msr_prose

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@kalamsnehi @lafzbaz Loves the langs of love because "zindagi na milegi dobara isiliye pakad lo mahobbat ka kinara"..

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  • msr_prose 1w

    सैनिक!!

    एक सैनिक की ज़िन्दगी भी कितनी बेशुमार है।
    देश की सहादत को लेके उसमे कितना खुमार है।
    हां, अपनों से रिश्तों को तोड़ मुल्क की हिफाज़त में खुद में ही कहीं खो जाता है वो।
    छोड़के मकमले बिस्तर के आंचल को, काटों भरी ज़मीन पर सो जाता है वो।
    जब रखी हो जान हथेली पे , उस दिन को रमजान कहता है वो।
    मिट्टी को अपनी महबूबा और वतन को हिन्दुस्तान कहता है वो।
    हर मुसीबत को ज़र्रा समझ टाल देता है वो।
    उगलते बारूद के ज़हर में इंकलाब की गोली डाल देता है वो।
    चलो आज उन शहीदों को चिराग़ से चमन करते है।
    उनकी रूह की खैरियत के लिए सिर झुका के नमन करते है।
    ©msr_prose

  • msr_prose 2w

    कल वो...

    आज मुलाक़ात मुक्कमल हुई एक ऐसे सख्स से,
    कि अनोखा सा दास्तां-ए-क़िस्सा बन गया।
    मैं फितूर में था अपने इश्क़ की रूबाई में यूंकी,
    कुछ सवालों का संघ,मेरी बंदगी का हिस्सा बन गया।

    न ज़रूरत थी आंसुओं कि, न इल्ज़ाम था वफ़ा पे,
    शब-ओ-शाम उसे यूं याद किया, कि चर्चा बन गया।
    पहले नफ़रत थी गुलाब से मुझे, और फ़िर बैर था कांटों से ,
    मगर इश्क़ की बुनियाद पे, शगुफ्ता गुलाब भी ख़र्चा बन गया।

    रंध रहा है दिल मेरा, और बूझ गई है चिमनी ज़िन्दगी की अब,
    इस अंधेरे में घुटा आशिक़ी का मलबा लबोलुआब आ जाएगा।
    तुम दास्तां सुनो बैठ के उन हसीं लम्हों की एक शर्त पे युंकि,
    उसका नाम मत लेना, नहीं तो बंजर जमीं पे भी सैलाब आ जाएगा।

    चलते रहना है, भटकते भटकते यूहीं इन बाजारों में हमें,
    आज खाली हैं हाथ, तो कल काम आ जाएगा।
    निगाहों में रखते है तस्वीर उसकी, और पलकों पे बैठा के उसको,
    आज नहीं तो कल नीचे उतरेगा वो, और एकरोज़ सामने सरे आम आ जाएगा।
    ©msr_prose

  • msr_prose 4w

    आज कुछ..

    आज सुलझ गई है ज़िन्दगी थोड़ी सी,
    अब थोड़ा दानिस्ता हो, चैन कमाते हैं।
    बहुत आजमाइश की है, वक़्त ने हमारी ज़िन्दगी से,
    अब ज़िन्दगी को जन्नत बना, वक़्त को आजमाते हैं।

    यूं तो न बुलंद होंगे हौसले, इस जहां में, आज अपने
    कद को इमारत बना आसमान को अपनी ऊंचाई दिखाते हैं।
    मायूसी के बादल बन, सिकुड़ गए थे जो लब हमारे,
    आज उन्हीं लबों पर मुस्कुराहट का लिबास सजाते हैं।

    वर्षों पहले अधूरा रह गया था जो क़िस्सा हमारा,
    आज उसी कहानी को इब्तिदा कर तमाशा बनाते हैं।
    कुछ तुम अपने हुनर को परखना, कुछ नवाजिशे मैं दिखाऊंगा,
    जिस मंज़र की दीवानी है ये दुनियां, दोनों मिल के वो किरदार निभाते हैं।

    अब बस मन भर गया है मेरा सितारों को देख के,
    जो चाहते है हमें सबसे ज्यादा, आज उनसे चांद मंगाते है।
    जलने की आदत हो गई है मुझे इज़्तिराब में युंकी,
    आज अपनी खिड़की पे एक सूरज और लगाते हैं।
    ©msr_prose

  • msr_prose 6w

    तेरे इश्क़ में फ़ना होने के बेसब्री से इंतज़ार में हूं,
    जिस दार पे हो रहे है सर क़लम आशिकों के,
    आज मैं भी उस क़तार में हूं।
    बस थोड़ी सी उल्फ़त हो रही है मुझे इस
    दरिया में डूबने से,
    क्योंकि मेरी कश्ती सहिलो पर थमी हुई है,
    और मैं मुसाफ़िर मझधार में हूं।
    ©msr_prose

