• vivek6563 5w

    मै सांसों से ज़हर लेता हूं रोज़
    मै परिंदा हूं हैरान हो ना अब तक कैसे ज़िंदा हूं?

    तुम्हारी तो कहीं ना कहीं कुछ गलतियां रही है
    हम भुगत तुम्हारी गलतियां रहे हैं

    तुम आवाज़ उठाओ शायद वो सुन लेंगे
    तुम्हारी नहीं तो तुम्हारे वोट की सुनेगे

    हम बोल लिख पाते तो कोर्ट में एक रिट हम भी लगाते
    ठीक है वो जी लेंगे जैसे तैसे जिनका घर है
    वो कैसे ज़िंदा रहेंगे जो बेघर है
    मै परिंदा हूं आज बड़ा शर्मिंदा हूं !
    ©vivek6563