• krishn_ratii 20w

    अष्टावक्र गीता से प्रेरित ������
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    स्वप्न

    एक रात्रि राजा जनक ने स्वप्न देखा विचित्र सा,
    हो गया हूँ भिखारी, खा रहा श्वान के हिस्से का,
    अचंभित हो स्वप्न से निद्रा उनकी खुल गई,
    पाया खुद को महल में, मन में जिज्ञासा जग गई,

    कौन सा तथ्य असत्य है -
    मैं राजा हूँ कि वो रंक सत्य है??
    निवृत्त हो क्रियाकलापों से,
    राजसभा को प्रस्थान किया,
    बैठे हुऐ थे मुनि अष्टावक्र वहां,
    उन्हें साष्टांग प्रणाम किया,
    कह सुनाया स्वप्न जो रात्रि पहर में देखा था,
    सत्य और असत्य का जो भेद मन में उपजा था,
    प्रश्न ये गूढ़ था, जिज्ञासा से परिपूर्ण था,
    आन्नद हुआ मुनि को राजा जानने को उत्कूण था ,

    उत्तर में प्रश्न के बस एक बात मुनि ने कही -

    *जो देखा वो भी स्वप्न , जो अब दिख रहा वो भी स्वप्न ,
    ना ये सच ना वो सच, बस खुली और बंद आँखों का भरम,
    सत्य तो केवल साक्षी है जो दोनों को है जानता,
    जागृत(बिना नींद) हो, सुष्पत्ति(गहरी नींद) हो, हो स्वप्न(नींद में दिखने वाले दृश्य) सबको निहारता,
    कह लो उसे दृष्टा या जान उसे आत्मा लो,
    शरीर में बैठ कर हर खेल वो है देखता*

    पाकर उत्तर ज्ञान प्रेम पूर्ण,
    राजा को आनंद की अनुभूति हुई,
    संसार भी एक स्वप्न है इस बात की पुष्टि हुई,
    मिथ्या लगा उन्हें यूं मन माने,
    सुख और दुःख में झूलना,
    जान गऐ कि मृत्यु शैय्या पर लेट कर,
    सब कुछ पड़ेगा भूलना!!!!

    IG।mirakee। ©krishn_ratii(रोली मिश्रा)