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शिव कुछ अनकही बातें l

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  • hindipoetry 5h

    दुनिया में हर स्त्री का जीवन एक बेहतरीन किताब की तरह होता है लेकिन हर बेहतरीन किताब..खुली किताब नहीं होती। हालाँकि यहाँ हर किताब को पढ़ने का प्रयास किया जाता है लेकिन कुछ किताबें ऐसी भी अस्तित्व में हैं,जिन्हें अधिकतर लोग खोल ही नहीं पाये हैं और जिन्होंने खोल लिया है वो प्रारम्भ केे एक या दो पृष्ठ से अधिक नहीं पढ़ पाये हैं। उन स्त्रियों के जीवन को पढ़ने वाले इच्छुक मर्दों को ये समझना होगा कि जो किताबें बंद हैं वो किसी के चाहने मात्र से नहीं खुलेंगी और अगर अपने भरसक प्रयासों से तुम उन्हें जबरन खोलना चाहोगे तब वो शायद अपने ऊपर इतना भार धर लेंगी जिससे तुम्हारे लिए उन्हें खोलना सदा के लिए असंभव हो जायेगा। सभी बंद किताबें अक्सर इच्छुक पाठक के मन को टटोलती हैं। लंबे समय तक उसके भीतर ही भ्रमण करती रहती हैं और जब अपने आप को पूरी तरह आश्वस्त कर लेती हैं कि उसे पढ़ने की इच्छा ज़ाहिर करने वाला मर्द 'पाठक' बनने योग्य है,तब वो स्वतः ही खुल पड़ती हैं।

    स्वेच्छा से बंद हुईं 'स्त्रियां' सदैव स्वेच्छा से ही खुलती हैं और जब खुलती हैं तो इतनी सरलता से खुलती हैं कि एक 'मर्द' को उनके पृष्ठ तक उलटने की आवश्यकता नहीं होती। वो स्वयं ही अपने हर पृष्ठ की लिखावट को उन्हें पढ़ाती हुई आगे बढ़ती हैं। मैं यही आशा करता हूँ कि तुम्हें फिर एक बार अपनी स्वेच्छा से खुलने का मौका मिले...तुम्हारा पाठक बहुत ही इत्मीनान और सुकून से तुम्हारे हर पन्ने पर उकेरे गए शब्दों को स्पर्श करता हुआ पढ़े...लेकिन सोचता हूँ कि उलटते उन पन्नों में तुम अपने उन रिक्त पन्नों को उस हम-नफ़स से कैसे छिपा पाओगी? जिन पन्नों की लिखावट तब तक धुंधली पड़ चुकी होगी,इतनी धुंधली की ना वो उसे पढ़ सकेगा और ना स्पर्श कर महसूस कर पायेगा...जिन पन्नों के बीच में दबी होंगी गुलाब की सूख चुकी पंखुड़ियां...जिनकी महक उन पन्नों पर लिखा हर शब्द सोख चुका होगा और इत्र बनकर उसकी साँसों में बह रही होगी...हमारे इश्क़ की स्याही।

    ©भावेश

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  • hindipoetry 2w

    महसूस होता है जैसे बीतते हर पल के साथ सब कुछ धुंधला पड़ने लगा है। मेरे सुख की स्मृतियाँ,हास्य के क्षण,प्रेम और स्नेह के तारों से बुने गए मेरे रिश्ते....सब कुछ...मेरे चारों ओर जो कुछ है वो सब कितना 'अस्थायी' है। काफ़ी समय से मुस्कुराने के प्रयास में हूँ लेकिन मुस्कुरा नहीं पाता हूँ। खुशियों को टटोलना चाहा लेकिन जीवन में बची-कुची खुशियाँ भी चेहरे पर हँसी ला पाने में नाकाम है और जो कभी फूट पड़ती है तो अपने स्वभाव के कारण धीरे-धीरे अदृश्य होने लगती है। जीवन की चौखट से सब मुझसे विदा ले चुके हैं लेकिन कौन है जो अभी भी वहाँ बैठा है? शायद दुःख...।

