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624 posts
  • lalitjoshi 5d

    ऐसा सौदा किया हज़ार दफा,
    अपना सब कुछ लुटा दिया हमने,
    सारे घाटों पे हक जमा अपना,
    फ़ायदा उनको दे दिया हमने ।
    इश्क उनको हुआ जो गैरों से,
    अपना दिल ही बदल लिया हमने।
    जिस गली थी कभी बसर अपनी,
    उससे रस्ता बदल लिया हमने।
    सब तो गुलशन से फूल लेके चले,
    एक जो कांटा था ले लिया हमने।
    जब न चल पाया ज़ोर औरों पर,
    क़त्ल ख़ुद ही का कर लिया हमने।

    ©lalitjoshi

  • wi1d_fl0wer 34w

    Weaving the thread of your warm memories in a blanket;
    Stealing colours from our ecstatics ; painting canvasses.
    Watering the roses with tears.
    Dining along the wind of your mist.
    Sipping tea with the honey of our dreams; holding it in a cup with the lustre of your simper.
    Cooking broth; with the garnish of your thoughts
    Listening to your lilting voice as the symphony which calms all the storms, seen and unseen .
    Writing locutions that sleep on the lap of my unsent letters to you
    Dazzling my caliginosities with your eyes that had those lights
    how else did you think , i am spending these cold winter nights.

    ©wi1d_fl0wer

  • lalitjoshi 36w

    मैंने देखा है प्रकृति को ,
    सजधज कर दरिया-दरपन में,
    या फिर किसी झील में झुककर
    खुद की ही छवि को निहारते, और फिर इतराते देखा है।

    और निर्जन पर्वत प्रदेश में,
    पल-पल में परिवर्तित होते,
    उसके मतवाले रंगों को,
    देखा है, महसूस किया है, जी भर उनके संग खेला है।

    प्रातः की निद्रा से बोझिल
    'बस पल भर' सोने को आतुर
    अलसाई ठंडी सुबहों को
    घुप्प अंधेरे कोहरे की चादर में अलसाते देखा है।

    अल्लसुबह से उठकर बैठी,
    खेती के कामों में उलझी,
    थकी हुई उन दुपहरियों को,
    अमराई की गोदी में सर रख सुस्ताते भी देखा है।

    और सुरमई उन शामों को,
    बच्चों के खेलों में थककर,
    अक्सर बेहोशी की मानिद
    रातों के शीतल आँचल में छुपकर सोते भी देखा है।

    प्रातः के चंचल सूरज को,
    नदियों, झरनों के पानी से,
    हरी दूब पर अधलेटी सी
    ओस की उन झिलमिल बूंदों से क्रीड़ाएं करते देखा है।

    पावस ऋतु में, मेघों के
    मतवाले उन छोटे बच्चों को
    दूर पहाड़ों की चोटी से,
    या फिर पेड़ों की साखों से मस्ती करते भी देखा है।
    ©lalitjoshi

  • lalitjoshi 76w

    अंधेरे - उजाले

    अज़ब सी उलझनें, बड़ा अजीब आलम है,
    बड़ी अजीब सी बेचैनियों ने घेरा है।
    जरा सा रोशनी उधार दे दो मुझे,
    हर तरफ ही घना अंधेरा है।
    वो जो सूरज था रौशनी की वजह,
    छुप गया रूह तलक झुलसाकर,
    वो चाँद जो सुकून देता था,
    न जाने कैसे बादलों में छुप गया जाकर,
    बड़ी ही दर्दनाक है ये जलन,
    बड़ी अजीब सी तड़प ने घेरा है
    जरा सा रोशनी उधार दे दो मुझे,
    हर तरफ ही घना अंधेरा है।

    ©lalitjoshi

  • lalitjoshi 86w

    जिंदा रहने की ज़रूरत कुछ अलग है,
    और मुहब्बत की जरूरत कुछ अलग है।
    कैसे कर लूं साथ दोनों की तमन्ना,
    दोनों की अपनी ज़रूरत कुछ अलग है।
    ©lalitjoshi

  • wi1d_fl0wer 93w

    The Princess of The Kingdom

    There was a girl of ten,
    She had gowns ,and a rack full of crowns.
    A lavish room painted all pink and red,
    centered with a special crafted golden bed .
    She had all a girl could demand, and hundreds of maids at her commamd but all she required was a little freedom but she can't afterall she was the princess of the kingdom

    Time passed by and she came of age ,
    and today was her wedding day.

    "i want you in time all dressed and prepaired no matter if I am late from the battle field but you'll stay, your arriving time is correct nine and promise me that you'll not dissappoint ." said the chauvinistic king to her daughter whose feelings he never gave time to bother.

