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  • naimishawasthi 1d

    मन के मीठे पर आंखों के खारे होते हैं
    गौर से देखो हम लड़के भी प्यारे होते हैं

    तकलीफें कितनी हों हम हरदम मुस्काते हैं
    हम चश्मे के पीछे अपना दर्द छुपाते हैं
    घर से बाहर हों तो कौन सुलाए आकर के
    हम सोने की खातिर खुद ही लोरी गाते हैं

    आसमान से बिछड़े टूटे तारे होते हैं
    गौर से देखो हम लड़के भी प्यारे होते हैं

    हम उम्मीदों के बस्ते कंधों पर ढोते हैं
    कभी कभी आते हैं आंसू हम भी रोते हैं
    जब हमको ये दुनिया हारा हारा कहती है
    तब इस बंजर दुनिया मे मुस्काने बोते हैं

    हम छत चौखट आँगन और चौबारे होते हैं
    गौर से देखो हम लड़के भी प्यारे होते हैं
    ©naimishawasthi

  • naimishawasthi 1w

    त्याग चिर विश्राम किंचित
    पथ भ्रमित आशान्वित मैं
    एक ठोकर या कई दुत्कार खाकर चल पड़ूंगा
    किन्तु निश्चय ही समय की मार खाकर चल पड़ूंगा।

    प्रेम की प्रस्तावनाएं ही अधूरी लिख रहा मैं,
    शून्य फल है
    पीर के आरोह पर उत्तुंग का स्पर्श करना,
    कब सरल है
    कल्पना के शीर्ष से अवरोह टूटे स्वप्न सा जब
    जय पराजय संलयन कर सर झुकाकर चल पड़ूंगा
    किन्तु निश्चय ही समय की मार खाकर चल पड़ूंगा।

    व्यर्थ सारी युक्तियां स्वप्निल प्रयोजन हैं अधूरे,
    टूटता मैं
    रूढ़ियों से बिद्ध नेहिल झुरमुटों में आज उलझा,
    छूटता मैं
    इस तिमिर के छोर पर आलोक जोहे बाट शायद
    जल पड़ेगा जब बदन मैं झिलमिलाकर चल पड़ूंगा
    किन्तु निश्चय ही समय की मार खाकर चल पड़ूंगा।

    मौन मृतियों के सुदृढ़ अवलम्ब आश्रित छद्म जीवन,
    पटकथा है
    बाध्य मधु आकर्षणों के आवरण कटु कंटको से,
    ली व्यथा है
    सौंपकर उल्लास के अनुप्रास चाहें मैं व्यथित हूँ
    वेदनाएं सब हृदय में ही दबाकर चल पड़ूंगा
    किन्तु निश्चय ही समय की मार खाकर चल पड़ूंगा।

    पूर्णताएं रिक्तियों के पार्श्व में निश्चिन्त हैं ज्यों,
    काल-दर्पण
    लब्धियाँ होती पराजित ये अटल निर्वात कैसा,
    या समर्पण
    भाग के अनुभाग से उद्धृत कोई गीतांश जीवन
    आ रुकेगा अधर पर मैं गुनगुनाकर चल पड़ूंगा
    किन्तु निश्चय ही समय की मार खाकर चल पड़ूंगा।
    ©naimishawasthi

  • naimishawasthi 3w

    प्रियतमे जब पूछती हो क्यों तुम्हे मैं चाहता हूँ
    मौन शब्दों को छिपाकर व्यंजनाएँ बोलती हैं
    ये चयन इतना सहज तो था नहीं पर जब मिलीं तुम
    एक पल में ही लगा जैसे तुम्ही हो मीत मेरे।

    बोलियों में मिश्रियां सी घोल जब मुझको पुकारा
    मैं विनत होकर तुम्हे सुनता रहा था मौन होकर
    चित्र खींचा जो मनस पर कल्पनाओं ने हमारी
    देखता अपलक रहा मैं आंसुओं से दृग भिगोकर
    तुम वही थीं मैं जिसे सपनों में अक्सर देखता था
    ज्यों युगों से गा रहे थे बस तुम्हे ही गीत मेरे...

    हाँ लुभा सकते मुझे थे पुष्प से मुखड़े मगर मैं
    रूप रखकर गौण पावन भवनाएं चाहता था
    चार नयनों के मधुर सम्मेलनों पर दिव्य अनुपम
    गूंजती सम्मोहिनी वैदिक ऋचाएं चाहता था
    केश श्यामल दृग मनोरम चाँद मुखडों से मुझे क्या
    जब स्वयं साकार हों सब स्वप्न आशातीत मेरे।