    व्यक्ति सब कुछ भुला सकता है लेकिन उसे अपने दुःख हमेशा कंठस्थ रहते हैं। हम यही चाहते हैं कि कोई हमसे उनके बारे में पूछे और जैसे ही कोई पूछता है हम तपाक से ज़ुबान पर रटे हुए अपने दुःखों से उसे वाक़िफ़ करा देते हैं। क्षणिक चीज़ों से,रिश्तों से,जज़्बातों से घिरे व्यक्ति के जीवन में अगर कुछ स्थायी है तो वो हैं उसकी 'पीड़ाएं'। जो हर व्यक्ति के भीतर अपने पाँव जमा कर बैठी हैं। इसलिए अब मैं अपने दुःखों पर ही मुस्कुराने लगा हूँ...क्योंकि जो भी व्यक्ति अपने जीवन से मुस्कुराते हुए विदा लेना चाहता है उसे अपनी पीड़ाओं पर,परेशानियों पर...अपने दुःखों पर मुस्कुराना सीखना होगा..क्योंकि यही होंगे जो सबसे साथ अंत तक साथ जायेंगे। सुनो! तुम्हें याद है ना? तुम मुस्कुराती हुई मुझे और भी खूबसूरत लगती हो...इसलिए हो सके तो तुम भी अब अपने दुःखों पर हँसना सीख लो...जैसे मैंने सीख लिया है..मैं अक्सर मुस्कुराता हूँ हमारी उस मुस्कुराती तस्वीर को देखकर...जिसमें तुम तो हो लेकिन मेरा सिर्फ़ सीधा हाथ दिखाई दे रहा है...तुम्हारे कंधे पर...जिस तस्वीर का एक टुकड़ा फाड़कर तुमने भी अपने पास रखा था..जिस टुकड़े में क़ैद थी...मेरी असल हँसी।

    ©भावेश

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  • hindipoetry 3w

    कभी-कभी जीवन बहुत ही उबाऊ लगने लगता है। जीवन में बहती इस नीरसता का परिणाम ये निकलता है कि मुझे मृत्यु आकर्षित करने लगती है,लेकिन मृत्यु के प्रति मेरा ये आकर्षण बहुत ही अल्पकाल के लिए होता है। जितना समय मुझे मृत्यु अपनी ओर आकर्षित करती है,मैं उतना समय अपने लेखन को देता हूँ। फिर किसी कोरे कागज़ पर मेरी बेरंग ज़िन्दगी जगह पाती है। स्याही से कई-कई बार उसे कोसा जाता है। मृत्यु की सराहना की जाती है और जब पूरा पन्ना जीवन पर मेरे कटाक्ष और मृत्यु की चकाचौंध से भरने वाला होता है और मृत्यु को मैं उसके बेहद क़रीब महसूस होने लगता हूँ तब उस पन्ने की आख़िरी पंक्ति के आख़िरी शब्द में मैं मृत्यु को दुत्कार देता हूँ। मेरे द्वारा उसकी की गई प्रशंसा से फूली हुई छाती लिए 'मृत्यु' मेरा मुँह ताकती रह जाती है। उसके चेहरे पर एक प्रश्न चिन्ह होता है और उस प्रश्न चिन्ह का उत्तर पन्ने के उस आख़िरी शब्द में...'आकर्षण'।

    आकर्षण क्षणभंगुर होता है और मैं लौट पड़ता हूँ फिर से अपने उस जीवन में जिससे में कई बार उकता चुका हूँ..लेकिन प्रेम करता हूँ...और प्रेम क्षणभंगुर नहीं होता। कुछ लोग निरंतर 'जीवन' इसलिये लिखते हैं क्योंकि वो अपने भीतर के लेखक को मरता देखना नहीं चाहते और मैं हमेशा मृत्यु इसलिए लिखता हूँ क्योंकि प्रेम के हर पन्ने की आख़िरी पंक्ति के आख़िरी शब्द में मैं खुद को देखना चाहता हूँ....'ज़िन्दा'।

