• karanchouhan123 10w

    कुछ शब्दों को रोक कर एक पल मे ख़ुद ही मे दम तोड़ देता हूँ, देखता हूँ आखिर मुझ मे मर क्या गया है फिर उसी कमरे की खिड़की पर जा बैठता हूँ जहाँ से तुम साफ नजर आ रही होती हो दोस्तो के साथ हँसी के कुछ पल जुटाते हुए पर यकीन नही आता कि क्या वो तुम हो जब थोड़ा थक जाता हूँ तुमहे देखते देखते तो बैठ जाता हूँ ,, पर शायद मेरी ये रातें खुशनुमा नही है तुम्ह मे खो जाता हु ओर मेरा वो दोस्त जो मुझे मार कर जगाता है क्या यार,, करन ,,, तु भी ना,,, उस वख्त कुछ हद तक वापस चला आता हु फिर कुछ पल के लिये उनके साथ जुट जाता हु ओर तो ओर वो रात को हवा मतलब कुछ कह रही हो छत पर बैठे बैठे 4 कब बज जातें है समय मतलब दिन कब निकला पता ही नहीं चला फिर सोचता हूँ सोना है पर वो भी क्या नीन्द थी जो बिना कुछ कहे आ जाती थी पता नहीं वो नीन्द केसे आती थी बस नाराज है पर ऐसा नही है वो बस बात नही करता सब से नहीं बस मेरे से ,,सिर्फ मेरे से नही करता बाकी तो सब उसके जान पहचान वाले है हम तो बस अजनबी है उसे तो ओरो का मलाल है इश्क का ओर मुझे उसका पर किसी के इश्क लिए वो छत वो कमरा ओर वो खिड़की ओर उन दिवारों से बाते सिर्फ चाँद तारों की थी मै सोचता हूँ कि अब भी कुछ बाकी है जेसे मे बनाता हु कहानियांा तकदीर की क्या तुम पड पाती हो क्या आंधी रात को उठकर कहानी ,,,,,,मे कया हुआ पर क्या कहूँ कि कहानी मे क्या क्या हुआ। ,,,,, करन