• writerrai 23w

    © writerRai

    खुद से नदारद औरों में खोजने लगते हैं ।।
    यूं ही बेवजह जिंदगी की पन्ने पलटने लगते हैं ।।

    आकर आईने के सामने चेहरा निहारने लगते हैं ।।
    मुखौटे के पीछे अपनी नियत छिपाने लगते हैं ।।

    बंद कमरे में अक्सर खुद को तलाशने लगते हैं ।।
    भीड़ में अपनी पहचान ढूंढ़ने लगते हैं ।।

    जिंदगी के रंगमंच पर अभीनय दिखाने लगते हैं ।।
    बिन समझें जिवन पटकथा किरदार निभाने ‌लगते हैं ।।

    इंसान हैं हम मिट्टी के पुतले नए ढांचे में ढलने लगते हैं ।।
    नश्वर होकर भी हम खुद को अविनाशी कहने लगते हैं ।।

    @लेखकRai