• rahulsingh17 22w

    तुम

    समंदर की उन लेहरो की तरह ज़िन्दगी में आई तुम।
    किनारे की रेत की तरह मेरी रूह में समाई तुम।
    बादलों की उन घटाओं की तरह मेरे अंधेरों पर छाई तुम।
    उलझनें भी ना रोक पाई मेरी, यूं जो तूफ़ान की तरह आई तुम।
    मेरे अंधेरों को अपना बना कर, ये अपनी रोशनी क्यों दे गईं।
    रोशनी से तो हमारी दुश्मनी पुरानी है, उसे फिर कभी सुनाएंगे वो अलग एक कहानी है।

    ©rahulsingh17