    रिक्तियों को पूर्णताएँ मिल गयीं थीं जब मिले तुम
    ज्यों तथागत ने अभीप्सित सत्य का नव बोध पाया
    वो मधुर संबंध जिसकी भूमिका मन ने रची थी
    देख उसको ही प्रिये मैं प्रेम का प्रस्ताव लाया
    पढ़ लिए तुमने कथानक मौन जो मैं कह न पाया
    दृग पटल पर स्वप्न आकर सब हुए अभिनीत मेरे।
    ©naimishawasthi

  • naimishawasthi 4w

    खंजर बरछी तीर कटारी क्या जानें
    हम दुनिया की दुनियादारी क्या जानें
    हम सागर की प्यासी मछली जैसे हैं
    मरुथल आखिर प्यास हमारी क्या जानें।
    ©naimishawasthi

  • naimishawasthi 11w

    तालियों की गड़गड़ाहट
    कहकहे या वाहवाही
    सत्य मूल्यांकन नहीं है
    गीत की अभिव्यंजना के
    मैं पढूं कुछ और तुम बस वाह कर चलते बनोगे
    इसलिए बस गीत की प्रतिध्वनि मुझे भाती नहीं है।

    क्यों सुनाऊँ गीत वह जो आपका मन मोहते हों
    क्यों रचूँ वह शाब्दिक विन्यास जो मन टोहते हों
    मैं लिखूंगा वह कथानक शूल बनकर जो चुभेगा
    तीक्ष्ण भावों की बुनावट कहकहे लाती नहीं है
    इसलिए बस गीत की प्रतिध्वनि मुझे भाती नहीं है।

    शब्द सर से यदि नहीं चुभते, प्रयोजन ही विफल है
    जो प्रफुल्लित आपका मानस करे वह गीत छल है
    टीस देना चाहिए हर शब्द जो निकले हृदय से
    क्रांति सहलाते हुए कर से कभी आती नहीं है
    इसलिए बस गीत की प्रतिध्वनि मुझे भाती नहीं है।

    आपको भी ज्ञात है हर उचित अनुचित इस जगत का
    पथ निहारा जा रहा फिर किस मुहूर्त का नखत का
    यदि कचोटें नहीं मानस और सुधि दें आत्मबल की
    व्यर्थ है वह दीप जिसमें तेल है बाती नहीं है
    इसलिए बस गीत की प्रतिध्वनि मुझे भाती नहीं है।

    युग चितेरे वाहवाही के लिए गाने लगे यदि
    वेदना संवेदना घर छोड़कर आने लगे यदि
    आस का विश्वास का सूरज कदाचित अस्त होगा
    काव्य कृति परिवर्तनों की डोर पिय-पाती नहीं है
    इसलिए बस गीत की प्रतिध्वनि मुझे भाती नहीं है।
    ©naimishawasthi

  • naimishawasthi 11w

    चली जा ग्रीटिंग चमकते चमकते ।
    औ दोस्त को कहना नमस्ते नमस्ते ।।१

    चांदनी रात में चावल पका रहा था ।
    दोस्त, तेरी याद में आँसू बहा रहा था ।।२

    काली साड़ी में कढ़ाई नहीं होती ।
    दोस्त तेरी याद में पढ़ाई नहीं होती ।।३

    ये कुछ ऐसी हसीन शायरियाँ एवं कालजयी रचनाएँ थीं हमारे बचपन की जिसे बीते दशक में जन्म लेने वाले प्रत्येक बच्चे/बच्ची ने सुनी होगी । वह भी अपना स्वर्णिम दौर था । किसी की फ़िक्र नहीं , 50 पैसे की ग्रीटिंग में ही हम सब स्पेशल फ़ीलिया जाते थे । दरअसल वो दौर अनकंडीशनल दोस्ती , अनकंडीशनल प्यार वाला दौर था । वह समय बड़ा याद आता है जब हम वर्चुअल वर्ल्ड से ज्यादा हक़ीक़त की दुनिया में रहते थे । सभी को प्रेम भरा नमस्कार । स्वछन्द एवं प्रेमपूर्ण शुरुवात करने के लिए आज का दिन बना है , नया कैलेंडर नयी खुशियाँ लाये ...!!!

    दैट अठन्नी ग्रीटिंग शायरीज़ वी यूज्ड टू कांग्रेचुलेट टू फ्रेंड्स व्हेन वी वर एट दि गोल्डन टाइम ऑफ़ आर ऐज । मिसिंग दोज़ डेज बैडली ।
    ©naimishawasthi

  • naimishawasthi 11w

    By unknown writer

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    हे टैगासुर शक्तियों!माफ़ कर दो अगर मुझसे कोई गलती हो गयी हो तो मत टैग करो इतना, असहाय सा हो गया हूँ। तुम पोस्ट करो लाइक की चिंता न करो, लाइक करना न करना जनता के हाथ में है। लाइक पाने के चक्कर में टैग करोगे तो कतई लाइक नही करूँगा।........

