• nehapriyadarshini 30w

    ये रात के सन्नाटे इतना शोर क्यों करते हैं
    मैने तो कभी नही कहा कि
    सारे जुगनुओं के पंख जल गए हैं
    पूर्णिमा की रात ही चंद्र
    राहु द्वारा ग्रासित हो चुका है
    मैने कभी ये भी नही कहा कि रजनीगंधा
    के फूलों पर सर्प ने आना छोड़ दिया
    या उसकी सुगंध कहीं खो गयी।।।

    मैने कभी ये भी नही कहा कि
    पूरे जंगल को आग लग गयी
    सारे जानवर मर गए या पंछी भाग गए
    दरख्त अपने अस्तित्व से जूझ रहा है
    या जंगल मे अब केवल ठंडी राख बची है
    जिसके नीचे हो सकता है अंगारे हो
    फिर क्यों ये जंगल मुझपर हँसता है???

    मैंने कभी नही कहा कि
    पर्वत से अब झड़ने नही फूटेंगे
    या पंछी अब सरहद पार नही जाएंगे
    भवँर को पुष्प से प्रेम नही होगा और
    कोई मोर मेघ को नही बुलायेगा
    आकाश के माथे की बिंदी किसी ने छीन ली
    अब वो विधवा की भांति हो गया
    फिर क्यों दसो दिशाए मुझसे ईर्ष्या रखती है???

    लेकिन तनिक ठहरो !!
    यही हुआ था न सच बोलना
    फूलो से लदा वसंत झुलस गया था
    नदिया सुख गयी थी
    प्यास से पंछी मारे गए थे
    पूरी धरा लाशो का ढेर बन गयी थी
    चील अघा चुके थे खा खा कर
    सच बोलना यही हुआ था न
    जब तुमने कलाम लिखा था
    कलम इसी के बाद उठी थी न।।।

    ©प्रियदर्शिनी शाण्डिल्य

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    मैंने ये नही कहा


    ©प्रियदर्शिनी शाण्डिल्य
    ©nehapriyadarshini