• msr_prose 11w

    आज कुछ..

    आज सुलझ गई है ज़िन्दगी थोड़ी सी,
    अब थोड़ा दानिस्ता हो, चैन कमाते हैं।
    बहुत आजमाइश की है, वक़्त ने हमारी ज़िन्दगी से,
    अब ज़िन्दगी को जन्नत बना, वक़्त को आजमाते हैं।

    यूं तो न बुलंद होंगे हौसले, इस जहां में, आज अपने
    कद को इमारत बना आसमान को अपनी ऊंचाई दिखाते हैं।
    मायूसी के बादल बन, सिकुड़ गए थे जो लब हमारे,
    आज उन्हीं लबों पर मुस्कुराहट का लिबास सजाते हैं।

    वर्षों पहले अधूरा रह गया था जो क़िस्सा हमारा,
    आज उसी कहानी को इब्तिदा कर तमाशा बनाते हैं।
    कुछ तुम अपने हुनर को परखना, कुछ नवाजिशे मैं दिखाऊंगा,
    जिस मंज़र की दीवानी है ये दुनियां, दोनों मिल के वो किरदार निभाते हैं।

    अब बस मन भर गया है मेरा सितारों को देख के,
    जो चाहते है हमें सबसे ज्यादा, आज उनसे चांद मंगाते है।
    जलने की आदत हो गई है मुझे इज़्तिराब में युंकी,
    आज अपनी खिड़की पे एक सूरज और लगाते हैं।
    ©msr_prose