    जिनको मै फ़ॉलो करता हूँ उनके लिए नही है....कृपया अन्यथा न लें

  • naimishawasthi 11w

    क्या हुआ? क्यों लोग यूँ ही बौखलाये जा रहे हैं?
    हाँथ में माचिस लिए बस्ती जलाये जा रहे हैं।

    प्रश्न कोलाहल बने हल की किसे बोलो पड़ी है
    शक्ति की अनुरक्ति में सहमी हुई बेबस घड़ी है
    खून रिसता क्यों हवा से क्या जहर घोला गया है
    सभ्यताओं कौन सा ये पृष्ठ?क्यों खोला गया है
    कौन मद में लोक अंधा क्या भला माया बताओ
    ध्वज मनुजता के सहजता से झुकाये जा रहे हैं।

    बुझ गये अनुराग के सब दीप स्यामल तम घना सा
    क्यों न छंटता नफरतों का हो रहा गाढ़ा कुहासा
    दम्भ ने हर व्यक्ति की अभिव्यक्ति को बहरा किया है
    लोकमानस पर व्यथाओं का गहन पहरा किया है
    स्वार्थ ही प्रारब्ध लाखों युक्तियों के यंत्र लेकर
    लोग बेबस बौखलाए मुंह छिपाये जा रहे हैं।

    छद्म सारी श्रेष्ठताएँ भावनाएं मर चुकीं जब
    रिक्तियां निर्वात पाकर तुष्टि उर में भर चुकीं जब
    जब सघन नैराश्य के बादल घनेरे जा चुके हैं
    दृश्य कुछ वीभत्स मनुता पर उकेरे जा चुके हैं
    कालिखों में सब नहाए किंतु उजले चीर ओढ़े
    देव गंगा घाट से लौटे नहाये जा रहे हैं।

    सभ्यता यदि शीर्ष पर तो अब पतन निश्चित नियति है
    भ्रम, अछूते रह सकोगे यह सभी की नियत क्षति है
    यदि बदलना चाहते हो तो लचर व्यक्तित्व रोपो
    मत विमुख कर्त्तव्य से हो दोष औरों पर न थोपो
    कौन अनुगामी बनेगा या अकेले ही चलेंगे
    क्या प्रयोजन? दो कदम हमने बढ़ाये, जा रहे हैं।
    ©naimishawasthi

  • naimishawasthi 11w

    प्रेम प्रयोजन इस जीवन का बाकी सब दुनियादारी है।

    अस्त व्यस्त अलमस्त विश्व की खुशियों का आधार प्रेम है
    तूफानों से बनते उठते भावों का श्रृंगार प्रेम है
    प्रेम अँधेरे अंतर्मन में जली अलौकिक दीपशिखा है
    सत्यम शिवम सुन्दरम जैसी प्रतिछाया साकार प्रेम है
    मन नंदन कानन में पोषित प्रेम मनोरम फुलवारी है
    प्रेम प्रयोजन इस जीवन का बाकी सब दुनियादारी है।

    दो नींदों में अनुनादों का सपन संलयन सरल प्रेम है
    पूर्वजन्म के सद्कर्मों का पुन्यपुंज का सुफल प्रेम है
    प्रेम भटकते हुए पथिक को नियत ठाँव का मिल जाना है
    आशाओं की किरण देख मन सरु में खिलता कमल प्रेम है
    त्याग समर्पण का प्रतिदर्पण प्रेम नियति पर भी भारी है
    प्रेम प्रयोजन इस जीवन का बाकी सब दुनियादारी है।

    प्रेम रंग को राधा रानी उपवन उपवन छलकाती है
    विरह वेदना में मृतियों का आलिंगन कर मुस्काती है
    कहीं छूट जाता कहने को मोहन से सन्देश अगर तो
    पुनः जन्म ले मीरा बनकर राधा ही पीड़ा गाती है
    इसी लगन का नाम प्रेम है मान चुकी दुनिया सारी है
    प्रेम प्रयोजन इस जीवन का बाकी सब दुनियादारी है।
    ©naimishawasthi

  • naimishawasthi 11w

    शायद उसका बचकाना हो सकता है
    जो आशिक है परवाना हो सकता है।

    झूम रहा हूँ जबसे देखा है तुमने
    इन आँखों मे मयखाना हो सकता है।

    जिसको पढ़ कल लोग मोहब्बत सीखेंगे
    वो अपना भी अफसाना हो सकता है।

    अच्छा क्या है और बुरा क्या क्यों सोचें
    अपना अपना पैमाना हो सकता है।

    इश्कनवाजी और वो भी चौराहों पर?
    तौबा तौबा जुर्माना हो सकता है।

    दरवाजों पर दीप जलाकर रक्खे है
    संगदिल का वापस आना हो सकता है।

    मंज़िल का मिलना है यार नैमिष मुश्किल
    रस्ता जाना पहचाना हो सकता है।
    ©naimishawasthi