    Wedding gown she held in her hand with fear
    mercilessly, she rubbed her eyes filled with tears.
    By and by the wedding time was near .
    Beautiful princess in a lovely white gown,
    curly hair studded with a shimmering crown.
    Before leaving she prayed for the battle where her father stayed.

    her father cheated the king of wieselton and took the kingdom away..
    epitome of bravery ,loyality and kindness, the son of the crown, Prince Victor was out on revenge and his kingdom to avenge.

    Today the fate was to be decided for the girl to be happy or to mourn,
    for the girl who was already torn

    She walked admist of crowd stood there in bedlam as she saw her father coming all jubilant and with mirth in his eyes
    elated he was as he addressed the crowd "As the happiness today was going to be twice .
    Ladies and gentlemen their are two reasons to celebrate
    one my daughters wedding and the second the bloody victor's death "

    the prince was her love ,true and brave
    with whom she planned to escape
    from the world of agony ,hatered and bluff
    To the land of selfless love
    Those lovely moments spent with him she rewind with all those promises in her mind .

    Like a statue she stood
    still,
    deep inside she felt empty ,nothing could fill,
    though still burdened with responsibility she could feel pain down her spine.
    On her side stood her father who was celebrating it with a spanish red wine

    Her heart suffered a gaping wound with all it's sore edges around
    somebody took her happiness as a whole ,
    And the body was left without the soul.
    All she wanted was a little freedom ,
    but she could not as she was daughter of the crown and princess of the kingdom.


    ©wi1d_fl0wer

  • priubansal 109w

    Lesson to myself !

    We pray many times to God that plz drawn all my mistakes,,,
    Forget all wrong words that I said..
    Forget all my works that I did wrong....
    ....
    What a expectation.Then I asked to myself ,
    ...
    CAN I DO THE SAME ??
    Frankly say,m speechless.. bcoz it's very tough to forget other mistakes...
    But ,If we try ,we can do that very easily...
    ....
    What a lesson I have taken....
    ©priubansal

  • lalitjoshi 127w

    ख़्वाब

    चलो न, एक बार फिर चले चलते हैं,
    वक्त के उस मोड़ पर,
    तुम पतली घुमावदार गली के उसी मुहाने से, उसी अंदाज में, ढलान से उतरती हुई नमूदार होना ,
    मैं भी गली के सामने, दाँयी तरफ की उसी पुलिया से गुजरूँगा, बाज़ार की तरफ।
    क्या पता, एक बार फिर, उस मुस्कान की चकाचौंध मेरी ज़िन्दगी के अंधेरे रास्ते कुछ देर के लिए रौशन कर दे !
    क्या पता उस शाम की तरह में मैं फिर से ख़रीद पाऊँ अनगिनत सपनों का एक पूरा बाजार !
    चलोगी?
    फ़ुरसत है तुम्हें ?

    ©lalitjoshi

  • lalitjoshi 131w

    दीवानगी

    कि रह-रहकर मचलती हैं किसी को ढूँढती नज़रें,
    कोई हो सामने, तो भी उसे देखा नहीं जाता।
    अजब हैं रंग उल्फत के, चटक हैं, इतने गहरे हैं,
    कि अपने लगते बेगाने, पराया अपना बन जाता।

    ©lalitjoshi

  • lalitjoshi 131w

    शुकराना

    तुझसे नजदीकियों की हसरत में,
    मैं ख़ुद से दूर हो गया था बहुत,
    तेरी जफ़ा ने ख़ुद से फिर मिला दिया मुझको,
    गए ज़माने से ख़ुद से नहीं मिला था मैं।

  • lalitjoshi 131w

    मेरे वज़ूद के टुकड़े करके,वो पूछते हैं, कोई ग़म तो नहीं !
    हम तो मुतमईन हैं इतने से ही, चलो, वो हमसे बात करते हैं ।

