malay_28

wandering with words.

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Reposts
  • malay_28 1d

    02/03/2021

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    किसी की अस्मत तार तार कर मुस्कुराते हो
    कैसे मर्द हो अपनी माँ की कोख़ को लजाते हो !

    अपनी बहन की रक्षा करने शेर तो बन जाते हो
    दूसरों की बहन के लिए क्यों कुत्ता हो जाते हो !

    जब कोई सम्मान नहीं नारी का तुम्हारी आँखों में
    फ़िर क्यों हर साल माता का पंडाल सजाते हो !

    सीखा कहाँ से तुमने दूसरों की इज़्ज़त से खेलना
    लूट कर आबरू किसी की क्या माँ को बताते हो !

    ©malay_28

  • malay_28 2d

    01/02/2021

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    दिल दिया ना दिया क्या करना
    उम्र गुज़ार कर सबको है मरना !

    जिसको देना है दे दो बेख़ौफ़
    दिल ही है टूटने से क्या डरना !

    धूल रंजिशों की जहाँ उड़ती हो
    उन राहों से तुम कभी ना गुज़रना !

    आरज़ू है इक इस दिल की बची
    हो सके कभी ख़्वाबों में मिलना !

    बहकना तो लाज़मी होगा मलय
    मुझे सम्हाल लेना ख़ुद सम्हलना !

    ©malay_28

  • malay_28 2d

    28/02/2021

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    दिल मेरा रहता रहा कहीं का कहीं
    न सर पे आसमाँ न क़दमों में ज़मीं !

    कहीं था नहीं बादल कोई गगन भर में
    मग़र छाई थी मेरे निग़ाहों में नमीं !

    कई टुकड़ों में शीशे के देखता हूँ मैं
    हर टुकड़े में दिखता है मुझमें कमी !

    किसने तोड़ा दिल मेरा अब क्या कहूँ
    जब था नहीं ख़ुद मेरा ही मुझपे यकीं !

    ©malay_28

  • malay_28 5d

    26/02/2021

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    वो घर

    ख़ामोशी दीवारों की ये कहती है
    ग़मगीन रातों में
    कुछ परछाइयाँ यहाँ रोती हैं
    बेचैन रहती हैं कुर्सियाँ और मेज़
    बिस्तर भी तन्हा करवट बदलती है
    इधर उधर करती एक ख़ुश्बू
    कमरे में लगातार टहलती है
    दीवारों पे टंगी तस्वीरें
    सरगोशियाँ करती हैं
    गुज़रे हुए कल को याद कर
    ठंढी आहें भरा करती हैं
    धूप की कुछ किरणें कभी
    भटक कर आ जाती हैं
    नम हवाओं को गर्म कर जाती हैं
    ये उदास घर
    खो चुका है घरवालों को
    रोता हुआ समय आया था एक दिन
    दरवाज़े सिहर उठे थे उसकी दस्तक पर
    कोई अजीब सी बीमारी
    मुस्कुराती हुई घर आयी थी
    उसकी मुस्कुराहट किलकारियों में बदल गयी
    एक एक कर घरवाले दुनियाँ से निकल गए
    कोना कोना सिसक उठा
    हर कमरा, बरामदा, गलियारा रोया था
    अपने अश्क़ों से घर को धोया था
    मुस्कुराती हुई तस्वीरें
    घर को आज भी सांत्वना देती हैं
    कि जैसे मौत दबे पाँव आयी थी
    किसी दिन चुपके से
    ज़िन्दगी भी मुस्कुराते हुए आएगी
    ख़ामोश दीवारें इंतज़ार कर रही हैं.

    ©malay_28

  • malay_28 1w

    24/02/2021

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    मेरे अश्क़ों के समंदर में यार मिरे
    कश्ती-ए-बेवफ़ाई तेरी चलती रही !

    था दिन मेरा अँधेरे में डूबता हुआ
    रोशनी महफ़िल में तेरी सजती रही !

    हासिल फ़क़त दर्द ही रहा इश्क़ में
    वक़्त से परे उम्र मेरी ढलती रही !