  • msr_prose 6w

    Father's Day

    मंज़र चाहे जो भी हो, कितना ही जटिल क्यों न हो,
    हर परिस्थिति में तूने मुझे ढलना सीखा दिया।
    मां ने तो फ़खत मेरी उंगली थामी थी,
    मगर तूने मुझे अपने कदमों पे चलना सीखा दिया।

    इस रंगीन सी दुनिया में अपने दुख को दफ़न कर,
    आंसूओं को पत्थर बना अपने आलिंगन पर मल दिया।
    मैं घूमता था अल्हड़ सा, अधनंगा सा इस जहां में,
    अपनी चमड़ी को चादर बना मेरा लिबास बदल दिया।

    पुख़्ता सी इन राहों पर और चलती दमकती इन सांसों पर,
    ज़िन्दगी की ये बदलती तस्वीर महज़ एक कसौटी है।
    इस जहां की हरकतों को मैंने बहुत आज़मा के देखा,
    मगर नतीज़ा ये पाया कि, तेरे आसमां तले मेरी ज़मीं छोटी है।

    हर पल के लिए अहम तो तूने मुझे बनाया है,
    तेरी वालिदगी को चमन बनाना ख़ुद में ही एक सूफ़ी है।
    और कितना साझा करूं इन चंद पुच्छेले अल्फाजों में,
    तेरी बंदगी को बयां करना समझदारी नहीं, बेवक़ूफ़ी है।
    ©msr_prose

  • msr_prose 7w

    तेरे इश्क़ में...

    तेरी गलियों में घूमता रहता हूं आंखो का पानी बिछाते-बिछाते।
    ज़माना बीत गया और सदी आ गई, तुझे ग़ज़ल में तब्दील कर गाते-गाते।

    तेरी तस्वीरो का वजूद है मेरी ज़िन्दगी से कहीं ज्यादा,
    कभी उनको देख के निकलता है दिन, तो कभी गुजरती हैं राते।

    तुझे याद है जिस तस्वीर में लगती है, तू सबसे ज्यादा ऐठी हुई,
    पूरी रात लग गई मुझे पेच-ओ-ख़म में, कि उस नींद से तुझे उठाते-उठाते।

    अचानक छूट गई मेरे हाथ से और बिखर गई फर्श पर वो हसीं यादें,
    फ़िर तो मेरी पूरी रात गुज़र गई गिरता पानी पोंछते पोंछते, और उन तस्वीरों को सजाते-सजाते।

    मेरी वफ़ा का इतिहास छिपा हुआ है तेरे इन कूंचों में,
    इन्हीं में तबाह जो हुआ था मैं, तेरे इश्क़ में धूम मचाते-मचाते।

    लगा ही लिया मौत ने मुझे एक दिन गले, बर्शर-ए-दरिया।
    निकल ही गई तेरी सादगी को जाया करते करते मेरी सांसे, तेरे कठोरपन को बचाते-बचाते।
    ©msr_prose

  • msr_prose 7w

    अफ़लातून

    एक जमाने में मैं सिर्फ उसे उसके नाम से जानता था,,
    मगर कुछ वक़्त पलटने के बाद, अब मैं उसे उसकी रूह से पहचानता था।।
    बस बात इतनी सी थी कि अब बयां नहीं की जा सकती,,
    वो ज़ईफ़ यादें अब जवां नहीं की जा सकती।।
    हां... थोड़ा सब्र करो तो बता सकता हूं,,
    क्या मैं तुम्हारा थोड़ा वक़्त लेके तुम्हें भी उसकी यादों से सता सकता हूं।।
    उसके साथ मुझे खुशनुमा सा प्रतीत हो रहा था,,
    मैं बेखबर था इस बात से कि वहां से मेरा सोने जैसा अतीत शुरू हो रहा था।।
    उसकी कुछ यादें अभी भी तितली बनकर मेरे दिल के गुलसितां में घूमती हैं,,
    अहसास करता हूं जब-जब उसका मेरी पलकें उन अश्कों को चूमती हैं।।
    धीरे-धीरे मैं भी उसको जान रहा था,,
    मेरा दिल उसे मुझसे भी ज़्यादा अपना एक अहम हिस्सा मान रहा था।।
    अब ये दौर उस उरूज़ पर पहुंच गया था ,,
    जिस मंजिल को पाने निकला था अब वो रास्ता वहां नहीं था।।
    पता नहीं कि ये गीत था कि ख्वाब वो तराना हो रहा था,,
    मेरा नसीब तो हैरतअंगेज था ही , और मैं महाराणा हो रहा था।।
    अब तो मैं उसके सामने पूरा बेपर्दा बन गया था,,
    पता नहीं चला कि कब वो मेरा ख़ुदा बन गया था।।