    ©lalitjoshi

  • lalitjoshi 131w

    सन्नाटा

    अब बाकी कोई चाह नहीं, मुझको कोई परवाह नहीं,
    जिस पर चलकर कुछ पा जाऊं, अब ऐसी कोई राह नहीं,
    जो साथ चला था, साथ उसी का छूट गया,
    जो सबसे ज्यादा अपना था, वो रूठ गया।
    अब बचा नहीं कोई सपना जिसको कह पाऊं मैं अपना,
    जीवन के इस सूनेपन में, जीने भर को बस है खपना,
    जो सबसे प्यारा सपना था, वो टूट गया।
    जो सबसे ज्यादा अपना था, वो रूठ गया।
    रिश्तों पर अब विश्वास नहीं, अपनों से कोई आस नहीं,
    इतना जल चुका कि अब मुझमें, किंचित भी कोई प्यास नहीं,
    जो तन-मन को शीतल करता, वो छूट गया।
    जो सबसे ज्यादा अपना था, वो रूठ गया।
    वेदना भरा यह अंधकार, जिसकी सीमा का नहीं पार,
    जीवन का यह भी एक रंग, वीभत्स और कुत्सित अपार,
    जो रंग भरता जीवन में, वो ही लूट गया।
    जो सबसे ज्यादा अपना था, वो रूठ गया।
    सन्नाटा चारों ओर बड़ा, अंतर में कोलाहल उमड़ा,
    जो भर देता संगीत नया, वह तार मधुर था उलझ पड़ा,
    सुलझाने की कोशिश में वह बस टूट गया,
    जो सबसे ज्यादा अपना था, वो रूठ गया।

    ©lalitjoshi

  • lalitjoshi 132w

    क़ैदी

    सब कहते हैं कि आज़ाद हूँ मैं,
    क्या ये सच है?
    तो फिर ऐसा क्यों है कि मेरे अंदर के कई अहसास
    बेसाख़्ता मचलते हैं बाहर आने को,
    और न जाने क्या सोचकर ,मन मसोस कर
    इस अनदेखे क़ैदख़ाने को ही अपना घर मान लेते हैं,
    और खो जाते हैं, इन अंधेरों में , जैसे वो थे ही नहीं?
    और क्यों ताउम्र आज़ाद होने की कमज़ोर हसरतें
    अपने आपसे लड़ते-लड़ते दम तोड़ देती हैं?
    और फ़िर कुछ दिनों बाद सड़ांध मारती उनकी लाशों को मैं चुपचाप दफ़न कर देता हूँ, सर झुकाकर।
    मैं हँसना चाहता हूँ, तुम सबकी तरह,
    पर क्यों कोई मेरे होठों पर कुछ आहें चस्पा कर जाता है?
    मैं जीना चाहता हूँ, एक हंसती-खेलती
    बेपरवाह सी, खूबसूरत ज़िन्दगी,
    पर क्यों कोई मेरे अंदर से
    थोड़ी सी ज़िंदगी हररोज़ निकाल ले जाता है,
    और मैं चुपचाप देखता रहता हूँ।
    क्या सचमुच मैं भी आज़ाद हूँ ?

    ©lalitjoshi

  • lalitjoshi 132w

    Happy Independence Day

    तुम तो आज़ाद हो, जो चाहो वो कर सकते हो,
    हम तो लिपटे पड़े हैं वादों की जंज़ीरों से,
    कर लो जो चाहो, जब भी चाहो, मुनासिब वो सितम,
    हम तो मजबूर हैं , हमने तो मुहब्बत की है।

    ©lalitjoshi

  • lalitjoshi 132w

    मुझसे रही होगी कोई रंजिश ख़ुदा की भी,
    बर्बाद करना था मुझे, तुझको बना दिया।

    ©lalitjoshi

  • lalitjoshi 132w

    बेगानेपन के साये में हम जीते किस तरह,
    अच्छा किया कि हमने कुछ यादें सहेज ली।

    ©lalitjoshi

  • lalitjoshi 132w

    अंधों का शहर

    किसी खूबसूरत आईने की बात उसको बताइये,
    आंखें हों जिसके पास बस शीशा, उसी को दिखाइए।
    इस आईने की दाद कोई भी नहीं देगा यहाँ,
    ये है शहर अंधों का यहाँ, शीशा किसे दिखलाइये !
    ©lalitjoshi

  • lalitjoshi 133w

    इकतरफा मुहब्बत

    तमाम उम्र तेरा इंतज़ार हमने किया,
    हरेक लम्हा तुझी पे निसार हमने किया,
    मगर वो फासले जो दरमियां थे बढ़ते गए,
    ग़लत किया, कि तुझे ऐसे प्यार हमने किया ।

  • lalitjoshi 133w

    सबसे बड़ा डर

    तुम्हें भुला तो दूँ नहीं कोई मुश्किल इसमें,
    डर है बस इतना , ख़ुद को याद कैसे रखूंगा।
    ©lalitjoshi

  • lalitjoshi 133w

    नज़र- कल और आज

    वही नज़र जो नहीं हटती थी नज़रों से मेरी,
    क्या हुआ आज ये किस बात पे झुक जाती है ?
    ये किस गुनाह का अहसास उसे होता है,
    क्यों अब मेरी नज़र से मिलने से कतराती है?