    ©भावेश

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  • hindipoetry 3w

    मैं एक आस्तिक व्यक्ति हूँ। तीर्थों,शिवालयों और लिंग पूजा में श्रद्धा रखता हूँ लेकिन ईश्वर से प्रेम करने के ही साथ-साथ ये भी चाहता हूँ कि इस दुनिया में एक रोज़ ऐसा भी आये कि सभी ऊँचे-ऊँचे विशाल और भव्य मंदिरों को ढहा दिया जाए,सम्पूर्ण जगत में कोई भी मस्जिद,गिरजाघर,गुरुद्वारा या किसी भी संप्रदाय से सम्बन्ध रखने वाला किसी भी तरह का कोई स्तूप या मठ शेष ना रहे। दुनिया में कोई भी तत्व ऐसा ना बचे जो व्यक्ति को व्यक्ति से अलग बनाता हो। और इसके बाद जब भी कोई माँ अपने शिशु को जन्म दे तो अपनी संतान को कभी भी उसके संप्रदाय,उसकी जाति की शिक्षा ना दे। मैं चाहता हूँ कई-कई करोड़ों ऐसे मनुष्य अस्तित्व में आएं जिन्हें उनके धर्म,संप्रदाय,जाति,कुल के बारे में कोई ज्ञान ना हो और कितना सुखद भी हो ये देखना जब किसी बाहरी व्यक्ति के द्वारा उनसे इन सभी के बारे में प्रश्न पूछने पर वो सभी अपनी बगलें झाँकने लगें और निरुत्तर हो जाएँ। कितना सुखद हो चारों ओर नज़रें घुमाकर देखने पर सिर्फ़ इंसानों का दिखाई देना बजाय किसी सम्प्रदाय के नाम पर नाचती कठपुतलियों के।

    क्योंकि इन्हीं मंदिरों,शिवालयों और अनेक तरह के मठों में विचर-विचरकर जाना है कि ईश्वर का सर्वाधिक प्रिय निवास स्थान है 'किसी भी मनुष्य का हृदय'। बड़े-बड़े संप्रदायों से बड़ा कुछ है तो व्यक्ति के मन में छोटी सी 'मानवता' की भावना। चारों ओर फैल चुके धर्म और जाति के भेदभाव और नफ़रत से बड़ा कुछ है तो मनुष्य का आत्मीय 'प्रेम'। क्योंकि आने वाले समय में शायद हमें अपनी-अपनी विभिन्नताओं पर गर्व ना होगा और ना ही उनकी उतनी आवश्यकता पड़ेगी जितनी की आपसी 'एकता' और 'भाईचारे' की।

    ©भावेश

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  • hindipoetry 5w

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  • hindipoetry 11w

    कभी-कभी उसका कुछ कहा मुझे रास नहीं आता। कभी उसकी कोई बात दिल को चुभ सी जाती है लेकिन मैं उससे ज़्यादा वक़्त तक नाराज़ भी नहीं रह पाता...और ये हम दोनों के भीतर की ही एक खूबी है,जिससे हम दोनों वाक़िफ़ हैं। उसे ये समझाने के लिए कि मैं उससे नाराज़ हूँ,मैं बहुत ही आम तरीक़ा आज़माता हूँ। मैं उसकी कही किसी भी बात का जवाब नहीं देता...मौन धारण कर लेता हूँ...गहरा मौन। कुछ देर बाद जब उसे ये सन्नाटा अख़रता है,तब वो पहले से ही समझ चुके मेरे मौन पर फिर से ध्यान देने का अभिनय करती है...और जैसे ही उसकी आँखें मेरी ओर होती हैं,मैं उनमें देखता हुआ तपाक से इन शब्दों के साथ अपने मौन पर पूर्ण विराम लगा देता हूँ...'आई लव यू'। उसका भावहीन चेहरा ये सुनकर मुस्कुराने लगता है। लेकिन उसके चेहरे की ये मुस्कुराहट मुझे कुछ देर ही अच्छी लगती है। कुछ ही देर इसलिए क्योंकि उसके बाद जो मुझे अच्छा नहीं लगता वो है उसका...'मौन'।

    फिर ज़ेहन में एक साथ कई विचार दौड़ने लगते हैं...उसने मेरे कहे उन तीन शब्दों का जवाब नहीं दिया। उसने ये नहीं कहा कि वो भी मुझसे प्रेम करती है। वो मेरे प्रेम का इज़हार सुनकर हमेशा ही सिर्फ़ मुस्कुरा देती है। वो हमेशा ही जवाब नहीं देती। हमेशा ही मौन रहती है। वो ऐसा क्यों करती है? क्या उसकी मुस्कुराहट का कोई अर्थ है? या फिर उसके मौन का?...सन्नाटा फिर अख़रने लगता है...लेकिन इस दफ़ा मुझे...और मैं झल्ला पड़ता हूँ। जानता हूँ ये एक बेवकूफ़ी है लेकिन मुझे उसका हर मौन सहन है,सिवाय मेरे 'आई लव यू' कह देने के बाद वाले मौन के। मैं फिर कह पड़ता हूँ...'तुम क्या प्रेम नहीं करती मुझसे? तुम्हारे मन में जो कुछ है कहती क्यों नहीं? हर बार मेरे इज़हार के बदले में मुस्कुराती मूरत बन बैठती हो। प्रेम करती हो तो कह दो और नहीं करती तो भी कह दो'।

