• anika_vashisth 47w

    अरसा

    एक अरसा सा होगया था
    बेवजह मुस्कुराए हुए
    बिना कुछ सोचे, बस यूंही खिलखिलाए हुए
    वक्त की चिंता किए बिना बतियाए हुए
    यूंही उन्न किस्से कहानियों को दोहराएं हुए
    दोबारा उन्ही गलियों की खिड़कियों से गुजरे हुए
    कुछ अंजान चेहरों के बीच अपनों को गले लगाए हुए
    और दरबदर बदलते पन्नों के बीच,
    सुकून के चंद पलों को चुराए हुए
    एक अरसा सा होगया था
    जिंदगी की गाड़ी को रोक के,
    उसी किनारे चाए का लुत्फ उठाएं हुए
    दुनिया को भूल के अपनी ही दुनिया बनाए हुए
    उन्ही रास्तों पर बेसुरे वो ही गीत गाए हुए
    अपने अंदर के तूफ़ान को सहलाके
    सुलाए हुए
    एक अरसा सा होगया था
    उस बचपने को अपनाए हुए
    एक गर्म दोपहरी मै उसी पेड़ की
    छाव मै आए हुए
    समेटी हुई यादों को फिर्से जीये हुए
    दिल से दिल की बात किए हुए
    जज्बातों को शब्दों में आज़ाद किए हुए
    एक अरसा सा ही लगता है
    तुझे कविता मै पिरोए हुए।












    ©anika_vashisth