• imsandeep 23w

    एक झूठ

    तनहाइयां लिए बैठा था अपनी,
    इस सोच में की_जाने वो कैसी होंगी!

    क्या वो अब भी याद करती होंगी हमको,
    जब कभी वो भी तन्हा होती होंगी!

    सपने देखे थे साथ जिनके हमने,
    क्या वो अब भी हसीन सपने देखती होंगी!

    चाहा तो बहुत था उन्हें हमने,
    या फिर शायद अपनी चाहत में ही कमी रही होगी!

    सोचा अब क्या खुदगर्ज हूं में,
    या यह भी उसकी ही खुदगर्जी रही होगी!

    खो जाता हूं आज भी उसकी यादों में इस कदर,
    क्या उसको भी हमारी कदर रहती होगी!

    फिर सोचा_कि पूछ लूं तुमसे,
    क्या प्यार न था तुमको हमसे!
    चलो मैं झूठा ही सही,
    अब एक झूठ और सही!
    कहता हूं तुमसे
    कि अब
    "प्यार नहीं हमको तुमसे"
    ©imsandeep