    और ये कहकर मैं भी मौन हो जाता हूँ...ये मौन उसे ये समझाने वाला वही मौन है कि मैं उससे रूठ चुका हूँ। मेरी नाराज़गी पहले से ज़्यादा है इसलिए गहरे मौन के साथ-साथ मैं अपना चेहरा भी उसकी ओर से दूसरी ओर घुमा चूका हूँ। लेकिन ये जानता हूँ कि वो मुझे एकटक निगाह से घूरे जा रही है,बिना पलकें झपकाये...वही भावहीन चेहरा लिए। कुछ देर बाद वो अपना बायां हाथ मेरी ओर बढ़ाती है और मेरे सीधे हाथ की हथेली पर अपनी हथेली रख देती है। धीरे-धीरे फिर अपनी पकड़ मज़बूत करती जाती है और जकड़न की एक सीमा पर आकर मैं मुस्कुरा पड़ता हूँ लेकिन उसकी ओर देखता नहीं हूँ। कुछ पल बाद जब देखता हूँ तो वो भी मेरी आँखों में देखकर इस शब्द के साथ अपना मौन तोड़ देती है...'बेवकूफ़'..और ये कहकर हँस पड़ती है।

    प्रेम में कुछ बेवकूफ़ियाँ व्यक्ति से स्वतः ही हो जाती हैं...कुछ वो जानबूझकर करता है और कुछ बेवकूफ़ियाँ ऐसी होती हैं जो उससे होती तो स्वतः ही हैं लेकिन बाद में वो उन्हें अपनी आत्मग्लानि की हँसी के आवरण से ढांपने लगता है। ये मेरे द्वारा की गयी ऐसी ही कोई बेवकूफ़ी थी। प्रेम में 'बेवकूफ़' हो जाना जीवन की सबसे भयंकर दुर्घटना है...लेकिन बेवकूफ़ी में की गयी बेवकूफ़ियों को सुधारकर असल प्रेम समझाने वाले शख़्स का मिलना...जीवन में मिले ईश्वर के किसी बहुमूल्य वरदान के समान है। मैं उसके प्रेम में डूबने का प्रयास कर रहा एक 'बेवकूफ़ प्रेमी' हूँ और वो शायद मेरे प्रेम में पूरी तरह डूब चुकी एक 'समझदार प्रेमिका' है। इसलिए क्योंकि वो शायद जानती है कि प्रेम का इज़हार करने के अलग-अलग तरह के सैकड़ों तरीक़ों में सबसे सुन्दर वो तरीक़ा है जो इंसान की ज़ुबान पर आश्रित नहीं है...सबसे खूबसूरत प्रेम का वो इज़हार है जो बिना कुछ कहे ही सिर्फ़ महसूस करा दिया जाता है...जैसे मौन रहकर उसने मुझे महसूस कराया था...अपनी हथेली की छुअन से...जैसे मेरी सीधी हथेली ने महसूस किये थे...उसकी बायीं हथेली पर गुदे हुए वो शब्द...'आई लव यू टू'।

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  • hindipoetry 12w

    मैंने कई-कई बार अपने भीतर के उस व्यक्ति को हताश होते देखा है,जो लेखन से जुड़ाव रखता है। पाठकों की प्रशंसा ना मिलने पर कई बार वो बुरी तरह से निराश हो जाता है। लेखन के प्रति उसके भीतर की चाह जब कभी-कभी अपने न्यूनतम स्तर पर पहुँच जाती है तब उसके भीतर ऐसे विचार भी उठने लगते हैं की वो अब कभी क़लम नहीं उठायेगा,कभी कुछ नहीं लिखेगा। लेकिन इसके विपरीत मैंने कभी-कभी उसे अपने आप को ही धिक्कारते भी सुना है,स्वयं को ही लताड़ते हुए। और ऐसा अक्सर वो तब करता है जब उसकी किसी रचना की पाठकों के द्वारा भरसक और बढ़ चढ़कर प्रशंसा की जाती है,उसकी तारीफ़ों के पुल बांध दिए जाते हैं। भावनाओं के बहते प्रवाह में प्रशंसा रूपी ऐसे शब्दों का प्रयोग कर दिया जाता है जिन शब्दों के क़ाबिल वो अपनी उस रचना को गढ़ने में लगे अपने परिश्रम को आँकता ही नहीं है।

