• trickypost 22w

    तू गलत मै हूँ सही,बहीखाता अकसर यह कहता है।
    इसका असर अब हर किसी के जेहन में दिखता है।

    यह हमारी कविता नही हमारी सोच है जिसे हम साँझा कर रहे है। अगर अच्छा लगे तो repost ��कर देना और बुरा लगे तो comment box �� का उपयोग कर लेना।

    इस दुनियाँ में कुछ भी सही या गलत नही है, फर्क सिर्फ़ सोच का है जो गलत और सही का फ़र्क कराती है।।
    अगर गुनाह करना जुर्म है तो हमे लगता है कि, इस जहाँ में ना राम पाक है ना अल्लाह।।
    क्योंकि गुनाह तो राम ने भी माता सीता की परीक्षा लेकर की थी औऱ गुनाह माता सीता ने उस परीक्षा को देकर की थी।
    अगर माता सीता ने परीक्षा ना दी होती तो इस भारतवर्ष की भूमि पर कोई नारी सती ना होती और ना ही उसे अपनी लाज और हया की दुर्गति का प्रमाण देना पड़ता।

    अगर गुनाह कृष्ण ने ना किया होता तो कभी सत्ता और मन की कपट धर्मयुध्द नही कहलाती। कभी कोई भाई-भाई का खून नही करता। हिन्दू समाज मे दासियों की प्रथा ना होती। ना ही स्त्री का इस कदर अपमान होता। कभी प्यार विडंबना नही होती और ना ही जाम्भवन्ति इस कदर विचलित होती।

    मै तो उस रावण की कर्म का काहिल हूँ जो राछसी प्रवित्ति का होकर भी अपने समाज के लिये संघर्ष करता रहा। प्यार को पाने के लिए अपने रसूख़ को अपने खून को दांव पर लगा दिया। आज भले ही हम राम की मूर्ति घर लाते हो पर पर्व रावण के बिना अधूरा है। आज भले ही पूजा राम की करते हो पर मन मे तो रावण मैल सबके बसा है। अगरबत्ती की धूप से भले ही श्रद्धा का परपंच हम करते हो पर, आग की अग्नि में जलता रावण आज भी हमारी कुरीतियों पर हँसता है।
    मै तो उस कंस का भी काहिल हूँ जो अपनी मौत पर विजय पाने का प्रयास करता रहा। आज भले ही उसकी पूजा ना होती हो, पर ऎसी कोई भगवतगीता नही जहाँ उसका जिक्र नही। बिना कंस के अंत का कृष्ण के जन्म का कोई अर्थ नही।

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    नज़रिया

    इसकी पहली पंक्ति के लिए caption पर नज़र डालें।।

    संसार मे जो भी घटित हुआ, हो रहा है या होने वाला है वह मनुष्य के कारण नही वक़्त / समय का खेल है। हमारा यह मानना की कण - कण में ईश्वर है यह एक भ्रांति मात्र है। क्योंकि अगर ईश्वर है तो उस भ्रूड का क्या गुनाह है जो उसे कभी योनि से बाहर का संसार देखने का मौका नही मिलता। उस मासूम बच्चे का क्या गुनाह है जो देह व्यापार का सामान बनकर पूरी ज़िंदगी विलाप में जीता रहा। उस स्त्री का क्या गुनाह है जो समाज की बनाई कुरीतियों के हत्थे चढ़ जाती है।
    सबसे बड़ा प्रश्न उस शरीर का क्या गुनाह है जो किसी पिछड़ी जाति में पैदा हुआ और अपने अस्तित के लिए पूरी ज़िंदगी प्रयत्न करता है। और जरूर इसका जवाब किसी के पास होगा तो वो यही होगा कि, उसके पिछले जन्मों का पाप है।

    तो मेरा भी एक सवाल है, पिछला जन्म मतलब क्या? क्योंकि शास्त्र और वेद तो कहते है कि मनुष्य जन्म १६४००० योनियों से गुजरने के बाद मिलता है। दूसरी बात अगर इस जन्म में फल मिलना ही नही तो कर्म का अर्थ ही नही रह जाता।

    अगर कभी फुर्सत मिले तो सोचना!
    ¶ धर्म क्या है?
    ¶ कर्म क्या होता है?
    ¶ पाप और पुण्य का भय क्यूँ ?
    ¶ जन्म और मरण का चक्रव्यू क्यूँ ?
    ¶ जन्नत का लोभ क्यूं ?

    हमारा मानना तो यह है कि, आज जो भी है उसकी आधारशिला हमारे पूर्वजों ने राखी थी, हमारे पूर्वज सूद्र, क्षत्रिय, नही थे, वह वैश्य और ब्राह्मण थे, अपने समाज की भलायी के लिए रचा गया यह परपंच है, कोई हमारा दाता नही कोई भाग्यविधाता नही, मनुष्य धर्म से बड़ा धर्म कुछ नही।

    Continued.... Part 2 in process
    ©trickypost १३-०६-२०१८ १९:१० संध्या