• aashishbhardwaj 30w

    मौत

    जिन्दगी कहां थी, गरीब की हथेली में ।

    मिट्टी से सने हाथ , छालों को भी छिपा लेते हैं ।

    उम्र बीत गई । एक बाप की । रंग सारे ।

    बनाने में उनकी हवेली में ।

    उस घर की छत आज भी कच्ची है ।

    जिसमें हम पांच लोग रहते हैं ।

    दिन भर कूड़ा बीन कर । पानी छान कर पीती है ।

    वो लड़की मेरी ।

    कुत्तों से खेलती है ठंडी हवाओं में ।

    वो भी दिखती है मेरी बेटी जैसी ।

    क्यूं खुदा तूने आदमी और आदमी में फर्क कर दिया ।

    कभी जात कभी अमीर गरीब का जीना ग़र्क कर दिया।

    मरी अमीर की तो कहते तिरंगे में लपेट दो ।

    गरीब की क्या । जैसे मर्जी नोच लो ।

    उनका मरना कहते इक खाली स्थान कर गया ।

    हमारी मौत भी कागजी । कहते बाहर ले जाओ ।

    इस लाश को । ये पूरा कब्रिस्तान भर गया ।


    ©aashishbhardwaj