• shivam_raturi 23w

    विभाग और देश हित के लिए हमारे वेतन के अनुरूप है या नहीं। परंतु अगर वेतन में थोड़ी सी भी विसंगति इन द्वारा पाई जाती है, तो इनके संघ सरकार के कानों तक यह पहुँचाने के लिए धरना करने में थोड़ी सी भी कोताही नहीं बरतते। क्या वेतन के अनुसार ही आउटपुट देना हमारा धर्म नहीं बनता है? आउटपुट तो बहुत दूर की कौड़ी है, अगर हम समय पर कार्यालयों में आ ही जायें, तो यह भी किसी आउटपुट से कमतर नहीं होगा। किसी भी निजी संस्था के आउटपुट की तुलना अगर हम सरकारी संस्था से कर लें, तो वह निश्चित ही ज्यादा निकलेगा। क्या यह इसलिए है, कि हमें डंडे की चोट पे काम करने की आदत पड़ गयी है? क्या हमारे मूल्य इतने क्षीण हो चुके हैं, कि हम यह सब देखते हुए भी अनदेखा कर रहे हैं? इन सब चीजों के बावजूद कुछ पब्लिक डीलिंग वाले विभागों में तो इन शिष्ट लोगों की अति-शिष्टता देखी गयी है। इनके घमंड से यो इंद्र देव भी चकित हो उठते हैं।
    कई प्रकार की चर्चाएं इस मसले पर विभिन्न लोगों से मेरी हुई। कई विभिन्न प्रकार के जवाब मुझे प्राप्त हुए।