    और आज तो देखो....
    कुदरत ने कैसा खेल रचा दिया,,
    मेरे महबूब को ही मेरा मुखालिफ बना दिया।।
    एक ख्याल आता है मन में कि---
    तूं इन हसीं ख़्वाबों नींद कैसे सो सकता है,,
    तूं अपने ख़ुदा के खिलाफ कैसे हो सकता है।।
    थोड़ा तो गुरूर मुझे भी हो रहा था,,
    मैं अपने ख़ुदा के सामने हारने को मजबूर हो रहा था।।
    पता नहीं उसे आईं या नहीं मगर मुझे तो बेवजह आ रही थी,,
    उससे हारने में तो मुझे बेशुमार वफ़ा आ रही थी।।

    अब तो उसे भी महसूस हो गया होगा कि उसका मेरे बिना गुज़ारा न होगा,,
    उसने हराया होगा बहुतों को मगर, हम जैसा कोई हारा न होगा।।
    बस अब यहीं एक अदब सा किस्सा था,,
    अटूट , अजर और संवरती जिंदगी का एक अहम हिस्सा था।।
    बस अब यहां से तो एक ऐसा राग प्रकट हुआ कि वो मेरे कानों की धून बन गया,,
    अब वो मेरे लिए केवल हमसफ़र ही नहीं था,
    '" अफ़लातून '" बन गया।।
    ©msr_prose

  • msr_prose 7w

    सुशांत....!

    ये आसमां भी कितना नाजुक हो गया है,
    इमरोज़ एक चमकदार सितारा तोड़ देता है।
    कभी बहा देता है कायनात को सैलाब-ए-केदारनाथ में,
    तो कभी दिल को छिछोरे ख्यालों से जोड़ देता है।

    कोई पोंछे तो, पोंछे कैसे इन अश्कों को,
    पलकों के मकम्मले शॉल पर ये कैसे जम गए हैं।
    राबता रहता था ख़ुद से जिन सांसो के दर्मियां,
    ग़म-ओ-हसीं के ताकतवर लम्हें, न जाने
    किस इंतज़ार में थम गए हैं।

    ये कैसा अचम्भित दौर है,
    हर एक पल विक्रांत हो गया।
    जिस तूफ़ान को देख लगा लेते थे,
    अंदाज़ा अपने मनोरंजन का
    वो सख्स भी आज शांत हो गया।
    ©msr_prose

  • msr_prose 8w

    दर्द की धुन

    पाश-पाश हुआ हूं तुझे रिझाने में मैं,
    मेरे ख़्वाबों के दस्तूर को ज़रा बुन के देखो।

    ये इमारतें बड़ा सताती है मुझे अपना अदब दिखा,
    इसकी दीवारों में तब्दील हुए पत्थरों को चुन के देखो।

    इश्क़ मरता रहता है इमरोज़ इन गलियों में,
    हैरत न हो चलते चलते यहां धब्बे फखत खून के देखो।

    यूहीं निकलता रहेगा ये कारवां बेहिसाब यहां,
    इसमें शामिल उन तमाम आहटों को गौरतलब हो सुन के देखो।

    दिल में कैद पड़े हैं इश्क़-ए-अल्फ़ाज़ कुछ यूं कि,आज उन्हें सुनो
    नहीं सिर्फ़ तसव्वुर करो, इन हवाओं में इस मिट्ठे दर्द की धुन को देखो।
    ©msr_prose

  • msr_prose 9w

    हर घड़ी....

    हर घड़ी तेरे इंतज़ार में, मैं पागल इस कद्र हुआ,
    इज्तिराब-ए-महफ़िल में शराब को भी न छुआ
    इन संगीन राहों और ऊंचे अगरोचो में,
    ढूंढा मैंने युंकि पग भर गए मोचों में।
    अब लगता है कि तुझसे रूबरू होने का
    कोई और समूचा नहीं है,
    तन्हा किया ख़ुद को मैंने इतना कि,
    छिप के रोने का कोई कूचा नहीं है।
    मेरे नसीब में तो तू नहीं, बस इतना सा रहम कर दे,
    झूठा ही सही मगर एक रात ख़्वाब में आ, वफ़ा-ए-वहम कर दे।
    ©msr_prose