#panchdoot_news

936 posts
  • anita_sudhir 2w

    चित्रण

    प्रेम और बेरोजगारी

    बाली उमरिया देखिए, लगा प्रेम का रोग ।
    साथ चाहिए छोकरी,नहीं नौकरी योग ।।

    रखते खाली जेब हैं,कैसे दें उपहार।
    प्रेम दिवस भी आ गया,चढ़ता तेज बुखार।।

    दिया नहीं उपहार जो,कहीं न जाये रूठ।
    रोजगार तो है नहीं,उससे बोला झूठ ।।

    स्वप्न दिखाए थे उसे,ले आऊँगा चाँद ।
    अब भीगी बिल्ली बने,छुप जाऊँ क्या माँद।।

    साथ छोड़ते दोस्त भी,देते नहीं उधार ।
    जुगत भिड़ानी कौन सी,आता नहीं विचार।।

    भोली भाली माँ रही,पूछे नहीं सवाल ।
    बात बात पर रार है, करते पिता बवाल।।

    नहीं दिया उपहार जो,साथ गया यदि छूट।
    लिए अस्त्र तब चल पड़े,करनी है कुछ लूट।

    मातु पिता का मान अब ,सरेआम नीलाम।
    आये ऐसे दिन नहीं,थामो प्रेम लगाम ।।

    रोजगार अरु प्रेम में,सदा रहे ये तथ्य ।
    दोनों का ही साथ हो ,जीवन सुंदर कथ्य ।।

    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 3w

    षड़यंत्र

    आज विदेशी ताकतें, खूब रचें षड़यंत्र।
    सत्य झूठ के फेर में,घूम रहा जनतंत्र।।

    तर्क बुद्धि रख ताक पर,रचते रहे कुचक्र।
    राजनीति हित साधती,चाल सदा से वक्र।।

    दूध धुला अब कौन है,लगा मुखौटे आज।
    खेल खेल षड्यंत्र का,चाह रहे सब ताज।।

    पासे शकुनी फेंकता,फँसते पक्ष विपक्ष।
    कब तक का षड्यंत्र है,प्रश्न पूछते यक्ष।।

    राजनीति के क्षेत्र में,घुट घुट मरता साँच ।
    खबर बिके बाजार में,करें तीन अरु पाँच।।

    अनिता सुधीर
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 4w

    बजट

    भानुमती का खोल पिटारा
    बाहर आया जिन्न

    नचा रहे हैं बड़े मदारी
    नाचें छम छम लोग
    तर्क पहनता नूतन चोला
    कहता उत्तम योग
    वायुयान में बैठ विपक्षी
    आज हुए हैं खिन्न।।
    बाहर आया जिन्न

    दाल गलाए जनता कैसे
    नायलॉन का मेल
    टुकुर टुकुर वो बगले झाँके
    रहे आँकड़े खेल
    सोच रहे हैं अमुक फलाने
    स्वप्न हुए अब छिन्न।।
    बाहर आया जिन्न

    अर्थ पड़ा बीमार कभी से
    कबसे रहा कराह
    बाजार उछलता जोरों से
    लाया नया उछाह
    सत्य झूठ आपस में लड़ते
    बुद्धि रखें हैं भिन्न।।
    बाहर आया जिन्न

    अनिता सुधीर आख्या
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 32w

    'शब्द युग्म ' का प्रयास

    चलते चलते
    चाहों के अंतहीन सफर
    मे दूर बहुत दूर चले आये
    खुद ही नही खबर
    क्या चाहते हैं
    राह से राह बदलते
    चाहों के भंवर जाल में
    उलझते गिरते पड़ते
    कहाँ चले जा रहे है ।

    कभी कभी
    मेरे पाँवों के छाले
    तड़प तड़प पूछ लिया करते हैं
    चाहतों का सफर
    अभी कितना है बाकी
    मेरे पाँव अब थकने लगे है
    मेरे घाव अब रिसने लगे है
    आहिस्ता आहिस्ता ,रुक रुक चलो
    थोड़ा थोड़ा मजा लेते चलो।


