• sarimyusuf 6w

    फँसाना

    रोज़ वही फ़िज़ा, वही फँसाना है,
    रोज़ चलना है, रोज़ थक जाना है,
    वो दौर कबका बीत गया,
    तू क्यों अब तक बचपन का दीवाना है।
    मंज़िल पे ले आयी ज़िंदगी, पता नहीं अब कहा जाना है,
    दरियाँ से गहरी है यें, अभी इसने और समाना है,
    कहानियों से अब बात नहीं बनती,
    अब रोज़ थक के सो जाना है,
    इसी का नाम है ज़िंदगी, इसका यही फँसाना है।

    ©sarimyusuf