• the_fictional_semantics_ 23w

    आखिरी बार

    वो जिस्म का भूखा मोहब्बत के लिबास में मिला था
    पहचानती कैसे उसे चेहरे पे चेहरा लगाकर मिला था

    क्या पता था दर्द उम्र भर का देगा
    वो दरिँदा बहुत मासूम बनकर मिला था

    पहली मुलाकात में ही दिल में उतार गया था
    वो मुझे पूरी तैयारी के साथ मिला था

    देखते ही देखते वो मेरा हमराज़ बन गया
    कि हर दफा मुझे वो यकीन बनकर मिला था

    मॉं बाप से छिपकर उससे मिलने लगी थी
    वो मुझे मेरा इश्क जो बनकर मिला था

    हल्की सी मुस्कान लेकर मुझे वो छूता रहता था
    वो हवसी मेरी हवस जगाने की कोशिश भी करता था

    वक्त के साथ उसके इश्क का नशा मेरे सिर चढने लगा था
    मेरा भी जिस्म उसके जिस्म से मिलने को तरसने लगा था

    मुझे इश्क के नशे में देख मेरे जिस्म के वस्त्र को अलग किया था
    जिस काम के वो तलाश में था उसे वो काम करने का मौका मिला था

    टूट पड़ा था वो मुझपर, हवस मे दर्द की सारी हद पार कर गया था
    उस रात वो पहली बार चेहरा उतार अपने असली रंग में मिला था

    हवस मिटा के अपनी उसने मुझे जमीन पे गिराया था
    दिल की रानी कहता था जो उसने तवायफ कह बुलाया था

    मोहब्बत उसे थी ही नहीं जिस्म को पाने के लिए उसने नाटक किया था
    मेरे प्यार मेरी मासूमियत के साथ खेल खेला था

    फिर मुझे छोड़ पता नहीं कहाँ चला गया
    मोहब्बत की आड़ में शायद किसी और को तवायफ बनाने गया था

    कितना वक्त गुजर गया जख्म रूह के अभी हरे हैं
    सोचती हूं मोहब्बत की राह में क्यों इतनें धोखें हैं
    हर मोड़ पर क्यों खड़े जिस्मों के आशिक हैं

    खुद को किसी को सोपने से पहले थोड़ा सोच लेना
    कहीं वो शिकारी जिस्मों का तो नहीं थोड़ी जांच कर लेना

    अब कभी खुद को तो कभी मोहब्बत तो कभी उसको कोसती हूं
    हे किस्मत तेरा मुझसे क्या गिला था
    जो वो आखिरी बार मुझे बिस्तर पर मिला था.......

    ©the_fictional_semantics_