jayraj_singh_jhala

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नक़्क़ालों से सावधान 15 aprail 7804904671

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  • jayraj_singh_jhala 1w

    कुछ खेल नहीं है इश्क़ करना
    ये ज़िंदगी भर का रत-जगा है
    ©अहमद नदीम क़ासमी
    #jhala

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    वक़्त शायद इस भरम में यूँ ही कट जाएगा
    वो करीब आएगा और मुझसे लिपट जाएगा

    देखिए मेरी नज़र से इस जहाँ को इक बार
    कहकशाँ इक शख़्स में सारा सिमट जाएगा
    ©झाला

  • jayraj_singh_jhala 2w

    नज़र की मौत इक ताज़ा अलमिया
    और इतने में नज़ारा मर रहा है
    ©अब्दुल अहद साज़
    #jhala

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    ग़ज़ल

    दूर तक फैला है सहरा का नज़ारा
    ढूँढते है चश्म दर्या का नज़ारा

    किस तरह गुलदान पर नज़रें टिकी है
    देखिए शैतान हव्वा का नज़ारा

    ख़स्तगी में ही गुज़रता है हर इक दिन
    ख़्वाब में आता है फ़र्दा का नज़ारा

    है तहम्मुल कितना मेरा देखना है ?
    देखिए ज़ख़्म-ए-सुवैदा का नज़ारा

    मुश्किलात-ए-राह-ए-मंज़िल की बयानी
    दे रहा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा का नज़ारा

    हाए! क़ातिल की शराफ़त का नज़ारा
    क़त्ल कर चेहरे पे तौबा का नज़ारा

    देख तुझको सारे अंधे हो गए हैं
    देख "झाला" अहल-ए-दुनिया का नज़ारा
    ©झाला

  • jayraj_singh_jhala 3w

    शे'र

    आपको गर देखना हो सहरा का मंज़र
    झाँकिएगा मेरी आँखों के समंदर में
    ©झाला

  • jayraj_singh_jhala 5w

    कहाँ तक शैख़ को समझाइएगा
    बुरी आदत कभी जाती नहीं है
    ©बिस्मिल अज़ीमाबादी

    हबाब / bubble
    सराब / mirage, illusion
    ग़ुराब / arrogance
    सवाब / पुण्य
    इंतिसाब / dedication
    इर्तिक़ाब / पाप करना

    #jhala

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    ग़ज़ल

    फिर किसी शब-ए-दिलक़श के शबाब में गिरकर
    रिंद मर गए सारे ही शराब में गिरकर

    रोज़ इक नए से चेहरे के साथ आता है
    भूल बैठा चेहरा ख़ुद का नक़ाब में गिरकर

    वक़्त के तक़ाज़े के साथ बह गए थे जो
    क़ैद हो गए वो दर्या हबाब में गिरकर

    हो रहा है बस इतना आफ़ताब घर घर के
    बुझ रहे है अब हुस्न-ए-माहताब में गिरकर

    प्यास का सफ़र था और थी तमन्ना पानी की
    फिर तो ख़ाक होना ही था सराब में गिरकर

    इक अजीब बीमारी की गिरफ़्त में आकर
    खो दिया वजूद अपना ही ग़ुराब में गिरकर

    रोज़ काटते हो चक्कर कनिश्त-ओ-क़ाबे के
    कुछ नहीं मिलेगा "झाला" सवाब में गिरकर

    इंतिसाब की क़ीमत ही नहीं यहाँ "झाला"
    तुम भी लुत्फ़ उठाओ अब इर्तिक़ाब में गिरकर
    ©झाला

  • jayraj_singh_jhala 7w

    कुछ एहतियात परिंदे भी रखना भूल गए
    कुछ इंतिक़ाम भी आँधी ने बदतरीन लिए
    ©नुसरत ग्वालियारी
    #jhala

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    ग़ज़ल

    गए जो ख़ुश्बू की ज़ानिब उन्हें संदल ले डूबा
    तलब सूखे गलों की प्यासा इक बादल ले डूबा

    मुझे तो सिर्फ़ काला रंग ही नज़र आ रहा था
    प' बीमारों को उसकी आँख का काजल ले डूबा

    बलंदी पा गए है बाक़ी सारे दोस्त मेरे
    मैं भावुक ठहरा, मुझको गाँव का पीपल ले डूबा

    कुचल कर जिस्म जिसका बढ़ रहे थे आगे सारे
    मुझे उस आदमी का ही बदन घायल ले डूबा

    ज़मी फैला के बैठी है अज़ल से दामन अपना
    मगर ना-समझों को तो चर्ख़ का आँचल ले डूबा

    किसे कोसे, कहाँ जाए, रखें उम्मीद किस से
    बे-चारे पंछियों के ऐश को जंगल ले डूबा

    वहाँ बज़्म-ए-मुहब्बत में मैं भी रौशन हो जाता
    जो मुझमें पल रहा था शाइर इक सच्चल,ले डूबा

    जहाँ को जीत लेने की थी क़ुव्वत तुम में लेकिन
    तुम्हें "झाला" तुम्हारा ही मिज़ाज़ अड़ियल ले डूबा
    ©झाला

  • jayraj_singh_jhala 9w

    गिरा रहे हैं मुसलसल वो बिजलियाँ 'दानिश'
    बताओ कैसे बचाओगे आशियाने को
    ©दानिश फ़राही
    #jhala

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    शे'र

    नज़र सभी की उस इक टहनी पर ही अटकी है
    टिका हुआ है सहारे पे जिसके घर मेरा
    ©झाला