    हँसते हँसते
    बोले हम अपनी चाहों से
    कम कम ,ज्यादा ज्यादा
    जो जो भी पाया है
    सहेज समेट लेते है
    चाहों की चाहत को
    अब हम विराम देते है
    सिर्फ ये चाह बची है कि
    अब कोई चाह न हो ।

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    चलते चलते
    चाहों के अंतहीन सफर
    में दूर बहुत दूर चले आये
    खुद ही नही खबर
    क्या चाहते हैं

    ©anita_sudhir

  • soumyachandrakar 38w

    ©soumyachandrakar

  • anita_sudhir 63w

    पंच तत्व निर्मित जगत,चेतन जीवन सार
    दूर करें पाखंड जो , मन हो एकाकार।

    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 64w

    दोहागजल

    जीवन ऐसा ही रहा ,जैसे खुली किताब,
    कुछ प्रश्नों के क्यों नहीं,अब तक मिले जवाब।

    पृष्ठ बंद जो है रखे,स्मृतियाँ उनमें शेष,
    मिलन अधूरा रह गया,हुये न पूरे ख्वाब।

    रीति निभा के प्रीत की,क्यों थी मैं मजबूर,
    समझे नहिं दिल की व्यथा,रूठे रहे जनाब।

    प्रेम चिन्ह संचित करे,विस्मृत नहीँ निमेष ,
    फिर कैसे वो खो गये ,सूखे हुये गुलाब ।

    चाहा था हमने सदा,सात जन्म का साथ,
    सुलझ न पायी जिंदगी,ओढ़े रही नकाब।

    नहीं मिला इस जन्म भी,मुझको तेरा प्यार,
    बेताबी के पल रहे,कैसे करें हिसाब।

    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 64w

    परिणय

    मैं तुमसे प्रेम करती हूँ
    तुममें अपना प्रतिबिम्ब
    देखने की कोशिश
    करती हूँ ।
    परिणय के बंधन में बंधे
    उन वचनों को ढूँढती हूँ ।
    तुममें अपना बिम्ब
    तलाशते संग संग
    इतनी दूर चले आये ।
    कभी तुममें अपना
    प्रतिबिम्ब मिला
    कभी वक़्त के आईने में
    कितने ही प्रतिबिम्ब
    बनते बिगड़ते
    गडमड नजर आए ।
    कुछ संजोए है
    कुछ समेटने की कोशिश
    मे बिखरते नजर आए है।
    वक़्त की आंधियों मे
    कुछ बिम्ब धुंधले
    नजर आते है,पर
    मैं तुमसे प्रेम करती हूँ
    उन वचनों में बंधी
    मैं अपना प्रतिबिम्ब
    तुममें ही खोजती हूँ।
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 64w

    आप की नजरें इनायत हो गयी
    आप से मुझको मुहब्बत हो गयी।

    इश्क़ का मुझको नशा ऐसा चढ़ा
    अब जमाने से अदावत हो गयी ।

    तुम मिले सारा जहाँ हमको मिला
    यूँ लगे पूरी इबादत हो गयी।।

    ये नजर करने लगी शैतानियां
    होश खो बैठे कयामत हो गयी।

    जिंदगी सँग आप के गुजरा करे
    सात जन्मों की हकीकत हो गयी।

    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 64w

    पाखंड

    दोहा छन्द
    ***
    सत्य वचन ये मानिये ,असली धन है ज्ञान।
    लिप्त हुआ पाखंड यदि,होये गरल समान ।।

    देवि रूप में पूज के ,करें नारि अपमान।
    कैसा ये पाखंड है ,बिसरे अर्थ महान ।।

    शीत लहर में मर गया ,भिक्षुक मंदिर द्वार ।
    मूरत पर गहने सजे ,.... पाखंडी संसार ।।

    देख कमण्डल हस्त में ,चन्दन टीका माथ ।
    साधु वेश पाखंड जो, लिये नारि का साथ ।।

    लिये धर्म की आड़ वो,करते क्यों पाखंड ।
    कर्मों के इन फेर में ,....भोगे मानव दंड ।।

