• msr_prose 14w

    सुशांत....!

    ये आसमां भी कितना नाजुक हो गया है,
    इमरोज़ एक चमकदार सितारा तोड़ देता है।
    कभी बहा देता है कायनात को सैलाब-ए-केदारनाथ में,
    तो कभी दिल को छिछोरे ख्यालों से जोड़ देता है।

    कोई पोंछे तो, पोंछे कैसे इन अश्कों को,
    पलकों के मकम्मले शॉल पर ये कैसे जम गए हैं।
    राबता रहता था ख़ुद से जिन सांसो के दर्मियां,
    ग़म-ओ-हसीं के ताकतवर लम्हें, न जाने
    किस इंतज़ार में थम गए हैं।

    ये कैसा अचम्भित दौर है,
    हर एक पल विक्रांत हो गया।
    जिस तूफ़ान को देख लगा लेते थे,
    अंदाज़ा अपने मनोरंजन का
    वो सख्स भी आज शांत हो गया।
    ©msr_prose