• geetabhardwaj 5w

    चिट्ठियों का दौर भी क्या दौर रहा
    कि आंखे इंतज़ार में हुआ करती थी
    पोस्टमैन की घण्टी बजते ही
    मन मे सारे ख़्वाब बन जाया करते थे
    कुछ तंगी की बातें , कुछ यूं ही हाल चाल
    और लिखे अक्षरों पे हाथ फेरते मानो
    गले लगे हों चूड़ियों की खन खन ,
    कुछ गाँव के किस्से कुछ मतलबी बातें
    कुछ उम्मीदें कुछ इंतज़ार
    चिट्ठियों का दौर भी क्या दौर रहा
    कि आंखे इंतज़ार में हुआ करती थी
    कि आंखे इंतज़ार में हुआ करती थी
    ©geetabhardwaj