    मनुज ग्रसित पाखंड से ,लोभ रहा आधार ।
    बनिये बगुला भगत नहि,करिये शुद्ध विचार ।।

    पंच तत्व निर्मित जगत,चेतन जीवन सार
    दूर करें पाखंड जो , मन  हो एकाकार।
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 65w

    आधार छँद - रजनी ,
    विधान -23 मात्रा ( मापनियुक्त मात्रिक )
    मापनी - गालगागा गालगागा गालगागा गा

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    उद्देश्य

    इस जमाने में हवा ऐसी चली है अब ,
    होश खोते जा रहे इन आंधियों में सब।
    भेड़िये अब घूमते चारों तरफ ऐसे,
    बाण शब्दों के चला हम बैठते कैसे।

    क्यों बिना मक़सद जिये हम जा रहे ऐसे
    साँस लेना जिंदगी सोची कहाँ वैसे
    मौत के पहले चलो कुछ कर्म कर जायें
    मौत भी शायद ठिठक कुछ देर रुक जाये

    प्रेम उपवन अब सजे खिलती रहे बगिया,
    तोड़ पाये अब नहीं कोई कभी कलियाँ।
    अब यही उद्देश्य ,जीने का हमारा हो,
    हो खुशी जग में न कोई बेसहारा हो।
    ©anita_sudhir

  • vandna 65w

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    भाग 8

    वो रिश्ता बहुत खास लगा मुझे,बिन रिश्ते के भी जो निभ गया

    अम्मी ने बताया कि उन्होंने मेरे पिता से इस बारे में बात की, उन्हें समझाया कि अनवर निशा से शादी करना चाहता है। वह गालियाँ देने लगे,अनवर को मारने की धमकी देने लगे। मैं भी जिद पर अड़ गई और पीछे नहीं हटी अनवर का निशा के साथ निकाह करवाकर ही मानी।तेरे पिता ने अनवर को खूब पीटा,सारा मोहल्ला हम पर थू थू करने लगा, मुझे लगा कि यह शहर छोड़ देना चाहिये। हम तीनों किसी को बिना बताये जयपुर आ गये। यहाँ मेरा मायका है,इसलिये सब कुछ आराम से हो गया। हमने किसी को निशा का अतीत नहीं बताया है।सब कुछ जानकर मुझे अपने पिता से इतनी नफरत होने लगी कि मैं कुछ बयान नहीं कर सकती।जब अपने घर कानपुर आई, तो माँ पिता से बात करने का मन ही नहीं कर रहा था। मेरे पिता इतने बेशर्म थे कि एक बच्ची के साथ वह सब करते रहे। आँखें गीली और झुकी हुई थी मेरी। मैं घर आकर अपने कमरे में जाकर लेट गई,माँ चाय लेकर आई।मैंने बोला -माँ मुझे वो मिली थी- वो कौन माँ ने पूछा। खोटी लड़की- मैंने ऊँची आवाज में कहा, घर पर मेरे पिता भी थे। आज रविवार का दिन था, मैंने जानबूझकर ऊँची आवाज़ में कहा, ताकि वह सुन सकें।

    दिल ही नहीं खून का हर कतरा है जख्मी
    कैद थी जिसकी जिंदगी चंद हाथों की लकीरों में
    कैद में थी सीता जैसे मर्यादाओं की जंजीरों में