    दुनिया में मौजूद अलग-अलग क्षेत्रों में व्यक्ति के द्वारा किये जाने वाले तरह-तरह के सभी 'परिश्रमों' में एक 'समानता' अवश्य है। सभी के भीतर एक ही प्रकार की क्षुधा है,वो क्षुधा जो परिश्रमी व्यक्ति की 'प्रशंसा' सुनकर शांत होती है। एक समझदार व्यक्ति के किये गये परिश्रम में 'प्रशंसा' की भूख अवश्य है लेकिन उस व्यक्ति के लिए स्वयं की उतनी ही प्रशंसा स्वीकारने योग्य भी है,जितना सफल होने के लिए उस व्यक्ति के द्वारा किया गया उसका परिश्रम है। परिश्रम से कम की गयी व्यक्ति की सराहना व्यक्ति के लिए कहीं ना कहीं कष्टकारी है और परिश्रम से अधिक प्रशंसा में कहे गये क़सीदे व्यक्ति के लिए स्वयं को धिक्कारने और अस्वीकारने योग्य हैं,और शायद 'पाठक' के पाठक होने की क़ाबिलियत पर संदेह करने योग्य भी।

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  • hindipoetry 13w

    दुनिया में कुछ मौतें बहुत सरल हैं,कुछ बहुत कठिन और कुछ बहुत ही भयावह। लेकिन दुनिया की इन ढेर सारी मौतों में सबसे दर्दनाक मौत वो है जो एक लेखक को उस वक़्त महसूस होती है,जब उसके भीतर उसकी असीम कला शेष रहती है लेकिन उसकी उस कला को समझने वाला उसके इर्द-गिर्द कोई शेष नहीं बचता। इसके चलते व्यक्ति के भीतर बैठा लेखक ख़ुदकुशी करने का प्रयास करता है लेकिन सफल नहीं होता और हर बार अधमरा होकर रह जाता है। उसका ये प्रयास ठीक उस बिंदु से पहले असफल होता है जिस बिंदु पर मौत अपना एकल साम्राज्य स्थापित कर बैठी रहती है,उस बिंदु पर जीवन के लिए दूर-दूर तक कोई सम्भावना नहीं होती। ये लेखक के लिए उसकी मौत को बेहद क़रीब से महसूस कर जीवित लौट आने का अनुभव है।

    लेकिन फिर जब कभी भी लेखक के ज़ेहन में उसकी कला जगह पाती है तो वो फिर पुनः दूसरों के लिए कुछ लिखने,सुनाने का प्रयास करता है। कभी-कभी उसका प्रयास सफल रहता है,तो कभी उसका लिखा बिना पढ़े और सुने ही छोड़ दिया जाता है। लेखक के ख़ुदकुशी के प्रयास इसलिए जीवन भर चलते रहते हैं। लेखक अपने जीवन में कई बार मौत को स्पर्श करता है और हर बार अधमरा होकर कुछ समय बाद पुनः लिखने का प्रयास करता है। बार-बार दोहराती इस पूरी प्रक्रिया में व्यक्ति को जो कुछ हासिल होता है,तो वो सिर्फ़ इतना है की उसे अब एक आम व्यक्ति के तौर पर मौत से डर नहीं लगता है। वो बड़ी से बड़ी पीड़ा उठाने में घबराता नहीं है। क्योंकि पूरी तरह से होशोहवास में रहकर मौत को अपने भीतर महसूस करना इंसान के लिए हर पीड़ा से अधिक पीड़ादायी है,सबसे दर्दनाक मौत है उस इंसान की जो किसी इंसान के भीतर रहकर दम तोड़ देता है।

