• chhagan_kumawat_laadla 24w

    जिन्दगी

    चलते चलते यकायक रुक गया । पीछे मुड़कर देखा । लगा कि कोई है जो मुझे पुकार रहा है कि रुक जाओ, थोड़ा अहिस्ता से चलो , मुझे भी साथ आना है । नाहक ही क्यों भागे जा रहे हो ? आवाज़ थकी मालूम होती है मगर हारी हुई नहीं ।
    तभी किसी ने दयनीय नजरों से देखते हुए कहा कि चल अभी मंजिल दूर है ।
    चलने लगा । फिर से उसी आवाज़ का अहसास हुआ । तुम्हें जाना है तो जाओ ।
    जल्दी से मंजिल पा लोगे तो फिर वहाँ इन्तजार करना होगा ,,,, मेरे आने तक ।
    वहाँ तुम्हें तन्हाई सतायेगी तब तुम अपने बाल नोचोगे , खुद को कोसोगे लेकिन पश्चाताप के सिवाय कुछ ना कर पाओगे ।
    ठहर के पीछे देखा तो दूर मोड़ से जिन्दगी; उल्लास, उमंग, आनन्द को लिए हाँफते हुए आ रही है ।
    वो जिन्दगी जो तब छूट गईं थी जब मैं इन भौतिक यंत्रों पर सवार होकर,,, भौतिक साधनों के पीछे भागा जा रहा था ।
    राहो की खुबसूरती को नजरअंदाज कर अनदेखी मंजिल के ख्यालों में खुद को भुलाए जा रहा था ।

    - छगन चहेता ©
    ©chhagan_chaheta