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    खोटी लड़की

    ©vandna

  • vandna 65w

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    भाग 6

    अब हर रात वो एक लाश बनकर दो- दो मर्दो के जिस्म की भूख मिटाती। उसके पति के दोस्त ने उसके पति को पैसा दे देकर अपने और भी दोस्तों को भेजना शुरू कर दिया। निशा बेहद ज़ख़्मी थी, शिकायत करती भी तो किससे।एक दिन हिम्मत कर वो भागकर अपने चाचा के घर चली गई, उसके चचेरे भाई ने भी उसको चरित्रहीन कहकर उसका नाजायज़ फायदा उठाया।वह समझ गई अब यही उसकी नियति है, उसका पति उसके पीछे पीछे वहाँ भी आ गया, उसके चाचा के परिवार को धमकाने लगा, उसके चाचा ने उसे घर से जाने के लिए कह दिया। जिंदगी नरक बन गई थी उसकी, एक वैश्या बन कर रह गई थी वो। उसका पढ़ना लिखना उसके किसी काम नहीं आया, दिमाग काम करना बंद कर चुका था उसका, जो भी मिलता उसकी मदद के बदले में उसका जिस्म चाहता। किस पर भरोसा करती वो, अपने घर उसने फोन किया तो उसके पिता ने उसे दोबारा फोन करने से मना कर दिया। अम्मी नम आँखों से बोली -कैसा समाज है हमारा? बेटी और उसके फैसलों को कभी भी सम्मान नहीं मिलता। अरे पिता और भाई हमारी रक्षा तक नहीं कर पाते,अगर निशा को प्यार से समझ कर, उसके घरवालों ने कोई रास्ता अपनाया होता तो सब कुछ ठीक नहीं हो जाता।वो घर से ना भागती ,एक 16 साल की लड़की की क्या समझ होती है ,समझदार माँ बाप होते तो निशा की जिंदगी क्यों बर्बाद होती ।एक छोटी बच्ची में इतनी समझ कहाँ होती है कि वह किसी को समझ पाए या परख पाये।

    सबने देखा और चाहा उसे अपनी जरूरतों के हिसाब से
    जिस्म बदल ले अब अपना रूह कई बार बोली
    ज़ख्म भर गये हैं तुझमें
    बेहिसाब से..

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    खोटी लड़की

    ©vandna

  • anita_sudhir 65w

    दोहागजल

    मन में कोमल भाव नहि,यही प्रेम आधार।
    व्यथित !जगत की रीति से,कैसे निम्न विचार।।

    नफरत की आँधी चली ,बढ़ा राग अरु द्वेष,
    अपराधी अब बढ़ रहे, दूषित है आचार ।

    जग में ऐसे लोग जो ,करें नारि अपमान
    व्याधि मानसिक है उन्हें ,रखते घृणित विकार ।

    निम्न कोटि की सोच से,करते वो दुष्कर्म
    लुप्त हुई संवेदना ,क्या इनका उपचार ।

    रंगहीन जीवन हुआ,लायें सुखद प्रभात,
    संस्कार की नींव हो,मिटे दिलों के रार ।

    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 65w

    आक्रोश

    कागज पर उतरता आक्रोश

    भावों की कचहरी में
    शब्दों के गवाह बना
    कलम से सिद्ध करते दोष
    और फिर हो जाते खामोश
    कागज पर उतरता आक्रोश ।

    मोमबत्तियां जल जाती हर बार
    जुलूस भी निकाल लिये जाते
    वासना से उत्पन्न
    गंदी नाली के कीड़ों में
    अब कहाँ बचा है होश
    कागज पर उतरता आक्रोश ।

    बालिका संरक्षण गृह में
    ही फल फूल रहे
    सभी तरह के धंधे
    मासूम कहाँ है सुरक्षित
    मजबूरी में करती जिस्मफरोश
    कागज पर उतरता आक्रोश ।

    प्याज निकाल रहा आँसू
    गोड़से पर चल रही बहस
    गड़े मुर्दे उखाड़ कर
    हो रही राजनीति
    बिकने के लिये तैयार बैठे
    ये सफेदपोश
    कागज पर उतरता आक्रोश ।

    सनद रहे
    हम भारत की संतान हैं
    ये जन जन का आक्रोश
    सदैव क्षणिक न रह पायेगा
    उठ खड़ा होगा
    अपने अधिकार के लिए
    करना होगा ये सब खामोश,
    व्यवस्था कब तक रहेगी बेहोश
    कागज पर उतरता आक्रोश ।
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 65w

    नवगीत विधा में लिखने का प्रथम प्रयास

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    शहर

    आधुनिक होते ये शहर..

    खेतों में मकान की फसलें
    गुम होती पगडंडियां
    विकसित होते महानगर
    खंडहर होते धरोहर
    और आधुनिक होते ये शहर..