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  • hindipoetry 14w

    हम अंतर्मुखी लोगों को सर्वाधिक प्रिय होता है हमारा 'एकांत'। हमारे चारों ओर हमारे ही द्वारा खींची गयीं वो सीमायें और उकेरा गया वो दायरा जिसमें हम किसी भी व्यक्ति को प्रवेश की आजीवन अनुमति नहीं दे पाते। सम्पूर्ण जीवनकाल में हमें उस सीमा रेखा के उस ओर कई अलग-अलग तरह के चेहरे खड़े दिखाई देते हैं। कभी कुछ नये चेहरे जिन्हें पहले कभी वहाँ देखा नहीं गया है। कभी कुछ पुराने जो लंबे समय से वहाँ हैं। सीमाओं पर चक्कर लगाती नज़रें कभी-कभी उन चेहरों को भी ढूंढती है जो चेहरे हमारे ज़ेहन में कहीं हैं,लेकिन दायरे के उस पार लापता हैं। शायद वह वो लोग हैं जो हमारा इंतज़ार कर लौटकर जा चुके हैं और कभी-कभी दिखाई देते हैं कुछ जाने-पहचाने से चेहरे भी जो इंतज़ार कर लौट जाने के बाद फिर से वहीं उसी स्थान पर पुनः लौट आये हैं। इन सभी चेहरों में हमें सबसे अधिक आकर्षित करते हैं वो थके और हल्के-हल्के पीले पड़ गए चेहरे जो दायरे के उस ओर लंबे समय से खड़े रहने की वज़ह से मुरझा रहे हैं,जिनके धैर्य का बाँध टूटने की कगार पर है लेकिन अभी टूटा नहीं है।

    आपका किसी को भी ज़रूरत से अधिक दिया गया प्रेम आपके साथी को आप पर हावी होने का मौक़ा दे जाता है,इसलिए हम पर सारी उम्र हावी रहता है हमारा एकांत,हमारा अकेलापन,हमारी अकेले रहने की चाह। हम जब भी उन थके और मुरझाये चेहरों से मिलने के लिए अपने 'एकांत' से अनुमति मांगते हैं तो वो हमेशा की तरह साफ़ शब्दों में इनकार कर देता है। हमारे एकांत में हमेशा हमारे प्रति असुरक्षा की भावना निवास करती है। उसे हमारा उससे कुछ समय के लिए अलग हो जाना तक मंजूर नहीं होता। उसके लिये ये बात सदैव असहनीय रहती है की हम उसके अलावा किसी और को भी अपना समय देना चाहते हैं। वो हमारे साथ हमेशा उस अपरिपक्व प्रेमी की तरह व्यवहार करता है,जो नया-नया ही प्रेम में पड़ा है।

    'जल्द ही फिर से उसके पास लौट आने' का हमारा उसे दिया वादा भी जब उसके लिए पर्याप्त नहीं होता तब हम उसे ठोकर मार अपने ही बनाये नियमों को तोड़ देते हैं। अपने ही बनाये दायरे को पार कर जाते हैं। शायद इसलिए क्योंकि हमारे पास भी एक हृदय है,जिसके छोटे से ही भाग में सही लेकिन जहाँ दूसरों के प्रति आकर्षण है,उनसे लगाव है,प्रेम है। हृदय का वो भाग जो सब कुछ चाहता है लेकिन सिर्फ़ एकांत नहीं चाहता। उस भाग को एकांत से कहीं अधिक प्रिय है उन लोगों की संगत जो उसे स्वयं पर अपनी छाप छोड़ने में समर्थ लगते हैं। लेकिन ऐसे लोगों से हमारी ये मुलाक़ातें अल्पकाल के लिए ही होती हैं। हम उस गोल घेरे से अपने आप को बहुत अधिक समय के लिए बाहर नहीं रख पाते हैं। और इसलिए वापिस लौट पड़ते हैं,फिर से अपने उसी दायरे के भीतर,हमसे रूठे हुए अपने एकांत को मनाने के लिए। उसे ये समझाने के लिए की हमें बेशक वो अत्यधिक प्रिय है लेकिन हमें सिर्फ़ वही प्रिय नहीं है।

