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  • nikhil331 1d

    हौसला

    कैसे ठहर जाऊँ अभी सितारों को ज़मीन पर लाना अभी बाकी है
    भटके हैँ कुछ साथी मेरे उन्हें राह दिखाना अभी बाकी है

    बादलों के गर्जन को रोकने की आजमाइश अभी बाकी है
    रिश्ते हैं कुछ उलझे मेरे उनको सुलझाना अब भी बाकी है

    रूकने का है इरादा नहीं क़ायनात फतेह करने की तलब अभी बाकी है
    है जो आक्रोश दबी दिल में उनको स्याही में निकालना अभी बाकी है


    यूँ थक कर बैठ जाऊँ हूँ इतना कमज़ोर कहाँ
    सीने में दबी आग को अभी शोला बनाना बाकी है


    चल रहा हूं रफ्तार में यादों के कुछ साये लिए
    उन यादों को यादगार बनाने की मरघुबियत अब भी बाकी है

    भक्त हूँ महादेव का यूँ डर कैसे जाऊँगा
    इस जहां से परे उस जहां में यूँ रुखसत होना अभी बाकी है
    ©nikhil331

  • nikhil331 1w

    रहनुमा

    बेबसी की ये अलामत आज तो तुम देख लो
    बन कर हमारा रहनुमा यूँ हमको तो समेट लो

    हमारी इन मुराद को यूँ ऐसे ना तुम टाल दो
    अपने इस खुल्द से नूर आज तुम निकाल दो

    है एतबार तुम पर अपना तो बेशुमार है
    इस महशर में भी तुम्हारा ही तो खुमार है

    मिथ्याओं से परे हो चुका अब कहाँ कोई ठहराव है
    गोद में उठाओ अब बस इसी की दरकार है


    है जल रही ज्योत असंख्य इस आपदा की बेला में
    नेत्र खोल तुम देख लो वो आग जो जल रही हमारे सीने में


    रुद्र हो तुम काल हो अलौकिक विकराल हो
    करुणा से शोभित हम सब का तुम ही तो उद्धार हो

    हो भोलेनाथ तुम शंकर तुम सब के पालनहार तुम
    बेसहारों का सहारा कमज़ोरों का ढाल तुम

    इन मासूमों की हिफाजत में एक अश्क तो तुम निकाल दो
    इन दहशत भरी रातों में थोड़ा तसकीन तुम दिखा दो
    ©nikhil331

  • nikhil331 1w

    ज़र्फ़

    चलो ढूंढें ख़ुद को इस आपदा की घरी में
    थोड़ा सा माद्दा दिखाएँ हम इस इक्कीसवीं सदी में

    बेज़ान सा बैठ गए क्यूँ भाई जान तो अब भी बाकी है
    शाम ही तो है सुबह होनी अब भी बाकी है

    अकेले ही तो आए थे फिर अकेले क्यूँ ना रह पा रहे
    इन कृत्रिम सहूलतों से परे इस ज़मीन से रुबरु क्यूँ ना हो पा रहे

    थोड़ा दम तुम धरो दम थोड़ा हम भी धरते हैं
    इस आकस्मिक आपदा से दो दो हाथ मिलकर ही करते हैं

    है ख़ुद में हौसला कितना आज ही तो हमें दिखाना है
    इस जंग को जीत अपना नाम इतिहास में दर्ज़ करना है


    इज़्तिरार क्यूँ दिखा रहे थोड़ा जोत अब भी जगाओ ना
    इस आज़ार में भी थोड़ा सा तो तुम मुस्कुराओ ना


    मालिक ने है जन्म दिया हमको वो यूँ तन्हा हमको कैसे छोड़ेगा
    यूँ ऐसे डरता देख हमको वो कैसे ना नेत्र खोलेगा

    थोड़ा उस पर भरोसा तुम भी तो दिखाओ ना
    इन आज़ाद परिन्दों की तरह फल़क पर तुम भी तो लहराओ ना!!
    ©nikhil331

  • nikhil331 3w

    अधूरी ख्वाहिश

    रह गई हमारी ख्वाहिश कुछ अधूरी सी
    भीगे पन्नों में दफन जज़्बातों की पहेली सी

    यूँ होता तो क्या होता कहने वाला नन्हा सा बच्चा था मैं
    बिना पूछे ही सब बताने वाला कैसा सच्चा था मैं

