• pragatisheel_sadhak_bihari 35w

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    जब आँखें खुली तब "माँ" सामने...ममत्व मुझे थमाने को
    जब मुख खोला तब "माँ" सामने.......स्तनपान कराने को

    रोना तब मैं शुरू किया.....जब माँ कहती थी दूर जाने को
    हँसकर मैं स्पंदन करता...उसके उंगलियाँ तब में पाने को

    था अनभिज्ञ होश.....परे जोश से,फिर भी चेतना बुरी नहीं
    आज संभाला होश खुद से जब...जीता बस अहं खाने को

    वात्सल्य जीवन,एक सुखदएहसास...अब कहाँ है वो बात
    भटकता माँ के आँचल बिन...सिर्फ वहम अब मैं पीने को

    गैर करुण चीखें गुजरती कानों से...बहरे से हम हो जीते हैं
    क्योंकि सकून बुलाता हमारा सीना,बड़ा तब बन जाने को

    सफ़र रंग तब फीका दिखता.........चंद पसीनों के बूंदों से
    तभी फ़रेब हम जीने लगते.......विश्व विजेता बन जाने को

    "साधक" मिल जो जाती तमाम खुशियाँ,घर बैठे सिर्फ रोने से
    फिर क्यों तुम राहों में रोते,नित्यदिन खुद से ही मिल जाने को

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    माँ

    ©gatisheel_sadhak_bihari