    भले हमें हमारे और हमारे एकांत के मध्य किसी और का हस्तक्षेप स्वीकार्य ना हो और ना ही कभी किसी और को उस दायरे के भीतर भी आने दें लेकिन हम समय-समय पर अपने एकांत को नज़र आते रहेंगे;उससे कुछ समय के लिए दूर जाते हुए,अपनी ही खींची लक्ष्मण रेखाओं को लांघते हुए,किसी से मिलने की माँग पर हर बार किये उसके इनकार को ठुकराते हुए,मुरझाये कुछ चेहरों को खिलाते हुए,कुछ लोगों के टूटते धैर्य को बंधाते हुए। क्योंकि हम अंतर्मुखी लोगों को कुछ सर्वाधिक अप्रिय भी है....शायद हम पर किसी का 'एकाधिकार'।

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  • hindipoetry 15w

    हम सभी के जीवन में कभी ना कभी 'प्रेम' हमारे क़रीब से होकर गुज़रता है। उसकी चाल में लेकिन सदैव तीव्रता बनी रहती है,इतनी तीव्रता की अगर उसे पहचानने में हमने ज़रा सी भी देर की तो हमारे पलक झपकाने से पूर्व ही वो हमारी नज़रों से ओझल हो जाता है। वो रूप बदल कर आ सकता है,किसी और रास्ते से आप तक पहुँच सकता है,जीवन के किसी भी पड़ाव पर आप तक आ सकता है लेकिन एक बार पहुँचता अवश्य है। 'प्रेम' अपने आप में सम्पूर्ण है,सकारात्मक ऊर्जाओं का ऐसा पुंज है जो अपने साथ हर तरह की खुशबुओं को लेकर चलता है। हमारे द्वारा उसे पहचान ना पाने पर भी वो हमारे इर्द-गिर्द अपनी मामूली सी महक छोड़ जाता है,जो वर्षों तक हवा में घुली रहकर उस एहसास को जीवित रखती है।

    वही प्रेम मेरे जीवन में मुझ तक तुम्हारे ज़रिये चल कर आया था। उस क्षण के बाद से मेरे लिए तुम ही प्रेम का अर्थ बन कर गयी हो और शायद आजीवन बनी रहोगी। मैं अब जब कभी भी प्रेम लिखता हूँ,मेरे विचारों में मुझे हमेशा तुम ही टहलती मिलती हो। जज़्बातों का प्रकाश जब प्रेम की काया से टकराता है तो उसकी परछाई में एक छवि उभर कर आ जाती है हमेशा,उसे घूर कर देखता हूँ तो वो बहुत हद तक तुम्हारे जैसी लगती है मुझे।

    मैं शायद अब अपने हर मानव जन्म में प्रेम ही लिखता रहूँगा,उसी के आस-पास मेरी क़लम से लिखा हुआ हर शब्द मँडराता रहेगा। मैं 'प्रेम' लिखूंगा,प्रेम में चेहरे पर आई 'मुस्कुराहट' लिखूंगा,बदन की 'रौनक़' लिखूंगा,रोम छिद्रों में समाती उसकी 'महक' लिखूंगा। मेरी क़लम हृदय की वेदना भी लिखेगी,आत्मा का विरह भी लिखेगी,मेरे चक्षुओं के अश्रु भी लिखेगी और मैं युगों-युगों तक यही सब कुछ लिखता रहूँगा,इन्हीं से पन्ने-दर-पन्ने भरता रहूँगा लेकिन मैं कभी 'नफ़रत' नहीं लिख पाउँगा...मेरी क़लम के लिखे किसी भी पन्ने पर अब नफ़रत के पर्यायवाची शब्द नहीं मिलेंगे। मैं अब किसी से शायद नफ़रत कर ही नहीं सकता हूँ...जानती हो क्यों? क्योंकि मैंने सही समय पर प्रेम को पहचान लिया था,उसे मैंने आगे बढ़ने ही नहीं दिया। तेज़ी से भागते प्रेम की कलाई ज्यों ही मेरे हाथ ने थामी...'प्रेम' रुक गया...हमेशा के लिए...यहीं मेरे पास...और प्रेम की यही विशेषता है की वो जहाँ एक बार बसता है,हमेशा के लिए फिर वहीं का होकर रह जाता है। मैंने प्रेम को छुआ है,उसे अपनी बाँहों में भरा है..और जानती हो मुझे प्रेम का स्पर्श कैसा महसूस होता है?...ठीक वैसा जैसे मेरे ठंडे गालों को महसूस होती है तुम्हारी मुलायम और गरम हथेली की गरमाहट,जब कभी तुम उनका सहारा लेकर मेरे शुष्क पड़ चुके माथे को अपने होंठों से चूमती हो।

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