    वो आंखों के पानी में तैरते कितने अनकहे दास्ताँ थे
    हमारे अपनों के बीच कोई फासले ही कहाँ थे

    उन जुगनुओं को हाथों में क़ैद करने की ख्वाहिश कितनी बेहिसाब थी
    उन मदामी बारिशों में भीगने की चाह भी बड़ी बेबाक थी

    बस बहना और भागना ही तो नजर आता था हमें
    ग़लतियाँ कर कर बस माँ से लिपट जाना ही तो आता था हमें

    उन मासूम आँखों में जागे कितने से ख्वाब थे
    ठहरे होते थे होंठ मग़र दिलों में दबे कितने जज़्बात थे

    एक अधूरी सी ख्वाहिश थी मेरी उन कोमल परिन्दों को छूने की
    दो पल उनके साथ उन हसीन वादियों में बहने की

    यूँ देखते देखते वो अधूरे ख्वाहिश कैसे ख़ुद ही बेअसर हो गए
    ज़रा सी आँख लगी और हम यूँही कहीं मशगूल हो गए
    ©nikhil331

  • nikhil331 5w

    Talab

    क्यूँ हो रही आज कुछ तलब सी मुझे
    खुद को ढूँढने की थोड़ी कसक सी मुझे

    इस बेइंतहा भीड़ में भी क्यूँ मैं कहीं फुर्सत के पल खोज रहा,
    ईन खिलखिलाते बच्चों में मैं क्यूँ खुद को ही ढूंढ रहा


    ज़हनियत और खुदगर्जी़ की ये कैसी बिसात है
    खुद की ही लगायी आग में जले सारे ज़ज्बात हैं


    किस चीज़ की तिषणा है मुझमें
    खंगाल कर खुद को तो देख लिया
    बचपन से जवानी का सफर
    मैंने प्यासा ही तो व्यतीत किया

    अमीरों के रौब देखे,
    गरीबों को भी बिलखता देखा है
    बहनों की चीखें सुनी
    शहीदों को भी जलता देखा है

    धर्म और जात में बटते देश को मैंने देखा है
    फूल सी छोटी गुडिया को भी डर से बिलखते देखा है


    जीवन की इस व्यथा को चंद शब्दों में कैसे सजाऊं मैं
    इंसानियत को मरता देख इस आक्रोश को कहां दबाऊं मैं. .
    ©nikhil331

  • nikhil331 5w

    Talab

    Kyun Ho rahi aaj kuch talab si mujhe
    khud ko dhundne ki thodi kasak si mujhe

    Is beintehaan bheed Mein Bhi kyun main kahin fursat ke pal khoj raha,
    In khilkhilate bachchon Mein main kyun khud ko hi dhund raha


    Zehniyat aur khudgarzee ki ye kaisi bisaat hai
    Khud ki hi lagayi aag Mein jale sare jazbaat hain


    Kis chiz ki tishna hai mujmein
    Khangaal kar khud ko to dekh lia
    Bachpan se jawani ka safar
    maine pyasa hi to vyateet kiya

    Ameeron ke raub dekhe,
    Garibon ko bhi bilakhta dekha hai
    Behnon ki cheekhein suni
    Shaheedon ko bhi jalta dekha hai

    Dharm aur jaat Mein batte desh ko maine dekha hai
    Phool si choti gudiya ko bhi dar se bilkahte dekha hai


    Jeevan ki is vyatha ko Chand shabdon Mein kaise sajaun main
    Insaniyat ko marta dekh is aakrosh ko kahan dabaun main..
    ©nikhil331

  • nikhil331 10w

    माजी

    खो जाता हु अक्सर ये सोच कर की क्या जन्मों की भी कहानियाँ होती हैं

    देख कर परिंदों को सोचता हूँ क्या उनको भी इंसान बनने की थोड़ी सी चाह होती है

    यूँ ऊपर से नीचे आने की हसरत कोई कैसे कर सकता है
    वादियों में बहने वाला जीव भी क्या ज़मीन पर चलने की सलाहियत रख सकता है

    ना होता ऐसा तो क्यूँ एक परिंदा नीचे की ओर ग़मगिन सा देखता है
    खुद को घरों के उन दिवारों के नज़दीक क्यूँ वो छिपा लेता है