    दिल लगाकर दिल तोड़ना भी क्या
    हाशिये पर वफ़ा हाथ मलती रही !

    जानते हुए कि परवाना आएगा नहीं
    वो शमा रात भर यूँ ही जलती रही !

    ग़मों के साहिल पे दर्द की लहर टूटी
    ज़हर-ए-बेवफ़ाई नसों में उतरती रही !

    ©malay_28

  • malay_28 1w

    23/02/2021

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    वो तो बेवफ़ाई की थी दिल ने दिल से
    छलक तू क्यों गयी आँखें जऱा बता !

    कहा तो था दिल ने उसे नज़र में बसा
    ख़तावार तू क्यों हुई आँखें ज़रा बता !

    चलो माना कि वो हसीनों में हसीन थी
    बहक तू क्यों गयी आँखें ज़रा बता !

    ख़ुश्बू अनकहे दर्द की फ़ैली है यहाँ
    महक तू क्यों गयी आँखें ज़रा बता !

    रहेंगे जागते रात भर इंतज़ार में मलय
    झपक तू क्यों गयी आँखें जऱा बता !

    ©malay_28

  • malay_28 1w

    21/02/2021

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    झुकी जो घटा धरती के लबों पर
    कहाँ कहाँ बरसा पानी कौन कहे !

    इक मासूम कली मुस्कुराने जो लगी
    बनी फ़िर कितनी कहानी कौन कहे !

    सल्तनत में जब लगती है आग कभी
    कहाँ राजा कहाँ की रानी कौन कहे !

    कुछ दूब थे इठला रहे सुबह मस्ती में
    उनपे छाई बूंदों की जवानी कौन कहे !

    लम्हों की पतवार और नाव वक़्त की
    ज़िन्दगी दरिया की रवानी कौन कहे !

    ©malay_28

  • malay_28 1w

    21/02/2021

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    कुछ बात तो होगी जब मिलोगे तुम
    कुछ तो मैं कहूँगा कुछ कहोगे तुम !

    ख़ामोशियों के इस झीने चिलमन में
    कह दो कब तक चुप रहोगे तुम !

    एक लहर तुम हो एक लहर मैं भी
    बताओ क्या संग संग बहोगे तुम !

    टूटकर मौज़ों से आऊँगा किनारे मैं
    कह दो कि साहिल पर मिलोगे तुम !

    छोड़कर मलय मंज़िल की फ़िकर
    जिधर भी मैं चलूँ क्या चलोगे तुम !

    ©malay_28

  • malay_28 2w

    19/02/2021

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    मेरे फ़लसफ़ों की ख़ुश्बू है या तुम हो
    मेरे कमरे में ये सुगंध कैसी फ़ैली है !

    पगडंडियों से कह रही ये फसलें अभी
    कोई कहना नहीं चुनर मेरी मैली है !

    थे तो इंसाँ ही सब जाने कैसे बदल गए
    शायद ज़माने की हवा ही विषैली है !

    कुछ सूखी रोटियाँ रो रही हैं सड़क पर
    शायद किसी ग़रीब की फटी थैली है !

    अब आग लफ़्ज़ों से लगती है मलय
    जाने कौन-सी भाषा कौन-सी शैली है !

    ©malay_28

  • malay_28 2w

    17/02/2021

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    तुम रहो ना रहो साथ मेरे कोई ग़म नहीं
    वीरान आँखों में अब है कोई शबनम नहीं !

    सह लेंगे कड़ी धूप ज़िन्दगी की राहों में
    हर साये के पीछे भागने वाले तो हम नहीं !

    हासिल-ए-इश्क़ ग़र अश्क़ है तो वही सही
    सीखा ग़मों में मुस्कुराना वो भी कम नहीं !

    ज़िन्दगी की पगडंडियां इम्तिहान ही सही
    बहका सके मेरे क़दम किसी में दम नहीं !

    आग-ए-इश्क़ में सुलगते अहसास हैं मेरे
    धुआँ धुआँ तो हैं आँखें मग़र ये नम नहीं !

    ©malay_28