  • jayraj_singh_jhala 10w

    चाहता है आज़माना ज़र्फ़ को मेरी कोई तो
    ज़ायजे में खून से मेरे रवानी माँगता है
    ©मीरा
    #jhala

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    ग़ज़ल

    ख़ल्वतों से निबाह कर आया
    ज़िन्दगी को तबाह कर आया

    रौशनी के थे सब मुरीद सो मैं
    तीरगी से निकाह कर आया

    बे-सबब सर धरा गया इल्ज़ाम
    इसलिए मैं गुनाह कर आया

    उसकी और देखा तक नहीं मैं ने
    कोह का फ़ख्र काह कर आया

    ज़िक्र कर यारों में मुहब्बत का
    जंग की इफ़्तिताह कर आया

    देख कर मुझ को तंज कस रहे थे
    हँस के मैं वाह वाह कर आया
    ©झाला

  • jayraj_singh_jhala 10w

    जब से मिराकी पर ये deactivated_user लिक्खा
    आने लगा है ना तब से इल्म हुआ है मुझे भी कितने
    लोगों ने ब्लॉक कर रखा है ������
    #jhala

    बर आब / पानी की सतह
    थाह / गहराई
    शाहराह / crowded road
    नशेमन / घोंसला
    सबाह / early morning

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    ग़ज़ल

    दबी लबों की ख़मोशी में आह से निकली
    बर-आब कुछ न था बर्बादी थाह से निकली

    चली गई रुकी सब गाड़ियाँ ओ छट गई भीड़
    तमाम लाशें फिर उस शाहराह से निकली

    कि यक-ब-यक मिरा जब बहर-ए-चश्म फूट पड़ा
    तबाह कश्तियाँ मेरी निगाह से निकली

    मैं सोचता हूँ सबब रंजिशों का क्या होगा
    तो खिलखिला के अना रम्ज़-गाह से निकली

    बड़ा ही ज़ुल्म किया रात ने नशेमन पर
    किसी परिंद की चीखें सबाह से निकली

    बदन को मौत मिली ये बहुत ही अच्छा हुआ
    कि रूह हो के रिहा क़ैद-गाह से निकली
    ©झाला

  • jayraj_singh_jhala 12w

    "सबब-ए-तबाही"

    ख़ूबसूरत शय हर इक
    निकली है तेरी ज़ात से ही
    छू के शजरों को गुजरती ये हवाएँ
    और अब्र-आलूद रंगीं ये फ़ज़ाएँ
    दर्या में अटखेलियाँ करती ये लहरें
    और साहिल पर निखरती ये शुआएँ
    जानता हूँ!
    हू-ब-हू जन्नत है ये सारे नज़ारे
    लेकिन इक दिन ये नज़ारे ही
    सबब होंगे तबाही का जहाँ की
    ज़ुल्फ़-ओ-चश्म-ओ-आरिज़-ओ-लब तेरे
    और तेरा हर इक ढब
    सर-ब-सर एहसास देते है इरम का मुझको भी
    यानी सबब मेरी तबाही का तू होगी
    ©झाला

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    नज़्म

    (अनुशीर्षक में पढ़िए)

  • jayraj_singh_jhala 12w

    अब मैं समझा तिरे रुख़्सार पे तिल का मतलब
    दौलत-ए-हुस्न पे दरबान बिठा रक्खा है
    ©क़मर मुरादाबादी

    निकहत / ख़ुश्बू
    सुम्बुल / एक ख़ुशबूदार घास
    आरिज़ / cheeks
    अरक़ / पसीना
    शादाब/ताज़ा, खिला हुआ
    जाम-ए-जम / the bowl of Jamsheed in which he saw whatever he wishsed to see
    सीमाब / quicksilver, mercury
    शहदाब / शहद की दारू
    मोज़िज़ा / चमत्कार
    गौहर / pearl
    ज़रताब / bright gold
    #jhala

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    नज़्म

    सर्द रातों का हसीन इक ख़्वाब है चेहरा तिरा
    क्या कहूँ बस मंज़र-ए-नायाब है चेहरा तिरा

    निकहत-ए-गेसू को तेरी निकहत-ए-सुम्बुल लिखूँ
    तेरे नर्म-ओ-नाज़ुक इन होठों को बर्ग-ए-गुल लिखूँ
    आरिजों पर ये अरक़ लगता है शबनम की तरह
    और सनी उसमें लटें लगती है रेशम की तरह
    जैसे कोई गुलशन-ए-शादाब है चेहरा तिरा
    क्या कहूँ बस मंज़र-ए-नायाब है चेहरा तिरा

    नूर से कुछ इस तरह है चश्म तेरे तर-ब-तर
    चाँदनी का अक़्स जूँ उतरा हो सतह-ए-आब पर
    पुतलियाँ दोनो तिरी आँखों में दो नीलम लगे
    और तिरी आँखों का पानी मुझको जाम-ए-जम लगे
    वक़्त-ए-सुब्हा आलम-ए-सीमाब है चेहरा तिरा
    क्या कहूँ बस मंज़र-ए-नायाब है चेहरा तिरा

    कौल हर निकला ज़बाँ से जो तिरी, शहदाब है
    और लबों का तिल किताब-ए-इश्क़ का इक बाब है
    है मुसव्विर की तिरे अंग-अंग में गुलकारियाँ
    मोज़िज़ा लगती है तेरे हुस्न की रंगीनियाँ
    गौहर-ए-नायाब है ज़रताब है चेहरा तिरा
    क्या कहूँ बस मंज़र-ए-नायाब है चेहरा तिरा
    ©झाला