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एक अदना सी शायरा ����

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Reposts
  • hima_writes 57w

    आप सभी का बेहद शुक्रिया.. यूँ ही साथ निभाते रहिए

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    .

  • hima_writes 81w

    और फिर कितने अरमान के साथ विदा किया सबने उस भाई को, जो देश के नाम शहीद हो कर तोहफ़े में बहन के नाम ' शहीद की बहन ' का दर्जा रक्षाबंधन पर लाया था...

    सच्चा प्यार किसी का मोहताज़ नहीं होता..
    ना उम्र देखता है, ना जाति और ना ही मज़हब..
    देश के प्रति मर मिटने की भावना ऐसे प्यार को दर्शाती है |

    ©हिमा
    #हिमाद्री वर्मा

  • hima_writes 83w

    नज़्म

    फ़िक्र करती हूँ रात में, ज़ब अकेली हो जाती हूँ,
    इंतज़ार रहता है खुद का, खुद ही घर देर से जाती हूँ,

    तन्हाई का आलम ये कि रूठता कोई ना है मुझसे,
    तो कभी कभी खुद ही रूठ कर, खुद को मनाती हूँ,

    तरस जाती हूँ खाने पर, किसी के साथ का अक्सर,
    और हँसकर, उल्टे हाथ से खुद को खाना खिलाती हूँ,

    यादों के गलियारों में घूमती हूँ, संग तेरे हर दफ़ा,
    फिर पाकर खुद को अकेला, कहीं खो सी जाती हूँ,

    कोई थामता नहीं है हाथ, सड़क पार करने पर मेरे,
    मैं समझ नहीं पाती, कि कहाँ आती और कहाँ जाती हूँ,

    हिज्र के बुरे ख़्वाबों से डर मुझे भी लगता होगा,
    पर करवट लेकर मैं, तेरे तकिये संग लिपट जाती हूँ |

    ©हिमा

  • hima_writes 84w

    मैं हूँ तिरे कोई अधूरे वादे सी,
    मुकम्मल कभी हो जाऊँ तो क्या बात हो

    ©हिमा

  • hima_writes 84w

    एक ग़ज़ल पेश ए खिदमत है.. उम्मीद है पसंद आएगी ��

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    पीता हूँ !

    बरबाद करके खुद को, इस ज़माने में पीता हूँ,
    मेरे साकी, सिर्फ तेरे मयख़ाने में पीता हूँ,

    ताआजुब, दिखता है हर जाम में चेहरा उसका ही,
    रुख़सार, नज़र, लब लिए पैमाने में पीता हूँ,

    मुझे इस कदर किया है बेपरदा हर पन्ने पर,
    उसके लिखे हुए, हर अफ़साने में पीता हूँ,

    कहती थी वो, लगा दूंगी आग मैखाने में,
    इसी डर से मैं, अपने ग़रीबख़ाने में पीता हूँ,

    उसने मुझे छोड़ दिया, के कितना पीता हूँ मैं,
    अब उसके ग़म ए हिज्र वाले बहाने में पीता हूँ

    ©हिमा

  • hima_writes 85w

    जब छलके अश्क़ आँखों से, तो लगा, सपने बह गए सारे...
    ©हिमा

  • hima_writes 85w

    मेरी मोहब्बत की गहराई नापनी है???
    मेरी रूह से कभी गुज़र कर तो देख !!
    ©hima_writes

  • hima_writes 85w

    महफ़िल में ठहरकर भी हम उसमें शामिल ना हुए,
    लगकर गले भी उसके, देख उसे हासिल ना हुए,
    बरबाद किया मेरे यार ने मुझे ऐसे,
    होकर मुकम्मल भी हम, इश्क़ में कामिल ना हुए !
    ©हिमा

  • hima_writes 85w

    यूँ तो मैं माँ हूँ तुम्हारी पर फर्ज़ मैंने पिता का भी निभाया है हमेशा | इसलिए नहीं की हम अकेले थे, वो इसलिए की ये फैसला मेरा था, तुम्हारे खातिर |वजह ये कि रिश्तों में इज़्ज़त की भी जरूरत होती है| इससे भी बड़ी वजह थी कि तुम्हारे मन में पुरूषों के लिए नफरत ना आ जाये | ⁣

    एक माँ अपने बच्चे के लिए सब से लड़ जाती है, उसके पिता से भी | ऐसा नहीं कि वो इंसान बुरे थे बस वो अच्छे नहीं थे, और पिता के जैसे नहीं थे | तुम बहुत छोटी हो इन बातों के लिए, पर ना समझ नहीं हो | हम अकेले नहीं हैं बेटा, मैं साथ हूँ तुम्हारे, हाथ थामे| हमें खुद को इतना मज़बूत बनाना है कि ये आँधियाँ डरा नहीं पाए हमें | ⁣

    तुम्हें तुम्हारे फैसले लेने के सारे हक़ दूंगी मैं, जीवनसाथी चुनने के भी | बस एक बात याद रखना, आत्मसम्मान से नीचे मत गिरना, रिश्तों को संभालते हुए | चाहे वो रिश्ते कुछ भी हो | ये बातें सिर्फ इसलिए है कि तुम्हारी कहानी मेरी कहानी सी ना हो | सुनो, मैं साथ रहूंगी हर पल, खुद को अकेला महसूस मत करना कभी |
    I love you Beta ❤️⁣

    तुम्हारी माँ

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    A letter for a daughter from a single mother
    ©hima_writes

  • hima_writes 86w

    ग़ज़ल

    हुए मज़बूर तो बग़ावत लगी जिंदगी,
    तिरे दहलीज़ पर इबादत लगी जिंदगी,

    दरीचे से दिखी थी महफ़िलें सारी,
    मिरी बिन चाँद के सज़ावट लगी जिंदगी,

    फ़क़त इतना सा राब्ता है तिरे नाम से,
    कि तुम्हें लिखने पर इबारत लगी जिंदगी,

    उलझना था तिरे अशआर में ऐसे,
    सुलझने ख़ातिर ही वक़ालत लगी जिंदगी,

    लगी तोहमतें ज़माने की हिमा तुझ पर,
    मिली तारीखें और अदालत लगी जिंदगी

    ©हिमा