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    एक औरत की कहानी

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    एक औरत की कहानी

    लिबास तो वह उठा कर ढाँप लेगी तन को
    पर उसकी अंदर की अस्मिता जो लूट गयी
    उसको लाख ढाँप ले फिर भी कचोटती रहेगी उम्र भर
    देह को सुख देने के लिए देह को देह से उतार फेंका
    और उस गरिमा में लकीरें जो बाध्य थी टूट गयी
    फिर भी सुख के भोग की तृप्ति शून्य मात्र गिनी गयी
    अस्मिता को लाज आ गयी खुद को उतार गिराने में
    और कपड़ों ने मात्र बाहरी तन को दुनिया की नज़रों से बचा लिया
    और खुद की निगाह में एक सवाल की जगह पर ला खड़ा किया
    तृप्त करने के लिए मैं क्या साधन या समय मात्र हूँ?
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