• _jiya_ 18w

    आज सुबह से ही एक अटपटि उलझन में हूँ,
    कभी उसे याद करती हूँ, तो कभी तुम्हें,
    हालांकी वो मेरा अतीत था, और तुम मेरा भविष्य हो,
    और दोनों ही कोसों दूर हैं, पर बिल्कुल पास।
    तुम तो जानते हो उसे, मिल चुके हो उससे पहले,
    मेरी भाषा में, मेरी कविताओं में, मेरे उस बन्द पड़े दिल के दराज़ में।
    तो कैसा है वोह? ठीक? क्या अब भी तुम्हें मेरी पसंद, पसंद है?
    हाँ जानती हूँ की तुम जानते हो मेरे उस 'कल' को,
    जिसे मैं खुद नहीं जानती, या शायद जानना ही नहीं चाहती।
    समझ पा रहे हो ना मेरी उलझन, की ज़िंदगी के ये कैसे मोढ़ पर आकर मेरे कदम ठिठक रहे हैं,
    तुम्हें मैं अपना भविष्य मानती हूँ क्यूँकी एक तुम हो,
    जो जानता है की मेरा अतीत क्या था और तुम फिर भी मुझे चाहते हो, मुझसे ज़्यादा; उससे ज़्यादा,
    और एक मैं हूँ, जो तुम्हें बस ये बताने में लगी हूँ की किस तरह 'कल' भुलाया नहीं जाता!
    की किस तरह, हर बार; हर एक बार आपका एक हिस्सा ना- चाहते हुए भी वहाँ छूट ही जाता है।

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    क्या कभी 'कल' भुलाया जा सकता है?
    (Caption)
    ©_jiya_