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    विजयादशमी

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    विजयादशमी

    विजयादशमी विजय का, पावन है त्यौहार।
    जीत हो गयी सत्य की, झूठ गया है हार।।
    रावण के जब बढ़ गये, भू पर अत्याचार।
    लंका में जाकर उसे, दिया राम ने मार।।
    विजयादशमी ने दिया, हम सबको उपहार।
    अच्छाई के सामने, गयी बुराई हार।।
    मनसा-वाता-कर्मणा, सत्य रहे भरपूर।
    नेक नीति हो साथ में, बाधाएँ हों दूर।।
    पुतलों के ही दहन का, बढ़ने लगा रिवाज।
    मन का रावण आज तक, जला न सका समाज।।
    राम-कृष्ण के नाम धर, करते गन्दे काम।
    नवयुग में तो राम का, हुआ नाम बदनाम।।
    आज धर्म की ओट में, होता पापाचार।
    साधू-सन्यासी करें, बढ़-चढ़ कर व्यापार।।
    आज भोग में लिप्त हैं, योगी और महन्त।
    भोली जनता को यहाँ, भरमाते हैं सन्त।।
    जब पहुँचे मझधार में, टूट गयी पतवार।
    कैसे देश-समाज का, होगा बेड़ा पार।।
    ✍❤️
    ©its_lucifer_03