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  • love_unlimited 1w

    Listen to your conscience

    "We often have to believe in our intuitive conscience. हमें अक्सर अपने अन्तर ज्ञान पर भरोसा करना पड़ता है।" - Just sit with silence and listen to your conscience. May the noble and elevated thoughts bestow upon me from all the ten directions. - ऋग्वेद* ©love_unlimited

  • love_unlimited 2w

    कहना और समझना

    *भाषा संवाद में अक्सर आने वाली कठिनाई*

    *यह भाषा (शब्दों) के द्वारा संवाद की समस्या सदा से रही है कि कहा कुछ जाए और समझा कुछ और ही जाए। यह एक प्रकार से भाषा (शब्दों) की अपने प्रकार की भी समस्या रही है। क्योंकि हमारे पास भाषा के सीमित शब्द जो हैं सो हैं, उनसे ही अपनी बात कहने का काम चलाना पड़ता है। असल में किसी भी भाषा की साहित्यिक भाषा के अर्थ को भी समझना इतना सरल नहीं होता जितना हम समझ लेते हैं। वास्तविकता तो यह होती है कि हम अपनी मातृ भाषा के पूरे एप्लीकेशंस को और उसके समय स्थान परिस्थिति के अनुसार उसके उपयोग को भी पूरी तरह से नहीं जानते होते हैं। दूसरी कहने का अर्थ कुछ और; और समझा जाए का अर्थ कुछ और ही की यह समस्या इसलिए भी रही है, क्योंकि हम सभी आत्माओं में प्रत्येक में एक इनबिल्ट समझने की योग्यता है। हम उससे ज्यादा या कम नहीं समझ सकते हैं। जो भाषा हम संवाद में उपयोग में लाते हैं, यदि वह हमारी इनबिल्ट योग्यता से मिलती जुलती है तो उसका वैसा ही अर्थ हमें समझ में आ जाता है जिस अर्थवत्ता को लेकर उस भाषा या उन शब्दों में वह बात कही गई है/थी। अन्यथा समझ में नहीं आता। खैर यह समस्या तो है और रही है। इसी से ही ज्यादातर गलतफहमियां निर्मित होती हैं। लेकिन इसका उपाय क्या है? दो ही उपाय हैं। पहला - अपनी भाषा और भाव भाषा को समझने की योग्यता को बढ़ाएं। दूसरा उपाय है - जितना हो सके इससे बचने का प्रयास करना चाहिए। यदि कभी कहीं किसी विषय पर कुछ बात क्लियर समंझ में नहीं आती हो तो उसको स्पष्ट करने या करवाने का प्रयास करना चाहिए। *
    ©love_unlimited

  • love_unlimited 2w

    Positive Thinking

    Those who are positive thinkers and positive efforts makers, despite of persisting situations, sooner or later they find the real soothing solutions 100% certainly. Having positive attitude (thinking) in situations signifies that you are applying a positive state of mind in solving the situations. The insight is that there is some kind of energy which needs to be settle down. Afterwards the spring of life will definitely happen. That is the law of nature. There is no doubt about it. It is the matter of understanding with wit and wisdom. You believe it or not, I perceive it and believe it. There is nothing to think more about it. So never stop, just remain positive and keep doing positive.*_
    ©love_unlimited

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    Creatures has the sense

    *Every creature has its sense of its own kind and can be trained with love and respect. Why because it has the consciousness. The consciousness can observe, learn and follow the instincts. Even we can see the fishes. How worth amazing!*
    ©love_unlimited

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    योग की विद्या परम विद्या है।

    परम विद्या - राजयोग :- संसार में जितनी भी प्रकार की विद्याएं हैं उनमें योग की विद्या परम विद्या है। इस परम विद्या को परम ज्ञान भी कहा गया है। इसे ही आत्म-ज्ञान और परमात्म-ज्ञान भी कहा गया है। परमात्म प्रदत्त विद्या विशेषतः योग (राजयोग) का ज्ञान है। इसलिए परम है। शेष जितने भी ज्ञान हैं वे सब गौण हैं। वे सब इसी योग के परम ज्ञान से ही उद्भूत हुए हैं। इस परम विद्या को पढ़ने का अपने प्रकार का पुरुषार्थ (मेहनत) है। अग्रसर रहिए।
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    लक्ष्य

    "क्या सृजनात्मक लक्ष्य अनिवार्य है"

