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    स्वप्न की बात
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    सन्दर्भ - यह कविता कोरियाई
    प्रायद्वीप में अमेरिका और चीन के सीधे युद्ध हस्तक्षेपों के बीच उभरते मानवीय संकटों पर लिखी गई है ।
    आज सिंगापुर मेंअमरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व उत्तर कोरियाई राष्ट्रपति किम जोंग के बीच हुए परमाणु हथियार समझते के बाद प्रासंगिक लगा अतः आप के समक्ष अवलोकनाथॆ व समीक्षाधीन, ,,,,!

    स्वप्न कभी कविता नही हो सकता
    और कल्पना कभी हकीकत ।
    फिर
    यह खौफनाक स्वप्न
    न चाह कर भी लिखना,
    तृतीय विश्व -युद्ध की भूमिका
    कागज पर तय करना,
    महासागरों एवं महाद्वीपों के मध्य
    नीले आकाश में
    खून के छीटों से
    इन्द्रधनुषी बृत बनना,
    परमाणु ऊर्जा की रोशनी में
    अंधे से पूछना
    बहरे से कहना
    क्या देश सुन रहे हो, ,,,,?

    स्वप्न में
    एक के बाद एक लगातार
    जलते हुए शहर को देखकर
    मुर्दों के बीच
    अपने आप को लेकर
    बेचैन मन,
    दहशत में हदस जाता है ।

    तब
    स्वप्न, ,,,
    कल्पना, ,,,,
    कविता, ,,,,,
    विस्तर की चादर को दुनिया का
    मानचित्र समझकर
    अपने स्वप्नदोष को
    छुपाने का असफल प्रयास करता है ।
    और धीर से कहता है -
    "स्वप्न कभी कविता नहीं हो सकता, ,,,,!"

    @अरूण कुमार केशरी

    (मेरी कविता संग्रह "चीख" से,प्रकाशीत-1989)
    ©arun_kumar_keshari