• monikakapur 6w

    वाह समाज के दोहरे मानक
    नवरात्रों में देवी का पूजन करते हैं
    फिर नारी, जो देवी का है प्रतिबिम्ब
    इसका शोषण करते हैं ।
    जो गर्भ में मारी जाती
    क्या वो दुर्गा का रूप नहीं?
    जो जन्म तक ले नहीं पाती
    क्या वो देवी का स्वरूप नहीं ?
    जहां द्रौपदी रोज़ है मिलती
    जिस के वस्त्र रोज़ हैं छिनते
    क्या इस महान समाज को
    उस में देवी के दर्शन नहीं मिलते ?
    अपने पुरुषत्व का लोहा मनवाने
    जब उस के मुँह अपने हाथों की छाप छोड़ते
    कैसे फिर जा कर मंदिर वो
    माँ की प्रतिमा समक्ष हाथ जोड़ते
    है ये कैसी व्यथा, कैसे पहेली
    जाने कब इसको बूझ सकें
    कौन समाज दे इसका उत्तर
    किस से हम ये पूछ सकें
    बस इतना करना है हम को
    नारी को सशक्त बनाना है
    दुर्गा है वो बलशालिनी है
    ये तथ्य उसे समझाना है
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