    बचपन में सुने वो नायाब किस्से क्या सच में ही होते हैं
    क्या इस जीवन पर्यंत संसार में कर्मों के फल सब के बंधे होते हैं

    फिर ये जान कर भी हम क्यूँ ये मगरूरियत दिखाते हैं
    ईन उड़ते परिंदों को देख भी क्यूँ ना हम इनसे सीख पाते हैं

    फल़क तक पहुंच कर भी हमें तन्हा ही रह जाना है
    अपने कर्मों का हिसाब यहां लौट कर ही चुकाना है..!!
    ©nikhil331

  • nikhil331 13w

    सब्र

    क्यों हो रहे सब फ़िराक़ मुझसे
    क्या हो गई अब खता मुझसे

    बस आपलोगों के लिए ही तो जीती हू
    अपमान भी चुप चाप ही सह लेती हूं

    हंसी में दर्द छिपा लेती हूँ
    कुछ चुभोते शब्द भी दिल में ही दबा लेती हूँ

    फिर भी आप दोष मुझी को देते हैं
    मेरे असीम सब्र की क्यूँ निरंतर इम्तेहान लेते हैं

    क्यूं मेरे मन को रोज आप दुखाते हो
    अपने तीखे शब्दों के बाण क्यूँ मुझ पर चलाते हो

    हूँ मैं भी एक माँ ये क्यूं ना आप देख पाते हो
    मुझे दुख पहुंचा कर आप चैन कहाँ से पाते हो

    मैं भी क्या औरों सी ही बन जाऊँ
    आपको यूँ तन्हा छोर क्या और कहीं बस जाऊँ

    क्या आप ये भी देख सकोगे
    इस उम्र में ये अलगाव क्या आप सह सकोगे

    जब ना था कोई पास आपके आपको मैंने ही तो सम्भाला था
    अपनी माँ का अक्स मैंने आपमे भी तो पाया था

    आज आप क्यूँ मुझे ही दोषी ठहराते हो
    बच्चों पर किया एहसान आप मुझे क्यूँ जताते हो

    मुझे तो ना बसने दिया मेरी बेटी को तो बस जाने दो
    अपनी माँ को टूटता देख उसको तो ना लड़खड़ाने दो

    अब वो ही है सहारा मेरा और मैं ही उसका सहारा हूं
    मेरी इस गुड़िया के लिए मुझको तो जिंदा रह जाने दो
    ©nikhil331

  • nikhil331 14w

    Aas

    Wo pani ka sailaab wo toofan ka taiz
    Wo dharti ki kampan wo baadlon ka garjan

    Wo rooh ko cheerti hawaon ka behna
    Wo zameen ki kagzat ka barish mein dahna

    Wo pasine se seechi faslon ka galna
    Wo pitajee ki aakhri chitthi ka haath se fisalna

    Aaj bhi yaad hai wo kali raat
    Dhara ki wo dehlati baat

    Pal bhar mein zindagi ka sab kuch chut sa gaya tha
    Maut ko samne dekh main dehal sa gaya tha

    Meri saansein ekdam se tez ho rahin thi
    Rooh sharir chorne ko aatur ho rahi thi


    Main bechain aur bebas sa ho gaya tha
    Apne aankhon ke samne khud ko ghuroob hota dekh raha tha


    Un baadlon ki bhi alag si hi tariq thi
    Shayad hum Sabon ki maut us din hi muqammil thi


    Fir bhi dil ke kisi kone me ek lau si jal gayi thi
    Kahin na kahin ek aas si jag gayi thi

    Sab khatam hota dekh bhi na jane dil kyun shant ho raha tha,
    Zindagi ke khare roop se shayad main parichit ho gaya tha


    Toot kar bhi na Tootunga ye ehsaas dil Mein jag rahi thi,
    Buddh ki wo baat zehan mein ghoom rahin thi


    Sambhal lunga main khud ko ye hausla aa gaya tha
    Dil ke andhere kone mein akhandit prakash chha gaya tha.
    ©nikhil331

  • nikhil331 14w

    .

    Khud ko hasi mein chipae rakhta hu

    Aag ko dil Mein dabae rakhta hu
    ©nikhil331