    जीवन की आपाधापी में
    बेबस सूरतें लिये
    दौड़ते भागते लोग
    चाहे हो कोई भी प्रहर
    और आधुनिक होते ये शहर..

    बहुमंजिली इमारतों में
    अजनबी हर इंसान
    स्वार्थ पर टिके रिश्ते
    भावनायें हो रही पत्थर
    और आधुनिक होते ये शहर..

    धुआँ छोड़ते कारखाने
    वाहनों का धुआँ
    कटते जा रहे पेड़
    हवा में फैलता जहर
    और आधुनिक होते ये शहर..

    बढ़ती जा रही फूहड़ता
    आये दिन निर्भया कांड
    घटना का वीडियो बनाते लोग
    भूलते जा रहे अपने संस्कार
    और आधुनिक होते ये शहर..

    लुप्त होते गौरैया के घोंसले
    वृद्धाश्रम में बढ़ी भीड़
    पाप के भार से मैली होती नदियाँ
    टूटा समाज पर कहर
    और आधुनिक होते ये शहर..

    अब चले ऐसी लहर
    जीयें लोग नहीँ सिहर सिहर
    खिले पुष्प अब निखर निखर
    हो ये मेरे सपनों का शहर
    ऐसा आधुनिक हो मेरा शहर..
    ©anita_sudhir

  • vandna 65w

    कागज़-कलम-दवात
    और फिसलती भावनायें

    जब जब मैं तेरे आसमाँ
    का चाँद निगल लूँ
    शरद की चमकीली रात में
    शिथिल हो जाऊँ सर्द बर्फ सी
    बेसिरी फ़िज़ाओं की बरसात में
    अगली सुबह मीठा धीमा सूरज बन उगना तू
    समा लेना अपनी आगोश में मुझे तू
    और भस्म कर देना धीमें धीमें अपनी अग्नि से मुझे
    राख मेरे जिस्म की अपने जिस्म पर मलकर
    किस्सा मेरे इश्क़ का कलम से रिसने देना....
    ©vandna

  • anita_sudhir 65w

    संगीत की धुन
    कुर्सी की दौड़
    आगे निकलने की होड़
    धुन और ताल
    कभी तेज ,कभी धीरे
    अचानक बंद होता संगीत
    अफरातफरी
    कुर्सी की लपक
    खींच ली कुर्सी
    टूटे सपने !
    अब कुर्सी एक
    दावेदार तीन
    तीन टांग की कुर्सी
    साधे संतुलन !
    परिवार की कुर्सी
    सत्ता की कुर्सी
    मुफ्त का तमाशा
    मीडिया की चांदी
    काश कुर्सी संतुलित हो
    और निरीह जनता का क्या ...

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    #Hindiwriters#hind#panchdoot
    #panchdoot_social

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    कुर्सी

    अफरातफरी
    कुर्सी की लपक
    खींच ली कुर्सी
    टूटे सपने !
    अब कुर्सी एक
    दावेदार तीन
    तीन टांग की कुर्सी
    साधे संतुलन !
    परिवार की कुर्सी
    सत्ता की कुर्सी
    मुफ्त का तमाशा
    मीडिया की चांदी
    काश कुर्सी संतुलित हो
    और निरीह जनता का क्या ...
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 66w

    इश्क़

    इश्क़ की राह में बेवफा मिल गया,
    जिंदगी को नया मशविरा मिल गया ।

    छोड़ के चल दिये यों अकेले मुझे ,
    आपको साथ क्या अब नया मिल गया।

    याद फिर आपकी आज आने लगी ,
    वो अधूरा लिखा खत रखा मिल गया।

    भूल पाते नहीं आपको हम कभी ,
    वो तुम्हारा !हमें अब पता मिल गया ।

    टूटते ख्वाब की ये कहानी रही ,
    प्यार का ये मुझे क्यों सिला मिल गया ।

    रूबरू जो हुये हम खुदी से अभी,
    चाहतों का नया सिलसिला मिल गया।


    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 67w

    बाल दिवस विशेष
    इस विधा में लिखने का प्रथम प्रयास

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    भाग 1 कृपया अगला भाग भी पढ़ें

