• pragatisheel_sadhak_bihari 22w

    पेड़ की व्यथा

    हूँ मैं हरित एक विशालकाय वृक्ष
    जैसे देते हैं माँ और पिता तुम्हें छाया
    जैसे होते हैं तुम्हारी माँ की उँगलियाँ
    जैसे होते हैं तेरे पिता के कंधे, वैसे ही होते तेरे लिए मेरी भी टहनियाँ
    काटते हो क्यों फिर हमारी टहनियों को
    क्या ऐसे ही काटते हो तुम अपनी माँ की उँगलियों को
    अपने स्वार्थ के आगोश में आकर?
    नहीं न!...
    ठीक वैसे ही होते हैं हम भी
    हैं हम फलदार ना भी सही
    पर छायादार तो हैं
    हमारी शाखाओं की चीखें तुम तक नहीं पहुँचती
    जो स्तब्ध होकर गिर जाता लिए खुद में पीड़ा हजार
    तेरे तन का तो रक्षक माँ पिता मिले
    पर क्या तुमने दे पाए आश्रय अपने बूढ़े माँ बाप को
    तो भला क्या तू दे पाओगे सहारा मेरे इन शाखाओं को
    कभी बचपन में मैं ही तेरा किनारा बना करता था
    जब तेरे माँ बाप बनकर सहारा
    इसी बरगद के नीचे आकर
    मेरे शाखाओं पे बाँध रस्सी
    तुम्हें झूला झुलाया करते थे
    पर आज मर्माहत उनका भी बुढ़ापा है
    और आहूत मेरा भी मन है
    क्योंकि तुम अब जवान हो गए
    मन तेरा शहरी हो गया
    तभी जज़्बाती यादें भी तेरे बचपन की
    तुम्हें कहाँ रोक पाया
    मेरा धड़ काटा और उनके अकड़ को
    अब जिक्र बस इतना ही वो करते के
    तू पढ़ लिखकर भी एक अबोध निर्मल बच्चा तक न बन पाए!