• apurva_igotsar 23w

    प्रण

    ज़िन्दगी भर डरी बहुत थी वो
    पर आज बेख़ौफ़ लड़ी बहुत थी वो।

    जिस दिन मैं आयी थी उसकी कोख़ में
    एक प्रण लिया था मन ही मन उसने
    जिस नरक में जी रही थी बरसों से वो
    अब वहीं स्वर्ग को खींच कर लायेगी
    जहाँ अपनी हर ख़्वाहिश का गला घोंटा था उसने
    अब वहीं मेरे सपनों के ज्योत जलाएगी
    जहाँ आँसू पी-पीकर भी मुस्कुराया था उसने
    अब वहीं मेरे हर जज़्बात को पहचान दिलाएगी
    जहाँ "लड़कियाँ ऐसा नहीं करती" के ताने सुने थे उसने
    अब वहीं मुझमे पंख लगा मुझे उड़ना सिखाएगी
    और भी ना जाने क्या-क्या.....

    समाज ने कहा कि अभी अभी जो जन्मी है
    उस जान को देख दीवानी हो गयी है
    हमने भी तो लड़कियाँ पैदा की हैं
    तू कौन सी समाज की ठेकेदारनी हो गयी है?

    लड़के और लड़की का फ़र्क मत भूल
    मत भूल की लड़की को विदा हो नया घर बसाना है
    चूल्हा चौका नहीं आएगा तो कौन इसे ब्याहेगा
    या कहीं इसे जीवन भर मायके में तो ना बिठाना है?

    खूब इठलायीं थी वो औरतें अपनी "मंद बुद्धि" पर
    उस दिन तो माँ बस मुस्कुरा दी
    और अपने प्रण के और मजबूत होने के एहसास पर
    थोड़ा सा वो भी इतरा दी!

    बचपन बीता, जवानी आयी
    विदाई तो होनी ही थी पर
    बारात नहीं बस एक चिट्ठी आयी
    और शुरू हुआ मेरा कॉलेक्टरनी का सफ़र!

    .
    ..
    ...

    उसकी हर बेख़ौफ़ मुखौटे के पीछे के डर को आज बखूबी समझ रही हूँ मैं
    गोद में थामे अपनी नन्हीं सी परी को, माँ के उस प्रण को आज दोहरा रही हूँ मैं।
    ©apurva_r