• vansh_maurya_prince 11w

    तनहाई

    हर रोज़ तुम्हारी यादों को मैं छुपकर देखा करता था।।
    हूँ काबिल जिस बन जाओ तुम बस प्यार तुम्ही से करता हूँ।।
    एक रात मेरे सपनें में हर बातें तेरी आयी थी।।
    तू बैठी थी गर पास मेरे फिर क्यूं ऎसी तनहाई थी।।

    क्या तेरी बातों में कोई मैंने ऐसा खेल रचाया था ।।
    नज़दीक मेरे तू थी फिर भी गैरो सा तूने जताया था।।
    क्या भूल गए हो तुम...........
    क्या भूल गए हो तुम...........

    मेरे ख़ातिर मेरी यादों मेरे लम्हों में जीते थे।।
    जितनी भी है यादें गई वो लम्हे संग ही बीते थे।।
    परिलक्ष हुआ आभाष हुआ इस मधुर जाल की माया में।।
    फ़ुलवारी मेरी सूखी है तेरी हर काल निकाया में ।।
    हूँ भूल गया स्तब्ध रहा इतने दिन बाद ये पीड़ा आयी है ।।
    तू बैठी थी गर पास मेरे तो फिर क्यों ऐसी तनहाई है।।
    ©vansh_maurya_prince