मर उतरा है??
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    दरिया की बढ़ती चाहत देख।
    बगावत पे समंदर उतरा है।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 11w

    उसके हिस्से में रौशनी मुमकिन है।
    मिरे दरमियाँ तीरगी मुमकिन है।।
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    सोचता हूँ बेच दूँ मजहबी ख़बर।
    इस मानिंद आमदनी मुमकिन है।।
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    बना रहे रुझान लोगों का प्रखर।
    सो ख़बरों में सनसनी मुमकिन है।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 11w

    मुझे लेना होगा फैसला सबकी तरह।
    तुझे रखना होगा हौसला सबकी तरह।।
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    पूछते हैं तरीके जुदाई के मुसलसल।
    मैं भी हो गया मुआमला सबकी तरह।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 12w

    (29.11.2019)
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    मिट्टी- शरीर
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    ख़बर नई होने में पुरानी, देर कितनी लगती है।
    हक़ीक़त होने में कहानी, देर कितनी लगती है।।
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    किस मिट्टी का गुमान लिए फिरते हो प्रखर।
    मिट्टी होने में मिट्टी, देर कितनी लगती है।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 14w

    (15.11.2019)
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    ताख़ीर -विलम्ब
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    शेर

    चल रही है कुछ ताख़ीर से घड़ी।
    या कहीं मैं वक्त से आगे रहा।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 15w

    (12.11.2019)
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    क़रीने - सलीक़ा
    सफ़ीना - नाव
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    ##my_burnt_diary @writer_in_disguise5

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    कट गए जंगल बिक गयीं ज़मींने।
    पैसों की दौड़ में गुम गए क़रीने।।
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    रास्तों को मंज़िल न समझना।
    क्या ख़ूब लिखा था किसी ने।।
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    चाँदी का या हो सोने का फ्रेम।
    अंगूठियों में रौनक हैं नगीने।।
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    पतवार का हुनर भी है ज़रूरी।
    सिर्फ हवाओं से नहीं चलते सफ़ीने।।
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    आदमी ने बनायी थीं मशीनें।
    आदमियों को खा गयीं मशीनें।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 15w

    (11.11.2019)
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    बे-कस - अकेला
    कफ़स - जेल
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    ##my_burnt_diary @writer_in_disguise5

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    मुझपर नसीहतों का बस नहीं चलता।
    वगरना घर से मैं बे-बस नहीं चलता।।
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    सोना बनाने में लगा है पत्थर से इंसा।
    यहाँ कोई पत्थर पारस नहीं चलता।।
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    उसके दरम्याँ रखना है हाल-ए-दिल।
    वो नादाँ कभी बे-कस नहीं चलता।।
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    क्या करोगे क़ैद आशिक आवारा को।
    मोहब्बत के आगे कफ़स नहीं चलता।।
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    है फज़ूल सब जादू करतब प्यारे।
    ज़िंदगी में प्रखर सर्कस नहीं चलता।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 15w

    ख़ुदा है हल या ख़ुदा ही मसला है।
    इंसानों की बस्ती में ख़ुदा पे फैसला है।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 15w

    मैंने यह फ़ासला तय किया डरते हुए।
    उसकी रूह तक पहुँच गया दिल से गुज़रते हुए।।
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    ©prakhar_sony ©writer_in_disguise5

  • prakhar_sony 16w

    (31.10.2019)
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    सिफ़र - शून्य
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    ##my_burnt_diary @writer_in_disguise5

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    तमाम जलीं बस्तियाँ तो कई शहर रौशन हुए।
    मुद्दतों पड़े बंद इमरोज़ रहगुज़र रौशन हुए।।

    लगा है ज़माना आज लाख करोड़ बनाने में।
    जाने कौन थे वो लोग जिनके सिफ़र रौशन हुए।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 17w

    (24.10.2019)
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    सर्फ़ - ख़र्च/expense
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    फुर्सत के लम्हों में वो शख़्स याद आया।
    वो चश्म वो लब वो नक़्श याद आया।।
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    अब तक रखा कैद इक परिंदा ज़मीं पर।
    आज यकायक तुम्हें अर्श याद आया।।
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    दी ख़र्च उम्र उसे बनाने में इक बाप ने।
    ज़रा बुढ़ापा देख बेटे को सर्फ़ याद आया।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 19w

    (13.10.2019)
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    रमूज़ - इशारा
    जानिब - तरफ/ओर
    हनूज़ - अभी तक
    उरूज - बुलंदी
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    ##my_burnt_diary @writer_in_disguise5

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    शायद आएगा रमूज़ उस जानिब।
    मैं बैठा हूँ हनूज़ उस जानिब।।
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    उस रास्ते फ़क़त काँटे हैं प्रखर।
    हमने तलाशीं उरूज उस जानिब।।
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    ©prakhar_sony

  • prakhar_sony 22w

    बहुत मजबूर होगा उस फैसले से पहले।
    शायद इसलिए आ लगा गले से पहले।।
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    अपनी कहानी से निकाला गया हूँ मैं सुनिए।
    बीच-बीच में न बोलिए पहले से पहले।।
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    क्या सुनायें बज़्म में अपनी जीत के किस्से।
    हार हो चुकी है प्रखर मुकाबले से पहले।।
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    ©prakhar_sony