    जीवन के उत्कृष्ठ अनुभवों के लिए लक्ष्य का होना अनिवार्य है। मनोविज्ञान को समझें तो हमें पता चलता है कि जीवन में यदि हमारा कोई सृजनात्मक और सकारात्मक लक्ष्य होता है तो हमारा व्यक्तित्व सदा प्रगति की दिशा में चलता रहता है। फिर चाहे वह लक्ष्य, कैसा भी कुछ भी हो। जब हमारा लक्ष्य निर्मित होता है तो यह हमें बहुत से व्यर्थ विचारों से मुक्त रखता है। इसी संदर्भ में मनोविज्ञान की यह बात भी समझ लेने जैसी है कि हमारे व्यक्तितव की प्रगति में ही वह सब आन्तरिक आध्यात्मिक मूल आकांक्षा अंतर्निहित है जो सभी आत्माओं को जन्मों जन्मों से रही है। चाहे वह कोई भी आत्मा हो। लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुछ उद्देश्य भी बनाने होते हैं। इसका ध्यान रहे कि ऐसा कभी भी ना हो कि हम येन केन प्राकारेन अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की होड़ में लग जाएं। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यथेष्ठ पॉज़िटिव पुरुषार्थ करते रहें। अपना लक्ष्य बनाएं और अविराम गति से आगे बढ़ते चलें। निश्चित ही आपके जीवन में दिव्यता बढ़ती ही जाएगी। इसमें कोई सन्देह नहीं है। ©love_unlimited

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    लक्ष्य

    *"क्या सृजनात्मक लक्ष्य अनिवार्य है"*

    *जीवन के उत्कृष्ठ अनुभवों के लिए लक्ष्य का होना अनिवार्य है। मनोविज्ञान को समझें तो हमें पता चलता है कि जीवन में यदि हमारा कोई सृजनात्मक और सकारात्मक लक्ष्य होता है तो हमारा व्यक्तित्व सदा प्रगति की दिशा में चलता रहता है। फिर चाहे वह लक्ष्य, कैसा भी कुछ भी हो। जब हमारा लक्ष्य निर्मित होता है तो यह हमें बहुत से व्यर्थ विचारों से मुक्त रखता है। इसी संदर्भ में मनोविज्ञान की यह बात भी समझ लेने जैसी है कि हमारे व्यक्तितव की प्रगति में ही वह सब आन्तरिक आध्यात्मिक मूल आकांक्षा अंतर्निहित है जो सभी आत्माओं को जन्मों जन्मों से रही है। चाहे वह कोई भी आत्मा हो। लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुछ उद्देश्य भी बनाने होते हैं। इसका ध्यान रहे कि ऐसा कभी भी ना हो कि हम येन केन प्राकारेन अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की होड़ में लग जाएं। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यथेष्ठ पॉज़िटिव पुरुषार्थ करते रहें। अपना लक्ष्य बनाएं और अविराम गति से आगे बढ़ते चलें। निश्चित ही आपके जीवन में दिव्यता बढ़ती ही जाएगी। इसमें कोई सन्देह नहीं है।*

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    Yog - Supreme Love

    योग परम प्रेम है। योग आत्मा की उच्चतम अवस्था की ओर उन्मुख हुई चुम्बकीय अवस्था का नाम है। योग आध्यात्मिक भाषा में परम प्रेम है। यह ऐसा उच्चतम दिव्य प्रेम है जो अव्यक्त स्थिति से अव्यक्त सत्ता परमात्मा से संबंधित होता है। इसलिए ही इसे परम प्रेम कहा गया है। पूरे मनोयोग से योग के अभ्यास के द्वारा यह परम प्रेम की दिव्य स्थिति बनाई जा सकती है, अनुभव की जा सकती है।

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    खुशी

    मनुष्य के अन्दर भी मूक स्वर में विचारों का शोरगुल है। उसके सुनने, देखने और समझने और उसको समाप्त करने के लिए भी बाहर के शोरगुल से परे रह चुप रहना भी जरूरी होता है। फिर तो खुशी भी आपकी और शान्ति भी आपकी। इसमें कोई सन्देह नहीं।
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    रिश्ते सुधरें

    चाहते सभी हैं कि रिश्ते सुधरें। लेकिन हर कोई चाहता है कि शुरुवात उधर से हो।
    जब इंसान की जिस्मानी दृष्टि होने के कारण बेरुखी की आदत ही बन जाए तो ऐसा अक्सर होता है। वर्तमान में आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक रूह अपना रुख खुद की रूह की ओर करे। जैसे ही यह आदत पक्की होगी वैसे ही वह बेरुखी की आदत रफूचक्कर हो जाएगी। अर्थात ऐसी आदत की स्थिति स्वाभाविक रूप से बदले, उसके लिए बुद्धि की प्रखरता और योग के गहरे अनुभव ही काम आ सकते हैं।
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