    नाटिका

    *दृश्य 1 *
    (बच्चे मोबाइल में व्यस्त है और दो-तीन लोग टहल रहे हैं )
    रमा... क्या जमाना आ गया है ,आजकल के बच्चे जब देखो तब मोबाइल में डूबे रहते हैं ,पता नहीं कैसे पेरेंट्स हैं जो बच्चों का ध्यान नहीं रखते ,और इतने कम उम्र में ही मोबाइल थमा देते हैं ।
    अब देखो पार्क में आयें है तो कुछ खेलने की बजाय
    मोबाइल लिए बैठे हैं ।
    बीना ...सच कह रही हो रमा तुम ,एक हम लोगों का समय था कितना हम लोग खेला करते थे कभी खो खो तो कभी बैडमिंटन और शारीरिक व्यायाम तो खेल खेल में ही हो जाता था। उस समय की दोस्ती भी क्या दोस्ती हुआ करती थी।
    रमा ... तुमने तो बचपन की वह मीठी बातें याद दिला दीं ,चलो दो चार गेम हो जाये ।
    वीना ... पागल हो गयी हो क्या ,इस उम्र में अब हम लोग क्या खेलेंगे ,
    बचपन ही याद करती रहोगी या घर भी चलोगी
    रमा .... अरे आओ हम भी अपना बचपन जी लेते हैं।
    वीना .. सचमुच बड़ा मजा आ गया ,वाह वाह
    अच्छा बहुत हो गया , चलो अब घर चलो
    रमा ... हर समय घर घर किये रहती हो ।
    अरे चलती हूं मुझे तो कोई चिंता नहीं है
    मेरी बेटियां पढ़ाई के लिए बहुत सिंसियर है ।
    मैं उनको बोल के आई हूँ , वो तो पढ़ाई में व्यस्त होंगी और मुन्नी को बोल कर आई हूं,वो घर के सारे काम कर रही होगी ।
    बीना ...तेरी तो मौज है ,अब मुझे ही देख !घर जाकर अभी खाना बनाना फिर बच्चों की पढ़ाई में उनके साथ बैठना ,मेरा तो सारा समय इसमें ही निकल जाता ही निकल जाता है ।
    अच्छा रमा क्या मुन्नी को भी पढाती हो तुम ....
    रमा ....मुन्नी को पढ़ा कर क्या करूंगी ,करना तो उसे यही काम है ,कौन सा कलेक्टर बनी जा रही महारानी ।और फिर घर का काम क्या मैं करूंगी?
    वीना ... अरे वो तो मैं ऐसे ही पूछ रही थी ।

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    *दृश्य दो *
    रमा का घर
    मुन्नी मुन्नी कहां मर गई तू ,देख रही है मैं बाहर से आ रही हूं तो रही हूं तो पानी तो पिला दे
    आई मेमसाब ..
    तू बच्चों के कमरे में क्या कर रही है ?जब देखो वहीं रहती है ,कुछ कामधाम नहीं होता तुझे
    वह पढ़ रहे हैं तो उन्हें पढ़ने दे उन्हें क्यों डिस्टर्ब कर रही है चल अपना काम कर ,कामचोर हो गयी है।
    रमा सोचते हुए ,मेरी बेटियां मेरा गुरूर है कितना पढ़ती है ,न मोबाइल न किसी से दोस्ती ,ये लोग बहुत नाम कमाएंगी ।
    (थोड़ी देर बाद रमा )
    बड़ा सन्नाटा लग रहा है देखूँ ये लड़कियां कर क्या रही है
    बेटियां मां के आने की आहट सुन अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो जाती हैं और मुन्नी कपड़े तह करने लग गयी।
    रमा ....कितनी अच्छी बेटियां हैं मेरी
    जब देखो तब यह पढ़ती ही रहती हैं ।
    मुन्नी तूने अभी तक कपड़े नहीं तह किये ? अभी सारा काम पड़ा है ,करती क्या रहती है तू सारा दिन अभी खाना भी बनाना है तुम्हें
    *
    ©anita_sudhir