• shubhangdimri 23w

    यादों के दरिया में मन डूबे जाता था,
    अंबर पे वो मेघ जब जब शोर मचाता था।
    मन ये हर्षित हो जाता था,
    कि जब जब सावन आता था।

    सौंधी सी इक खुश्बू उठती,
    गीत पपीहे गाते थे।
    छोटा सा इक ताल भी होता,
    कागज़ के नाव उतारे जाते थे।

    दीवारों पे सीलन आती,
    मेंढक टरटराते थे।
    गीली होती रेत से
    अक्सर महल बनाए जाते थे।

    पेड़ों पे हरियाली होती,
    पंछी चहचहाते थे।
    गाँव के उन खेतों में,
    ख़रीफ़ लहलहाते थे।

    बारिश और रूमानी होती,
    जब जोड़े साथ में आते थे।
    इश्क़ फिज़ा में घुलता था,
    हम गगन तले सो जाते थे।

    सड़कों में गड्ढ़े पड़ जाते,
    पानी में छप छप करते थे।
    बचपन की उस बारिश में,
    हम जी भर के भीगा करते थे।

    यादों के दरिया में मन डूबे जाता था,
    अंबर पे वो मेघ जब जब शोर मचाता था।
    मन ये हर्षित हो जाता था,
    कि जब जब सावन आता था।

    -'शुभी'

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    मन ये हर्षित हो जाता था,
    कि जब जब सावन आता था।

    (पूरी कविता अनुशीर्षक में)

    ©शुभी