• pragatisheel_sadhak_bihari 23w

    ग़ज़ल

    खताएँ हजार हुई होंगी, पर राज कोई बाकी न रहा इस सीने में,
    जो किया वो आप जान गए...नाराजगी रुकी नहीं इस सीने में!

    कसम खुदा की......मन उदास तो आज भी है पाये उपहासों से,
    जब भस्म की वो सारी यादें,दिल अब शकी रहा न इस सीने में!

    मुश्किलें हजार हैं खुद के जीवन में......उसे मिटाने का यत्न हो,
    क्या मिलेगा कर के बैर...उसकी अब रही न झाँकी इस सीने में!

    कुछ कारण बेहद महरूम रखा है,इंसानों को मैं भी जीतूँ प्रेम से,
    जब वो भगवान नहीं.....तभी शैतान रूप न बाकी इस सीने में!

    मोहब्बत किस काम की जब कपट का उसमें होता छिपा ताज,
    फिर भी बैर भूल जाऊँ,प्रेम खुदा....लिये एकाकी इस सीने में।

    राहतों के फ़िराक लिये......मैं घूमता नहीं कभी यहाँ कभी वहाँ,
    उपहास से बड़ी ताकत...कभी जो मैंने आँकी नहीं इस सीने में।

    जंग के लिये किसी और को तलाशो...मैं उतना ताकतवर नहीं,
    जब तक मैं कमजोर.....तब तक वर्दी खाकी नहीं इस सीने में।

    ©gatisheel_sadhak_bihari