• drajaysharmayayaver 22w

    @trickypost
    पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी की यह रचना सोहर छ्न्दों में है और भगवान श्रीराम के विवाह के अवसर के नहछू का वर्णन करती है। नहछू मुख्य रूप से नाखून काटने एक रीति है, जो पूर्वी भारत में विवाह और यज्ञोपवीत के पूर्व की जाती है। यह विशेष रूप से नाई या नाइन व अन्य सम्बन्धित स्त्रियों के नेगचार से सम्बन्धित होती है। तुलसीदास की 'रामलला नहछू' रचना अवधी भाषा में है और सरल स्त्री लोकगीतोपयोगी शैली में प्रस्तुत की गयी है।

    'श्रीरामलला नहछू
    नाउनि अति गुनखानि तौ बेगि बोलाई हो।
    करि सिँगार अति लोन तो बिहसति आई हो।।
    कनक-चुनिन सों लसित नहरनी लिये कर हो।
    आनँद हिय न समाइ देखि रामहि बर हो ।।१०।।
    (परम् गुणी नाइन को तत्काल बुलाया गया, अत्यंत मोहक श्रृंगार किए हुए हँसती हुई आई। सुनहरी चुनरी ओढ़े, हाथ में नहन्नी लिए नाइन प्रभु को देखकर इतनी आनन्दित है कि वह फूली नहीं समा रही।)

    काने कनक तरीवन, बेसरि सोहइ हो।
    गजमुकुता कर हार कंठमनि मोहइ हो।।
    कर कंचन, कटि किंकिन, नूपुर बाजइ हो।
    रानी कै दीन्हीं सारी तौ अधिक बिराजइ हो ।।११।।
    (नाइन के कान में स्वर्ण कर्णफूल, नाक में बेसरि सुशोभित हैं, गजमोतियों के हार से सजा उसका मणि तुल्य कण्ठ मोहक है। हाथों में स्वर्ण कंगन, कमर में करधनी और पाँवों में घुंघुरू बज रहे हैं तथा महारानी द्वारा प्रदान की गई साड़ी उस पर बहुत सुंदर लग रही है।)

    Read More

    सरलार्थ
    १०,११


    ©drajaysharma_yayaver