• kasanshima 23w

    है! 

    वो शक़स रास्ते में यूँ छूट है गया 
    मैं अक्स हूँ उसका, यह अक्स कुछ टूट है गया
    किनारा दिया जिसने अब वो किनारे हुआ है
    कुछ कर के बेसहारा , वो उसके सहारे हुआ है.

    आदत नहीं थी उसके सोहबत की तो फिर क्यों
    आदत नहीं थी उसके सोहबत की तो फिर क्यों
    खाली सा ...अब अकेलापन सिकोड़ता है क्यों

    न जनत थी उसके पाऊँ में 
    न ढेर्रा था खुशियों का भी
    फिर क्यों आहट ढूंढ़ता हूँ
    फर्श पर उसके पैरों की दब्बी दब्बी

    सूखा फीका साया बन गया था वो
    मन रह गया था सुना
    सिर्फ काया बन गया था वो


    फिर हुआ,,,,
    अगन से गगन तक का सफर
    देह की थी रात, अस्थियों की हुई सेहेर

    चल मुझे इतना पता है अब तू फिर मुस्कुराएगा 
    जो मैं न देसका ,सब वहाँ मिल जाएगा 

    तेरा हमसफ़र भी तो बैठा होगा
    तेरे आलिंगन की आस में 
    मैं हर चेहरे को बुझूंगा अब 
    तेरी दब्बी दब्बी सी तलाश में


    तेरा कमरा तेरे जाने पर भी खाली नहीं है 
    अब मेरी ज़बान पे चिड़चिड़े पन से निकली गाली नहीं है
    बैठ ता हूँ यहां अब मैं अक्सर तेरी सोहबत की तलाश में 
    जीता हूँ तुझे हार कर
    तेरे होने के एहसास में 
    ©kasanshima