• unspokenmornings 5w

    उड़ने दो ,क्यों पंखो पर यूँ घात लगाए बैठे हो..
    बहने दो मछली की तरह ,
    क्यों जाल बिछाये बैठे हो.
    मैं हूं नारी हां नारी हूँ...
    चलने दो पानी की तरह..
    क्यों बाँध बनाये बैठे हो..
    गिद्धों के जैसे भीड़ खडी
    हर गली बीच बाजारों मे,
    निकलू बाहर नुच जाऊ मैं
    छप जाऊ फिर अखबारों में ..
    ..
    हवस भरी कुछ आँखे है
    रूकती जो मेरी छाती पर..
    अब शर्म करो इंसान बनो..
    न नजर लगाओ राखी पर..
    मैं हूं नारी हां नारी हूँ ..
    मुझको न समझना अब दुर्बल,
    पलट देख कुछ पन्नो को ,
    मुझसे जन्मा संसार सकल .
    हु द्रौपदी कलयुग कि ,
    अब गिरिधर को न ही बुलाऊंगी
    खुद ही अब मैं जंघा तोडुंगी
    खुद ही गदा उठाउंगी..
    मैं हूं नारी हां नारी हूँ...
    ©unspokenmornings